Monday, 21 September 2026

पथना बोले चीख के(दोहा)

 पथना बोले चीख के(दोहा)


चंदन चोवा जल चढ़े,कभू फूल अउ हार।
देवन  कस पूजय कभू,मंदिर  मा बइठार।

सबके  झेलँव  भार  मैं ,बनके  भीतर  नेंव।
घाव करे तन मा अपन,हँसिया बसुला टेंव।

लद्दी  भीतर  फेक  दे,पँवठा  मैं  बन जाँव।
लड़ई कर झन फेकबे,उजर जही जी गाँव।

लइका  खेले  खेल मा,मारतूल  धर हाथ।
विष्णु घलो पथना बने,हे तुलसी के साथ।

नँदिया नरवा ताल के ,कभू बनँव मैं पूल।
कभू पड़ँव मैं पाँव मा,कभू धरँव मैं फूल।

शेर  दहाड़े  देख  ले,बइठे  छाती मोर।
घर बन सागर डोंगरी,मैं हौं चारो ओर।

पथना  बोले  चीख   के,  माटी  होके  देख।
कभू कड़ा कोमल कभू,बनही बढ़िया लेख।

समय समय के बात हे,काम आय जी धूल।
कभू  धार  हथियार  मैं, कभू बनँव मैं फूल।

कखरो उप्पर हाँस झन,गरब भरौं झन कूट।
कहाँ  किसानी  मोर  में,जान  गरब के छूट।

हवे रूप के खेल जी,जग के वासी सीख।
रूप अपन संवार तैं, काहत हँव मैं चीख।

नेक काम जग मा करौं,मनखे तैंहर चेत।
पथरा  घलो  ह  घूर के ,हो जाथे जी रेत।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)


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