Monday, 21 September 2026

सृंगार-दोहा

सृंगार-दोहा

पड़ड़ी चंपा  फूल के,गजरा  लिए बनाय।
खोपा बीच लगाय हे, गली खोर ममहाय।

सेंदुर हे  बिजुरी  बरन, सोहे  मांग के बीच।
पवन चलय चुंदी हलय, जिवरा लेवे खीच।

टिकली दिखय कपार मा, चंदा जइसन गोल।
पान  खाय  मुँह  लाल  हे,बोले  गुरतुर  बोल।

पहिरे फूली सोन के,चमचम चमकय नाक।
करन फूल  हे कान मा, नरी  हार  के धाक।

माला  मुँदी  छभाय  हे, का चाँदी का सोन।
पुतरी कस सँउहत लगे,काहत हौं सिरतोन।

लाली लुगरा गजब फभे,हाथ  चुरी  हे लाल।
सूरुज लाल लजात हे, लाल दिखत हे गाल।

मुंदरी  अंगरी  मा  सजे,भरे   भरे   हे   हाथ।
ककनी बनुरी जब बजे,भुलय चलइया पाथ।

करधन हे कइ ताग गे,होवय कतको बात।
सुघराई   ला  देख  के,बुरई   हवे   भगात।

छुनुर छुनुर पैरी करय, बिछिया छाँटी पांव।
जेवर हे  हर अंग  मा, कइसे  महिमा  गांव।

महक भरे हे सरीर मा, एड़ी महुर लगाय।
गहना  गुठिया गोदना,देखय परी लजाय।

जीतेंद्र वर्मा
बालको(कोरबा)

बाँटा(दोहा)

 बाँटा(दोहा)

बाँटे   मा   बाढ़े   मया,  बाँटे  बाढ़े ग्यान।
बाँटे मा दुख कम लगे,खाये बाँट सियान।

पेट  भरे  के बाद मा ,आगर झन तैं बोज।
देदे भले भुखाय ला,तड़पय कतको रोज।

बाँचे  बासी  बाँट ले,बाँटव  बाँचे  साग।
दया मया ला बाँट ले,आही तभे सुराज।

बाँटे  मा पहिचान बने,बाँट मान सम्मान।
देवन कस देवत रहा,हाथ खोल के दान।

मनखे मन ला बाँट झन,बाँट न इरसा द्वेस।
घर  दुवार  झन  बाँट तैं,बाँट  राज ना देस।

बाँटा   बाँटय  बैर   ला, भाई  भाई   बीच।
बाँटा काँटा झन बनय, फूल मया के छीत।

भाई  बसे  परोस  मा , टाँगे  हे  तलवार।
सगा   दगा  देवत   हवे, होवे  हाँहाकार।

जीतेंद्र वर्मा "खैरझिटिया"
बालको(कोरबा)

पथना बोले चीख के(दोहा)

 पथना बोले चीख के(दोहा)


चंदन चोवा जल चढ़े,कभू फूल अउ हार।
देवन  कस पूजय कभू,मंदिर  मा बइठार।

सबके  झेलँव  भार  मैं ,बनके  भीतर  नेंव।
घाव करे तन मा अपन,हँसिया बसुला टेंव।

लद्दी  भीतर  फेक  दे,पँवठा  मैं  बन जाँव।
लड़ई कर झन फेकबे,उजर जही जी गाँव।

लइका  खेले  खेल मा,मारतूल  धर हाथ।
विष्णु घलो पथना बने,हे तुलसी के साथ।

नँदिया नरवा ताल के ,कभू बनँव मैं पूल।
कभू पड़ँव मैं पाँव मा,कभू धरँव मैं फूल।

शेर  दहाड़े  देख  ले,बइठे  छाती मोर।
घर बन सागर डोंगरी,मैं हौं चारो ओर।

पथना  बोले  चीख   के,  माटी  होके  देख।
कभू कड़ा कोमल कभू,बनही बढ़िया लेख।

समय समय के बात हे,काम आय जी धूल।
कभू  धार  हथियार  मैं, कभू बनँव मैं फूल।

कखरो उप्पर हाँस झन,गरब भरौं झन कूट।
कहाँ  किसानी  मोर  में,जान  गरब के छूट।

हवे रूप के खेल जी,जग के वासी सीख।
रूप अपन संवार तैं, काहत हँव मैं चीख।

नेक काम जग मा करौं,मनखे तैंहर चेत।
पथरा  घलो  ह  घूर के ,हो जाथे जी रेत।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)


Friday, 18 September 2026

काँसी फूल-सरसी छंद

 काँसी फूल-सरसी छंद


सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।

छटा धरा के लगे सुहावना, जब काँसी मुस्काय।।


हरियर धरती सादा फूल मा, सज हो जाथे खास।

मनुष देव अउ पितर घलो ला, आये फुलवा रास।

देत बिदाई बरसा ऋतु ला, शरद मास परघाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


चारो मूड़ा छाये दिखथे, स्वेत काँस के फूल।

हाथ हलाके नाचे लगथे, पुरवइया मा झूल।।

दिखे गगन कस दिन भर धरती, बिहना बरफ जनाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


तना फूल जड़ सब काँसी के, आथे अड़बड़ काम।

माटी ला बोहान देय नइ, पके घास दै दाम।।

डोरी बहरी खटिया मचिया, जाने तौन बनाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बढ़त चमचाई- लावणी छंद

 बढ़त चमचाई- लावणी छंद


घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।

अउ बाहिर मा रिस्ता जोड़े, रातउ दिन चमचाई ले।।


बात बात मा मुँहफट होके, नियम धियम गनवात रथे।

हक के बात घरे मा करथे, बाहिर मुड़ी नवात रथे।।

कथनी करनी जेखर करिया, ओहर बड़े कन्हाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


ददा बनावत हे आने ला, दरदर भटका खावत हे।

देखावा के नत्ता जोरे, कुकुर बरोबर धावत हे।।

बाज आत नइहे धक्का खा, रहि रहि पुछी हलाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।


चमचागिरी बढ़त हे भारी, आघू अउ अब का होही।

स्वभिमानी गिनके बाचे हे, कोन सुमत समता बोही।।

सत के बाना कोन बोहही, उबर असत लत खाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

बाढ़त बिजली बिल-(16-12)

 बाढ़त बिजली बिल-(16-12)


टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।

नेता अधिकारी बैपारी, लूटत हावैं मिल के।।


वाट वाट कहि वाट लगावै, रुपिया वसुलै भारी।

छोट वाट के लट्टू पंखा, मीटर के मति हारी।।

बता बजावत रहिबों ताली, अउ केदिन मुँह सिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।।


बरत बगाबग एक ठिहा हे, एक ठिहा अँधियारी।

सरकारी बिल सर जावत हे, सिस्टम जस गंधारी।।

पाले हमर कोइला पानी, आन लेग के ढिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।


सोलर सिस्टम लेवव कहिके, चलत हवै मनमानी।

हाँसत हावय हिही हिही बड़ , घर मा बइठ अडानी।।

बँटे रेवड़ी आनी बानी, हमर चाम ला छिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

Sunday, 13 September 2026

हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी भाँखा म अन्तर्सम्बन्ध

 हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी भाँखा म अन्तर्सम्बन्ध

          जइसे पानी ढलान कोती बहिथे, उसने भाषा घलो सरलता ल धरत जाथे। अब हिंदीच ल ले लौ संस्कृत- पाली- प्राकृत- तेखर बादअपभ्रंस होवत हिंदी। जइसे सरल सहज मनखे ल सबो चाहथे, वइसने भाषा के सरलता घलो ओखर अपनाये के कारण बनथे। पूर्वी हिंदी के अंतर्गत हमर छत्तीसगढ़ी भाषा आथे, जेमा अवधी, बघेली अउ हमर छत्तीसगढ़ी भाषा मिंझरे हे। ब्राम्ही लिपि ले उपजे जइसे हिंदी हे वइसने छत्तीसगढ़ी घलो हे। आज जब हमन हिंदी के बात करथन, तब आधुनिक युग के पहली के कवि सुर, तुलसी, कबीर, जायसी, केशव, बिहारी जैसे कवि मनके कालजयी रचना घलो हमर आँखी म झुलथे, जेमन के भाषा अवधी, ब्रज के साथ साथ कई ठन मिंझरा भाषा बोली रहिस। आधुनिक युग म तो ठेठ खड़ी बोली म जबर रचना होइस, जेमा भारतेंदु, पन्त, निराला, प्रसाद,महादेवी वर्मा, मैथलीशरण गुप्त, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, जइसे कतको कवि लेखक मन अपन जीवन ल खपा दीन। मोर कहे के मतलब हे कि हिंदी के समानांतर ही ब्रज अउ अवधी अपन स्थान रखथे, त छत्तीसगढ़ी काबर नइ रखे? जबकि हमर भाँखा घलो लगभग हिंदी के सबे गुण ल समेटे हे।  हो सकथे हमर साहित्य कमसल होही, या फेर ब्रज अउ अवधी कस ऊंचाई नइ पाइस होही। फेर हमर साहित्य घलो पोठ हे, कतको उत्कृष्ठ साहित्य हमर पुरखा कवि मन लिखे हे अउ आजो लिखावत हे, अइसन उदिम होवत देख इही कल्पना मन म आथे कि वो दिन दूर नइहे जब छत्तीसगढ़ी घलो ब्रज, अवधी के साहित्य कस हिंदी म मिल जही। 

        अब बात हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के अन्तर्सम्बन्ध के हो जाय। दूनों भाँखा के महतारी एके आय(ब्राम्ही), दूनो के रंग रूप, चेहरा- मुहरा एक्के जइसे हे, दूनो सगे बहिनी बरोबर हे। आजकल के कवि लेखक मन हिंदी वर्णमाला के जम्मो आखर ल बउरत घलो हे, जे बड़ खुसी के बात आय। *आन राज के कई मनखे मन हमर छत्तीसगढ़ी के बारे म कहिथे कि हिंदी ल बिगाड़ दव त छत्तीसगढ़ी हो जही* का सच म अइसने हे???? आपो मन कस मोरो न हे। येखर ले बचे बर छत्तीसगढ़ी के पाँच परगट शब्द ल बउरे ल लगही अउ हिंदी ल तोड़ मरोड़ करे ले बचेल लगही। हमर भाँखा के व्याकरण घलो हिंदी ले पहली बने हे, जेन हम सब बर गर्व के बात ये। एक बात अउ *जइसे मैं उप्पर म परगट शब्द लिखेंव, जे हिंदी के प्रगट के अपभ्रंश ये। परगट कहे म घलो अर्थ म कोनो प्रकार के भटकाव नइ लगत हे, अउ ये छत्तीसगढ़ म पूर्णतः चलन म घलो हे। अइसने कई ठन शब्द हे, जे हिंदी के अपभ्रंश के रूप म हमर भाँखा म रचे बसे हे ,अउ चलत घलो हे। जइसे ह्रदय(हिरदे),उम्र(उमर), दर्द(दरद), बज्र(बजुर), तीर्थ(तीरथ), छतरी(छत्ता)त्यौहार(तिहार) आदि आदि। कई ठन शब्द ल चिटिक बदलाव के साथ घलो बउरथन, जइसे व्याकुल(ब्याकुल), विनास(बिनास), व्रत(बरत), पर्व(परब), व्यवहार(ब्यवहार), वरदान(बरदान), वंदन(बंदन), वजन(बजन), वन(बन) आदि आदि। फेर येला देख के कतको झन कहि देथे की छत्तीसगढी म "व" नइ होय,, तेहा नइ जमे। पहली चलत घलो रिहिस हे, फेर ये बात गलत हे की 'व' ल लिखेच नइहे। होवत , बोवत, खोवत, पोवत काखर शब्द ये,,,, हमरे न,, त कइसे "व" नइ होही। यदि पहली कस(व बर ब लिखबों) आजो करबों त वर(दूल्हा) ल बर कहिबो। तब तो पेड़ वाले बर, काबर वाले बर अउ दूल्हा वाले बर, सब एक्के म जर बर जही। आज के लइका मनके रामेश्वरी, जागेश्वरी, रामेश्वर, ईश्वर, श्रवण, आदि घलो होथे, तिखर मरना हो जही। मोर एके इशारा हे अर्थ संगत शब्द ल बउरे जाय, अउ निर्थक या जेन वो संज्ञा ल बदल देय ओखर ले परहेज करना चाही। जइसे हिंदी म प्रकृति अब येला परकिरिती, प्रकार ल परकार, प्रकास ल परकास, क्षमा ल छिमा,शक्कर ल सककर, रायगढ़ ल रइगढ़,आदि आदि। ये मन थोड़ीक भ्रम पैदा करथे, तेखर सेती येमा चिंतन जरूरी हे अउ सही अउ स्पस्ट शब्द के माँग आज होवत घलो हे।*

       हिंदी के आखर अउ शब्द छत्तीसगढ़ी म घुरे हे,काहन या फेर  छत्तीसगढ़ी के शब्द मन हिंदी म घुरे हे काहन,,, येला सिद्ध करे म हमला कोनो ल नइ घूरना चाही। काबर भाँखा गतिमान हे, पानी असन स्वरूप बदलत जथे, कखरो पोगरी घलो नोहे। *एक छत्तीसगढिया मनखे घलो हिंदी लगभग समझ जथे, अउ हिंदी वाले छत्तीसगढ़ी, त येखर ले बढ़के अउ का अन्तर्सम्बन्ध देखन* हिंदी वाले घलो सहज छत्तीसगढ़ी पढ़ सकथे,अउ छत्तीसगढ़ी वाले घलो आखर ज्ञान के बाद हिंदी। काबर के पहली घलो केहेंव दुनो के रंग, रूप, चेहरा-मुहरा एके हे दुनो के *क* एक्के हे दुनो के *ट* एक्के हे। हिंदी के पिक्चर ल घलो छत्तीसगढिया मन मन लगाके देखथे अउ समझथे ,अब छत्तीसगढ़ी के पिक्कर आन कोती काबर नइ देखे जाय येखर बर खुद ल सोचेल लगही। *ब्रज भाँखा ले हिंदी के शान बाढ़िस, अवधी भाँखा ले हिन्दी के शान बाढ़िस त छत्तीसगढ़ी भाँखा ले हिंदी के शान काबर नइ बाढ़ही*।खच्चित बाढ़ही फेर उसने साहित्य हमर बीच म आय उसने पठन, पाठन अउ वाचन होय अतकी विनती हे।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)