Saturday, 24 January 2026

सोसल मीडिया अउ साहित्य लेखन-जीतेन्द्र वर्मा

 सोसल मीडिया अउ साहित्य लेखन-जीतेन्द्र वर्मा


       आज माँदी भात के कोनो पुछारी नइहे, मनखे बफे सिस्टम कोती भागत हे। जिहाँ के साज-सज्जा अउ आनी बानी के मेवा मिष्ठान, खान पान के भारी चरचा घलो चलथे। भले मनखे कहि देथे, कि पंगत म बैठ के खवई म ही आदमी मनके मन ह अघाथे, फेर आखिर म उहू बफे कोती खींचा जथे। मनखे के मन ला कोन देखे हे, आज तन के पहिरे कपड़ा मन के मैल ल तोप देथे। आज कोट अउ सूटबूट के जमाना हे, ओखरे पुछारी घलो हे ,चिरहा फटहा(उज्जर मन) ल कोन पूछत हे। अइसने बफे सिस्टम आय साहित्य अउ साहित्यकार बर सोसल मीडिया। भले अंतस झन अघाय पर पेट तो भरत हे, भले खर्चा होवत हे, पर चर्चा घलो तो होवत हे। कलम कॉपी माँदी बरोबर मिटकाय पड़े हे। 


         सोसल मीडिया के आय ले अउ छाय ले ही पता लगिस कि फलाना घलो कवि, लेखक ए। जुन्ना जमाना के कतको लेखक जे पाठ, पुस्तक, मंच अउ प्रपंच ले दुरिहा सिरिफ साहित्य सेवा करिस, ओला आज कतकोन मन नइ जाने। अउ उँखर लिखे एको पन्ना घलो नइ मिले। फेर ये नवा जमाना म सोसल मीडिया के फइले जाला जमे जमाना ल छिन भर म जनवा देवत हे कि फलाना घलो साहित्यकार ए, अउ ए ओखर रचना। सोसल मीडिया ,साहित्य कार के जरूरत ल चुटकी बजावत पूरा कर देवत हे, कोनो विषय , वस्तु के जानकारी झट ले दे देवत हे, जेखर ले साहित्यकार मन ल कुछु भी चीज लिखे अउ पढ़े  म कोनो दिक्कत नइ होवत हे। पहली  प्रकृति के सुकुमार कवि पंत के रचना ल पढ़ना रहय त पुस्तक घर या फेर पुस्तक खरीद के पढ़े बर लगे, फेर आज तो पंत लिखत देरी हे, ताहन पंत जी के जम्मो गीत कविता आँखी के आघू म दिख जथे। 


             सोसल मीडिया ल बउरना घलो सहज हे, *न कॉपी न पेन-लिख जेन लिखना हे तेन।* शुरू शुरू म थोरिक लिखे पढ़े म अटपटा लगथे ताहन बाद म आदत बनिस, ताहन छूटे घलो नही। सोसल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ साहित्यकार मन भर बर नही,सब बर उपयोगी हे। गूगल देवता बड़ ज्ञानी हे, उँखर कृपा सब उपर बरसत रइथे, बसरते माँग अउ उपयोग के माध्यम सही होय। आज साहित्यकार मन अपन रचना ल कोनो भी कर भेज सकत हे, अपन रचना ल कोनो ल भी देखाके सुधार कर सकत हे। पेपर  अउ पुस्तक म छपाय के काम घलो ये माध्यम ले सहज, सरल अउ जल्दी हो जावत हे। आय जाय के झंझट घलो नइहे। सोसल मीडिया म कोनो भी चीज जतेक जल्दी चढ़थे ,ओतके जल्दी उतरथे घलो, येखर कारण हे मनखे मनके बाहरी लगाव, अन्तस् ल आनंद देय म सोसल मीडिया आजो असफल हे। कोरोनच काल म देख ले रंग रंग के मनखे जोड़े के उदिम आइस, आखिर म सब ठंडा होगे। चाहे कविता बर मंच होय या फेर मेल मिलाप, चिट्ठी पाती अउ बातचीत के मीडिया समूह। पहली कोनो भी सम्मान पत्र के भारी मान अउ माँग रहय फेर ये कोरोना काल के दौरान अइसे लगिस कि सम्मान पत्र फोकटे आय। कोनो भी चीज के अति अंत के कारण बनथे, इही होवत घलो हे सोसल मीडिया म। सोसल मीडिया म सबे मनखे पात्र भर नही बल्कि सुपात्र हे, तभे तो कुछु होय ताहन ,जान दे तारीफ। *वाह, गजब, उम्दा, बेहतरीन जइसे कतको शब्द म सोसल मीडिया के तकिया कलाम बन गेहे।* सब ल अपन बड़ाई भाथे, आलोचना आज कोनो ल नइ रास आवत हे। मनखे घलो दुरिहा म रहिगे कखरो का कमी निकाले, तेखर ले अच्छा वाह, आह कर देवत हे। सात समुंद पार बधाई जावत हे, हैपी बर्थ डे, हैपी न्यू इयर,  हैपी फादर्स डे,हैपी फलाना डे। फेर उही हैपी फादर्स डे या मदर डे लिखइया मन ददा दाई ल मिल के बधाई , पायलागि नइ कर पावत हे, सिर्फ सोसल मीडिया म दाई, ददा, बाई, भाई, संगी साथी के मया दिखथे, फेर असल म दुरिहाय हे। अइसे घलो नइहे कि सबेच मन इही ढर्रा म चलत हे, कई मन असल म घलो अपनाय हे।


       सोसल मीडिया हाथी के खाय के दाँत नइ होके दिखाय के दाँत होगे हे। जम्मो छोटे बड़े मनखे येमा बरोबर रमे हे। सोसल मीडिया साहित्यकार मन बर वरदान साबित होइस। लिख दे, गा दे अउ फेसबुक वाट्सअप म चिपका दे। नाम, दाम ल घलो सोसल मीडिया तय कर देवत हे। सोसल मीडिया म जतका लिखे जावत हे, ओतका पढ़े नइ जावत हे, ते साहित्य जगत बर बने नइहे। ज्ञान ही जुबान बनथे, बिन ज्ञान के बोलना या लिखना जादा  प्रभावी नइ रहे। सोसल मीडिया के उपयोग ल साहित्यकार मन नइ करत हे, बल्कि सोसल मीडिया के उपयोग साहित्यकार मन खुद ल साबित करे बर करत हे, खुद ल देखाय बर करत हे। कुछु भी पठो के वाहवाही पाय के चाह बाढ़ गेहे। कुछु मन तो कॉपी पेस्ट म घलो मगन हे, बस पठोये विषय वस्तु ल इती उती बगराये म लगे हे, वो भी बिन पढ़े। कॉपी पेस्ट म सही रचनाकार के नाम ल घलो कई झन मेटा देवत हे। सोसल मीडिया सहज, सरल, कम लागत अउ त्वरित काम करइया प्लेटफार्म आय, जे साहित्य, समाज, ज्ञान ,विज्ञान के साथ साथ  दुर्लभ जइसे शब्द ल भी हटा देहे। येखर भरपूर सकारात्मक  उपयोग करना चाही। छंद के छ परिवार सोसल मीडिया के बदौलत 300 ले जादा, प्रदेश भर के साधक मन ल संघेरके 50, 60 ले जादा प्रकार के छंद आजो सिखावत हे। 2016 ले  छंदपरिवार सरलग  छत्तीसगढ़ी साहित्य के मानक रूप म  काम  करत हे। इसने लोकाक्षर, गद्य खजाना,आरुग चौरा, हमर गँवई गाँव अउ कई ठन समूह घलो हे जे येखर सकारात्मक उपयोग करत हे। सोसल मीडिया दिखावा के साधन मात्र झन बने।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा

अमीर ए ना--

 अमीर ए ना--


इज्जत गँवाके वो इज्जत वाला हे, अमीर ए ना।

कोन का कहे सबके मुँह मा ताला हे, अमीर ए ना।


बने करइया मन बन बन भटकत रहिथे रात दिन।

पाये आसन काम जेखर काला हे, अमीर ए ना।।


भगत के पथरा मा पात पानी घलो नइ चढ़त हे।

ओखर देवाला मा भगवान बाला हे, अमीर ए ना।


रोज चढ़थे रोज उतरथे कई किसम के नकाब।

उँहचे मरहम, उँहचे बरछी भाला हे, अमीर ए ना।


पानी मिला पी जथे खून,मनखे होय के गुण हे शून।

गिनाये बर धन दोगानी महल माला हे, अमीर ए ना।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

देस बर जीबो , देस बर मरबों

 देस   बर   जीबो , देस  बर  मरबों

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चल माटी के काया ल,हीरा करबों।

देस   बर  जीबो, देस   बर  मरबों।

सिंगार करबों,सोन चिरँइया के।

गुन ल गाबोंन,भारत मइया  के।

सुवारथ के  सुरता ले, दुरिहाके।

धुर्रा चुपर के माथा म,भुँइया के।

घपटे अँधियारी भगाय बर,भभका धरबों।

देस    बर      जीबो, देस    बर     मरबों।


उँच    -  नीच    ल, पाटबोन।

रखवार बन देस ल,राखबोन।

हवा   म      मया ,  घोरबोन।

हिरदे ल हिरदे  ले, जोड़बोन।

चल  दुख - पीरा  ल, मिल  के  हरबों।

देस   बर   जीबों,   देस    बर  मरबों।


मोला गरब - गुमान हे,

ए   भुँइया   ल  पाके।

खड़े   रहूं   मेड़ो   म ,

जबर छाती फइलाके।

फोड़ दुहूँ वो आँखी ल,

जे मोर माटी बर गड़ही।

लड़हूँ  -  मरहूँ  देस बर ,

तभे काया के करजा उतरही।

तँउरबों बुड़ती समुंद म,उग्ति पहाड़

चढ़बों।

चल   देस    बर   जीबो,   देस   बर  

मरबों।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को (कोरबा) 

09981441795

गणतंत्रता दिवस की ढेरों बधाइयाँ

Thursday, 22 January 2026

चल बइठबों बसंत म,पीपर तरी।

 बसंत

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चल बइठबों बसंत म,पीपर तरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी  -  घरी।


मोहे   मन   मोर   मउरे,मउर आमा के।

मधूबन कस लागे,मोला ठउर आमा के।

कोयली   कुहके  ,कूह - कूह   डार  म।

रंग-रंग के फूले हे,परसा-मउहा खार म।

बोइर-बर-बंम्भरी बर,बरदान बने बसंत।

सबो   रितुवन  म , महान  बने   बसंत।

मुड़ नवाये डोले पाना,तरी-तरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी  - घरी।


डोलत हे  जिवरा देख,सरसो  फूल  पिंवरा।

फूल - फर  धरे नाचे ,  राहेर, मसूर, तिवरा।

घमघम  ले   फूले  हे,  अरसी       मसरंगी।

हंरियर गंहूँ-चना बीच,बजाय धनिया सरँगी।

सुहाये  खेत -खार , तरिया - नंदिया कछार।

नाचे  सइगोन-सरई  डार, तेंदु-चिरौंजी-चार।

सुघरई बरनत पिरागे,नरी-नरी।

पूर्वा   गाये   गाना , घरी -घरी।


गोभी-सेमी-बंगाला,निकलत हे बारी म।

रोजेच साग चूरत हे, सबो  के हाँड़ी म।

छेंके  रद्दा रेंगइया ल, हवा अउ बंरोड़ा।

धरे नंगाडा पारा म , फगुवा डारे डोरा।

गाँव लहुटे सहर,अब दुरिहात हे बसंत।

जुन्ना पाना-पतउवा ल,झर्रात हे बसंत।

नवा - नवा  प्रकृति  ल,बनात हे बसंत।

खुदे  रोके;मनखे   बर, गात  हे बसंत।

कर्मा-ददरिया-सुवा,तरी-हरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी-घरी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795

गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)

 गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।

बिन अमुवा का करे कोयली, कांता हा बिन कंत।।


बिन फुलवा के हावय सुन्ना, मोर जिया के बाग।

आसा के तितली ना भौरा, ना सुवना के राग।।

हे बहार नइ पतझड़ हे बस, अउ हे दुःख अनंत।

आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।


सनन सनन बोलय पुरवइया, तन मन लेवय जीत।

आय पिया हा हाँसत गावत, धर फागुन के गीत।।

मरत हवौं मैं माँघ मास मा, पठो संदेश तुरंत।

आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।


देख दिखावा के दुनिया हा, बैरी होगे मोर।

छीन डरिस सुख चैन पिया के, काट मया के डोर।

पुरवा पानी पियत बने ना, आगे बेरा अंत।

आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


अब तो बस अंत नजर आथे, कहाँ अब बसंत नजर आथे।।

माँ सरस्वती पूजा अउ बसंत पंचमी के सादर बधाई

 माँ सरस्वती पूजा अउ बसंत पंचमी के सादर बधाई


वर दे माँ शारदे (सरसी छन्द)


दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।

गुण गियान यश धन बल बाढ़ै,बाढ़ै झन अभिमान।


तोर कृपा नित होवत राहय, होय कलम अउ धार।

बने बात ला पढ़ लिख के मैं, बढ़ा सकौं संस्कार।

मरहम बने कलम हा मोरे, बने कभू झन बान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जेन बुराई ला लिख देवँव, ते हो जावय दूर।

नाम निशान रहे झन दुख के, सुख छाये भरपूर।

आशा अउ विस्वास जगावँव, छेड़ँव गुरतुर तान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


मोर लेखनी मया बढ़ावै, पीरा के गल रेत।

झगड़ा झंझट अधम करइया, पढ़के होय सचेत।

कलम चले निर्माण करे बर, लाये नवा बिहान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


अपन लेखनी के दम मा मैं, जोड़ सकौं संसार।

इरखा द्वेष दरद दुरिहाके, टार सकौं अँधियार।

जिया लमाके पढ़ै सबो झन, सुनै लगाके कान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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सुभगति छंद-शारद मां


दे ज्ञान माँ।वरदान माँ।

भव तारदे।माँ शारदे।


आनन्द दे।सुर छंद दे।

गुण ज्ञान दे।सम्मान दे।


सुख गीत दे।सत मीत दे।

सुरतान दे।अरमान दे।


दुख क्लेश ला।लत द्वेश ला।

दुरिहा भगा।सतगुण जगा।।


जोती जला।दे गुण कला।

माथा नवा।माँगौ दवा।


चढ़ हंस मा।सुभ अंस मा।

आ द्वार मा।भुज चार मा।


दुरिहा बला।अवगुण जला।

बिगड़ी बना।सतगुण जना।


वीणा सुना।मैं हँव उना।

पैंया परौं।अरजी करौं।


सद रीत दे।अउ जीत दे।

सत वार दे।माँ शारदे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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दोहा गीत- माँ शारदे


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।

तोर शरण मा आय हौं, आरो लेबे मोर।।


तैं जननी सुर साज के, तिही ज्ञान आधार।

तोर कृपा के सध जथे, भव बाधा संसार।।

रखबे मोला बाँध के, अँचरा के माँ कोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


नइ चाही माँ धन रतन, नइ चाही रँग रूप।

मन भीतर अज्ञान के, रहय न एको कूप।

वीणा के झंकार मा, गुँजै गली घर खोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


झरत रहय माँ बोल मा, सबदिन सुर संगीत।

प्रेम देख मैं हार जँव, अहंकार लौं जीत।

दै सुकून नित सांझ हा, आस जगावै भोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


जय माँ शारदे, बसन्त पंचमी की सादर बधाइयाँ


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दोहा


पिंयर पिंयर सरसो फुले,देखत मन हर्षाय।

सनन सनन पुरवा चले,सरग पार नइ पाय।


खैरझिटिया

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रितु बसंत(रोला छंद)


गावय  गीत बसंत,हवा मा नाचे डारा।

फगुवा राग सुनाय,मगन हे पारा पारा।

करे  पपीहा  शोर,कोयली  कुहकी पारे।

रितु बसंत जब आय,मया के दीया बारे।


बखरी  बारी   ओढ़,खड़े  हे  लुगरा  हरियर।

नँदिया नरवा नीर,दिखत हे फरियर फरियर।

बिहना जाड़ जनाय,बियापे  मँझनी बेरा।

अमली बोइर  आम,तीर लइकन के डेरा।


रंग  रंग  के साग,कढ़ाई  मा ममहाये।

दार भात हे तात,बने उपरहा खवाये।

धनिया  मिरी पताल,नून बासी मिल जाये।

खावय अँगरी चाँट,जिया जाँ घलो अघाये।


हाँस हाँस के खेल,लोग लइका मन खेले।

मटर  चिरौंजी  चार,टोर  के मनभर झेले।

आमा  अमली  डार, बाँध  के  झूला  झूलय।

किसम किसम के फूल,बाग बारी मा फूलय।


धनिया चना मसूर,देख के मन भर जावय।

खन खन करे रहेर,हवा सँग नाचय गावय।

हवे  उतेरा  खार, लाखड़ी  सरसो अरसी।

घाम घरी बर देख,बने कुम्हरा घर करसी।


मुसुर मुसुर मुस्काय,लाल परसा हा फुलके।

सेम्हर हाथ हलाय,मगन हो मन भर झुलके।

पीयँर  पीयँर   पात,झरे  पुरवा जब आये।

मगन जिया हो जाय,गीत पंछी जब गाये।


माँघ पंचमी होय,शारदा माँ के पूजा।

कहाँ पार पा पाय,महीना कोई दूजा।

ढोल नँगाड़ा झाँझ,आज ले बाजन लागे।

आगे  मास बसन्त,सबे कोती सुख छागे।


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छ्ग)


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उही आम आदमी ए।

 उही आम आदमी ए।


करजा लेके मूड़ नवाय हे, उही आम आदमी ए।

थारी चाँट खाना खाय हे, उही आम आदमी ए।।


ना बन सकिस इती के, ना बन सकिस उती के।

बड़े छोट बीच बोजाय हे, उही आम आदमी ए।।


छोट मोट नवकरी धर, नित नवके चलत हे।

सबके नजर मा आय हे, उही आम आदमी ए।


नियम कानून मानथे, मानथे मान मर्यादा।

बात बात मा घबराय हे,उही आम आदमी ए।


देश वेश रीत नीत, सब हावय इंखरेच थेथा।

धन कमाय हे ना गँवाय हे,उही आम आदमी ए।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कविता ला।

 कविता ला।


तुरते ताही कागज मा झन छपन दे कविता ला।

अंतस के आगी मा थोरिक तपन दे कविता ला।


सागर मंथन कस मन ला मथ,निकाल अमरित।

कउड़ी के दाम कभू,  झन नपन दे कविता ला।।


बइठ गय हे मन मार के, थक हार के यदि कोई।

भरे उन मा जोश जज्बा,ता अपन दे कविता ला।


कवि करम मा तोर मोर के, चिट्को जघा नइहे।

पर हित खातिर सबदिन, खपन दे कविता ला।।


का जुन्ना का नवा का सस्ता अउ का महंगा खैरझिटिया।

ओन्हा चेन्द्रा कस चिरा चिरा के, कपन दे कविता ला।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

नियत बचाके रख रे मनखे- तातंक छन्द

 नियत बचाके रख रे मनखे- तातंक छन्द


नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।

लूट मचा झन बनगे लोभी, सिरा जही जिनगानी हा।


कब्जा झन पर्वत नदिया बन, झन खा पेड़उ पाती ला।

खनिज लवण जल झन निकाल बड़, छेद धरा के छाती ला।।

सता प्रकृति ला अब झन जादा, के दिन रही जवानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


चरै तोर बइला विकास के, सुख के धनहा डोली ला।

तोरे बइला तुहिंला पटके, गुनय सुनय ना बोली ला।।

हवै भोंगरा छत अउ छानी, आगी लगे फुटानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


माटी मा गारा मिलगे हे, महुरा पुरवा पानी मा।

साँस लेय बर जुगत जमाथस, अब का हे जिनगानी मा।

काली बर बस काल बचे हे, सरगे तोर सियानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


पेड़ लगावत फोटू ढिलथस, कभू बाँचतस नारा तैं।

सात जनम के ख्वाब देखथस, बइठे रटहा डारा तैं।

चाँद सितारा के सुध लेथस, तड़पय धरती रानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

पिकनिक-कुंडलियाँ

 पिकनिक-कुंडलियाँ


झाड़ी बन नदिया मता, पिकनिक मनुष मनाँय।

मछरी कुकरी बोकरा, आनी बानी खाँय।।

आनी बानी खाँय, मनुष मन जंगल जाके।

नाचे कूदे खूब, सगा संगी जुरियाके।।

हो हल्ला बड़ होय, उड़ावै धुँगिया गाड़ी।

बानर भालू रोय, रोय नदिया बन झाड़ी।


जंगल मा चारों मुड़ा, होवत हवय गोहार।

प्लास्टिक सँग मा काँच के, कचरा हे भरमार।

कचरा हे भरमार, सिसी पतरी दोना के।

मनखें मन बगराय, बीच जंगल मा जाके।

करैं रोज वनभोज, लगे नइ शनि रवि मंगल।

खा पी बड़ इतरायँ, पहुँच मनखें मन जंगल।।


पग मनखें माढ़िस तिहाँ, होवत गिस ऊजाड़।

लाहो लेवत हें गजब, मनखें मन हा ठाड़।।

मनखें मन हा ठाड़, कुदत हें बन मा जाके।

देख मनुष मतवार, सपटगे बाघ डराके।।

संगी पेड़ पहाड़, कहैं मनखें मन बन ठग।

उजड़त गिस बन बाग, पड़िस जब जब मनखें पग।


पिकनिक जाए के गजब, चुलुक चढ़े हे आज।

नदी पहाड़ मतात हें, आवत नइहें लाज।।

आवत नइहें लाज, मनुष मन ला एको कन।

डीजे हवें बजात, हाट बनगे हे कानन।।

नदी पहाड़ समुंद, सबे होवत हावय खिक।

घाम लगे ना जाड़, मनावैं मनखें पिकनिक।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

पाके पाके बिही

 जाम बिही तक खाय बर, सोचें पड़थे आज।

जर बुखार जुड़ हो जथे, बोलत आथे लाज।

खैरझिटिया

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पाके पाके बिही


पाके पाके बिही।

सोचत होहू दिही।

गय फोकट के जमाना,

कोनो पैसा मा लिही??

पाके पाके बिही-----1


चाँट चउमिन खाहू।

त चाँट के जाहू।।

फल फुलवारी खाही,

तिही हा जिही।।

पाके पाके बिही------2


पइधथे बेंदरा।

ता पर जथे चेंद्रा।

मनखे पइधही,

ता कोन बने किही?

पाके पाके बिही------3


लटलट ले फरे देख।

पारा परोसी जरे देख।।

दर्जन भर एके घांव,

झडक देथों मिही।

पाके पाके बिही--------4


कतको नइ खा सके।

कतको नइ पा सके।।

नवा जुग लील दिस,

बखरी बगीचा डिही।

पाके पाके बिही--------5


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

सर्दी दिसम्बर के-लावणी छंद

 सर्दी दिसम्बर के-लावणी छंद


हाड़ा गोंडा काँप जात हे, सर्दी देख दिसम्बर के।।

धरती के हालत खस्ता हे, खस्ता हालत अम्बर के।।


किनकिन किनकिन जाड़ करत हे, कुड़कुड़ाय हे चोला हा।

सुरुज नरायण बिजरावत हे, नइ भावै घर कोला हा।।

धुंध कोहरा मा का करही, चश्मा कोनो नम्बर के।

हाड़ा गोंडा काँप जात हे, सर्दी देख दिसम्बर के।।


बइला भँइसा कुकरी बकरी, काल सबे बर आगे हे।

बघवा भलवा हाथी तक के, ताकत जमे हरागे हे।।

कथरी भीतर मनुष दुबकगे, नोहे क्षण आडम्बर के।

हाड़ा गोंडा काँप जात हे, सर्दी देख दिसम्बर के।।


शीत गिरत हे टपटप टपटप, पेड़ पात अउ छानी ले।

गरम चीज बर फिरैं ललावत, बैर करैं सब पानी ले।।

बबा संग मा कई जवान तक,  नाहे हवँय नवम्बर के।

हाड़ा गोंडा काँप जात हे, सर्दी देख दिसम्बर के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

खून पछीना-लावणी छंद

 खून पछीना-लावणी छंद


खून पछीना पानी होगे, कदर कहाँ कोनो करथें।

कई खपा जाँगर मर जावँय, कई हदर दोंदर भरथें।।


धनी बली बैपारी नेता, राज करैं चारो कोती।

यशजश बाढ़ें इँखरे मनके, फुले फले मूंगा मोती।।

पापी तन ला पाक मान के, इँखरे पग सबझन परथें।

खून पछीना पानी होगे, कदर कहाँ कोनो करथें।।


देखावा के हवै जमाना, जउन दिखे तउने बिकथें।

कोट कछेरी संग देवता, भाग घलो इँखरें लिखथें।।

सत सुमंत अउ भला कला के, खेती ला सबझन चरथें।।

खून पछीना पानी होगे, कदर कहाँ कोनो करथें।


मिले पछीना गारा मा हे, वो जिनगी कारा मा हे।

खून देवइया खुर्चत दिखथें, मान गउन नारा मा हे।।

भाग बनइया जे कहिलाये, भूख प्यास तउने मरथें।।

खून पछीना पानी होगे, कदर कहाँ कोनो करथें।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

बाल्को,कोरबा(छग)

जंगल झाड़ी के विनास-लावणी छंद

 जंगल झाड़ी के विनास-लावणी छंद


पर्वत के पर्वत कुचरागे, छोट शिला सुर सूरत ए।

कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।


खेल करै नेता अधिकारी, बेचे जंगल झाड़ी ला।

उद्योगी के जेब भरे बर, रोके जीवन गाड़ी ला।।

बाट निहारे सड़क पूल हा, काटे रूख मुहूरत ए।

कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।


माटी महतारी के छाती, सबे जघा खोदावत हे।

धन्ना मनके नजर गड़े हे, खेत खार बोहावत हे।।

लगथे आजे उजड़ जही बन, अइसन काय जरूरत ए।

कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।


विकसित भारत के सपना ला, इसने कहूँ सँजोना हे।

हवा नीर तक ला ले पीबों, ता जिनगी भर रोना हे।।

आघू पीढ़ी ला जे खावय, ते मानव नइ धूरत ए।

कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

नोहर होगे उन्हारी- सार छंद

 नोहर होगे उन्हारी- सार छंद


भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पहली जम्मों गांव गांव मा, माते राहय खेती।

सरसो नाँचे तिवरा हाँसे, जेती देखन तेती।।

करे मसूर ह मुचमुच फुलके, बड़ निकले तरकारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पुरवा गाये राग फगुनवा, चना गहूँ लहराये।

मेड़ कुंदरा कागभगोड़ा, अड़बड़ मन ला भाये।

चना चोरइया गाय बेंदरा, खाय मार अउ गारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


कोन सिधोवव खेत किसानी, मनखे मन पगलागे।

खेत बेच के खाय खवाये, शहर गाँव मा आगे।।

सड़क झडक दिस खेत खार ला, बनगे महल अटारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

नोहर होगे उन्हारी- सार छंद

 नोहर होगे उन्हारी- सार छंद


भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पहली जम्मों गांव गांव मा, माते राहय खेती।

सरसो नाँचे तिवरा हाँसे, जेती देखन तेती।।

करे मसूर ह मुचमुच फुलके, बड़ निकले तरकारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पुरवा गाये राग फगुनवा, चना गहूँ लहराये।

मेड़ कुंदरा कागभगोड़ा, अड़बड़ मन ला भाये।

चना चोरइया गाय बेंदरा, खाय मार अउ गारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


कोन सिधोवव खेत किसानी, मनखे मन पगलागे।

खेत बेच के खाय खवाये, शहर गाँव मा आगे।।

सड़क झडक दिस खेत खार ला, बनगे महल अटारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

बुढ़वा बने जवान(सरसी छंद)

 बुढ़वा बने जवान(सरसी छंद)


नकली चुंदी दाँत लगाके, बुढ़वा बने जवान।

ना जवान के जोश दिखत हे, ना सियान के ज्ञान।।


नवा जमाना सब कुछ बाँटे, बिसा फेक के नोट।

झुर्री झाँई तक दब जावै, दबे दाग जर चोट।।

रंग रंग के दवा दवाई, बदलत हवै जहान।।

नकली चुंदी दाँत लगाके, बुढ़वा बने जवान।।


देखावा के हवै जमाना, सबझन देख झपाँय।

गुण गियान ला कोन पुछत हे, धन वाले अँटियाँय।।

रंग रूप भर चमचम चमकै, मुख ले बरसे बान।

नकली चुंदी दाँत लगाके, बुढ़वा बने जवान।


कनिहा नवे डोकरी नइहे, लउठे धरे सियान।

बेचत पागा लादे लागा, कल ले हो अंजान।।

ना नीयत ना नेकी हावै, ना कोठी ना धान।

नकली चुंदी दाँत लगाके, बुढ़वा बने जवान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

छेरछेरा पुन्नी के मूलमंत्र

 छेरछेरा पुन्नी के मूलमंत्र


                          कृषि हमर राज के जीविका के साधन मात्र नोहे, बल्कि संस्कृति आय, काबर कि खेती किसानी के हिसाब ले हमर परब संस्कृति अउ जिनगी दूनो चलथे। उही कड़ी के एक परब आय, छेराछेरा। जे पूस पुन्नी के दिन मनाय जाथे। ये तिहार ला दान धरम के तिहार केहे जाथे। वइसे तो ये तिहार मानये के पाछू कतको अकन किवदंती जुड़े हे, फेर ठोसहा बात तो इही आय कि, ये बेरा मा खेत के धान(खरीफ फसल) लुवा मिंजा के किसान के कोठी मा धरा जावत रिहिस, उही खुशी मा एक दिन अन्न दान होय लगिस, जेला छेरछेरा के रूप मा पूरा छत्तीसगढ़ मनाथें। हमर छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज हरे, येती छेराछेरा परब ला, घोटुल मा रहिके सबे विधा मा पारंगत होय, युवक युवती मनके स्वागत सत्कार के रूप मा मनाये जाथें, अउ दान धरम करे जाथें। पौराणिक काल मा इही दिन,भगवान शिव के पार्वती के अँगना मा भिक्षा माँगे के वर्णन मिलथे। सुनब मा आथे कि भगवान शिव अपन विवाह के पहली माता पार्वती तिर नट के रूप धरके उंखर परीक्षा लेय बर गे रिहिस, अउ तब ले लोगन मा उही तिथि विशेष मा दान धरम करत आवँत हें। 

                     ये दिन ले जुड़े एक पौराणिक कथा अउ सुनब मा मिलथे, कथे कि एक समय धरती लोक मा भयंकर अंकाल ले मनखे मन दाना दाना बर तरसत रिहिन, तब आदि भवानी माँ, शाकाम्भरी देवी के रूप मा अन्न धन के बरसा करिन। वो तिथि पूस पुन्नी के पबरित बेरा पड़े रिहिस। उही पावन सुरता मा, माता शाकाम्भरी देवी ला माथ नवावत, आज तक ये दिन दान देय के पुण्य कारज चलत हे। भगवान वामन अउ राजा बली के प्रसंग घलो कहूँ मेर सुनब मा आथे।

                रतनपुर राज के कवि बाबूरेवाराम के पांडुलिपि मा घलो ये दिन के एक कथा मिलथे, जेखर अनुसार राजा कल्याणसाय हा, युद्धनीति अउ राजनीति मा पारंगत होय खातिर मुगल सम्राट जहाँगीर के राज दरबार मा आठ साल रेहे रिहिस, अउ इती ओखर रानी फुलकैना हा अकेल्ला रद्दा जोहत रिहिस। अउ जब राजा लहुट के आइस ता ओखर खुशी के ठिकाना नइ रिहिस, रानी फुलकैना मारे खुशी मा अपन राज भंडार ला सब बर खोल दिस, अउ अन्न धन के खूब दान करें लगिस, अउ सौभाग्य ले वो तिथि रिहिस, पूस पुन्नी के। कथे तब ले ये दिन दान धरम के  परम्परा चलत हे।

                  कोनो भी तिथि विशेष मा कइयों ठन घटना सँघरा जुड़ सकथे, जइसे दू अक्टूबर गाँधी जी के जनम दिन आय ता शास्त्री जी घलो इही दिन अवतरे रिहिन, दूनो के आलावा अउ कतको झन के जनम दिन घलो होही। वइसने पूस पुन्नी के अलग अलग कथा, किस्सा, घटना ला खन्डित नइ करे जा सके। फेर सबले बड़का बात ये तिथि ला, दान पूण्य के दिन के रूप मा स्वीकारे गेहे। अउ दान धरम कोनो भी माध्यम ले होय, वन्दनीय हे। छेराछेरा तिहार मा घलो वइसने दान धरम करत,अपन अँगना मा आय कोनो भी मनखे ला खाली हाथ नइ लहुटाय जाय, जउन भी बन जाये देय के पावन रिवाज चलत हे, अउ आघु चलते रहय। ये परब मा देय लेय के सुघ्घर परम्परा हे, छोटे बड़े सबे चाहे धन मा होय चाहे उम्मर मा आपस मा एक होके ये परब मा सरीख दिखथें। लइका सियान के टोली गाजा बाजा के संग सज सँवर के हाँसत गावत पूरा गांव मा घूम घूम अन्न धन माँगथे, अउ सब ओतके विनम्र भाव ले देथें घलो। छेरछेरा तिहार के मूल मा उँच नीच, जाति धरम, रंग रूप, छोटे बड़े, छुवा छूत,अपन पराया अउ अहम वहम जइसे घातक बीमारी ला दुरिहाके दया मया अउ सत सुम्मत बगराना हे। फेर आज आधुनिकता के दौर मा अइसन पबरित परब के दायरा सिमित होवत जावत हे। बड़का मन कोनो अपन दम्भ ला नइ छोड़ पावत हे, मंगइया या फेर गरीब तपका ही माँगत हे, अउ देवइया मा घलो रंगा ढंगा नइहे। *एक मुठा धान चाँउर या फेर रुपिया दू रुपिया कोनो के पेट ला नइ भर सके, फेर देवई लेवई के बीच जेन मया पनपथे, वो अन्तस् ला खुशी मा सराबोर कर देथे। एक दूसर के डेरउठी मा जाना, मिलना मिलाना अउ मया दया पाना इही तो बड़का धन आय। छेरछेरा मा मिले एक मुठा चाँउर दार के दिन पुरही, फेर मिले दया मया, मान गउन सदा पुरते रइथे।* इही सब तो आय छरछेरा के मूलमंत्र। कखरो भी अँगना मा कोनो भी जा सकथे, कोनो दुवा भेद नइ होय। फेर आज अइसन पावन परम्परा देखावा अउ स्वार्थ के भेंट चढ़त दिखत हे, शहर ते शहर गांव मा घलो अइसन हाल दिखत हे। ये तिहार मा ज्यादातर लइका मन झोरा बोरा धरे, गाँव भर घूम अन्न धन माँगथे, सबे घर के एक मुठा अन्न धन अउ मया पाके, उंखर अन्तस् मा मानवता के भाव उपजथे, उन ला लगथे, कि सब हम ला मान गउन देथे, छोटे बड़े,धरम जाति, ऊँच नीच, गरीब रईस सब कस कुछु नइ होय, अइसनो सन्देशा घलो तो हे, ये परब मा। छोट लइका मनके मन कोमल होथे, दुत्कार अउ भेदभाव देखही सुनही ता निराश हताश तो होबे करही।

                 छेरछेरा अइसन पबरित परब आय जे गांव के गांव ला जोड़थे, वो भी सब ला अपन अपन अँगना दुवार ले, दया मया देवत लेवत अन्तस् ले, दान धरम ले या एक शब्द मा कहन ता मनखे मनखे ले। ये खास दिन मा जइसे माता पार्वती अँगना मा नट बन आये शिव जी ला सर्वस्व न्योछावर कर दिन, राजा बली भगवान वामन ला सब कुछ दे दिस,माँ शाकाम्भरी भूख प्यास मा तड़पत धरतीवासी ला अन्न धन ले परिपूर्ण कर दिस, रानी फुलकैना अपन परजा मन ला अन्न धन दिस, अउ किसान मन अपन उपज के खुशी ला  थोर थोर सब ला बाँटथे, वइसने सबे ला विनयी भाव ले अपन शक्तिनुसार दान धरम करना चाही। लाँघन, दीन हीन के पीरा हरना चाही, अहंकार दम्भ द्वेष, ऊँच नीच ला दुरिहागे सबे ला अपने कस मानत मान देना चाही, मया देना चाही।

*दान धरम अउ मया पिरीत के तिहार ए छेरछेरा।*

*मनखे के मानवता देखाय के आधार ए छेरछेरा।*


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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छेरछेरा(सार छंद)


कूद  कूद के कुहकी पारे,नाचे   झूमे  गाये।

चारो कोती छेरिक छेरा,सुघ्घर गीत सुनाये।


पाख अँजोरी  पूस महीना,आवय छेरिक छेरा।

दान पुन्न के खातिर अड़बड़,पबरित हे ये बेरा।


कइसे  चालू  होइस तेखर,किस्सा  एक  सुनावौं।

हमर राज के ये तिहार के,रहि रहि गुण ला गावौं।


युद्धनीति अउ राजनीति बर, जहाँगीर  के  द्वारे।

राजा जी कल्याण साय हा, कोशल छोड़ पधारे।


आठ साल बिन राजा के जी,काटे दिन फुलकैना।

हैहय    वंशी    शूर  वीर   के ,रद्दा  जोहय   नैना।


सबो  चीज  मा हो पारंगत,लहुटे  जब  राजा हा।

कोसल पुर मा उत्सव होवय,बाजे बड़ बाजा हा।


राजा अउ रानी फुलकैना,अब्बड़ खुशी मनाये।

राज रतनपुर  हा मनखे मा,मेला असन भराये।


सोना चाँदी रुपिया पइसा,बाँटे रानी राजा।

रहे  पूस  पुन्नी  के  बेरा,खुले रहे दरवाजा।


कोनो  पाये रुपिया पइसा,कोनो  सोना  चाँदी।

राजा के घर खावन लागे,सब मनखे मन माँदी।


राजा रानी करिन घोषणा,दान इही दिन करबों।

पूस  महीना  के  ये  बेरा, सबके  झोली भरबों।


ते  दिन  ले ये परब चलत हे, दान दक्षिणा होवै।

ऊँच नीच के भेद भुलाके,मया पिरित सब बोवै।


राज पाठ हा बदलत गिस नित,तभो होय ये जोरा।

कोसलपुर   माटी  कहलाये, दुलरू  धान  कटोरा।


मिँजई कुटई होय धान के,कोठी हर भर जावै।

अन्न  देव के घर आये ले, सबके मन  हरसावै।


अन्न दान तब करे सबोझन,आवय जब ये बेरा।

गूँजे  सब्बे  गली  खोर मा,सुघ्घर  छेरिक छेरा।


वेद पुराण  ह घलो बताथे,इही समय शिव भोला।

पारवती कर भिक्षा माँगिस,अपन बदल के चोला।


ते दिन ले मनखे मन सजधज,नट बन भिक्षा माँगे।

ऊँच  नीच के भेद मिटाके ,मया पिरित  ला  टाँगे।


टुकनी  बोहे  नोनी  घूमय,बाबू मन  धर झोला।

देय लेय मा ये दिन सबके,पबरित होवय चोला।


करे  सुवा  अउ  डंडा  नाचा, घेरा गोल  बनाये।

झाँझ मँजीरा ढोलक बाजे,ठक ठक डंडा भाये।


दान धरम ये दिन मा करलौ,जघा सरग मा पा लौ।

हरे  बछर  भरके  तिहार  ये,छेरिक  छेरा  गा  लौ।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


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छेरछेरा

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धान धराये हे,कोठी म।

दान-पून  के,ओखी म।

पूस    पुन्नी    के   बेरा,

हे गाँव-गाँव म,छेरछेरा।


छोट - रोंठ  सब  जुरे  हे।

मया दया गजब घुरे   हे।

सबो के अंगना  - दुवारी।

छेरछेरा मांगे ओरी-पारी।

नोनी   मन   सुवा   नाचे,

बाबू   मन  डंडा    नाचे।

मेटे    ऊँच  -  नीच    ल,

दया  -  मया   ल   बांचे।

नाचत   हे  मगन   होके,

बनाके     गोल     घेरा।

पूस    पुन्नी     के   बेरा,

हे गाँव-गाँव  म,छेरछेरा।


सइमो- सइमो करत  हे,

गाँव   के   गली   खोर।

डंडा- ढोलक-मंजीरा म,

थिरकत    हवे     गोड़।

पारत              कुहकी,

घूमे      गाँव         भर।

छेरछेरा   के   राग    म,

झूमे    गाँव          भर।

कोनो  केहे  मुनगा  टोर,

त   केहे ,  धान  हेरहेरा।

पूस    पुन्नी    के    बेरा,

हे गाँव-गाँव म, छेरछेरा।


भरत   हे    झोरा  - बोरा,

ठोमहा - ठोमहा  धान म।

अड़बड़   पून   भरे   हवे,

छेरछेरा    के    दान   म।

चुक ले अंगना लिपाय हे।

मड़ई  -  मेला   भराय हे।

हूम - धूप - नरियर धरके,

देबी - देवता ल,मनाय हे।

रोटी - पिठा  म  ममहाय,

सबझन      के       डेरा।

पूस    पुन्नी     के    बेरा,

हे  गाँव-गाँव  म,छेरछेरा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


छेरछेरा परब की आप सबला बहुत बहुत बधाई

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 छेरिकछेरा


दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।

जतके देहू ततके बढ़ही, धन दौलत शुभ बेरा।।


पूस पाख मा पुन्नी के दिन, बगरै नवा अँजोरी।

परब छेरछेरा हा आँटै, मया पिरित के डोरी।।

लइका लोग सियान सबे मिल, नाचै गाना गायें।।

धिनधिन धिनधिन ढोलक बाजे, डंडा ताल सुनायें।

थपड़ी कुहकी झांझ मँजीरा, सुनत टरै दुख घेरा।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।।


दया मया के सागर लहरै, नाचै जीवन नैया।

गोंदा गमकै घर अँगना मा, गाय गीत पुर्वैया।।

करे जाड़ जोरा जाये के, मांघ नेवता पाये।

बर पीपर हा पात झराये, आमा हा मउराये।।

सेमी गोभी भाजी निकले, झूलै मुनगा केरा।।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।


मीत मया मन भीतर घोरत, दान देव बन दाता।

भरे अन्न धन मा कोठी ला, सबदिन धरती माता।।

रांध कलेवा खाव बाँट के, रिता रहे झन थारी।

झारव इरसा द्वेष बैर ला, टारव मिल अँधियारी।।

सइमो सइमो करै खोर हा, सइमो सइमो डेरा।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।।

खैरझिटिया

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 छेरछेरा अउ डंडा नाच


                     डंडा नाच हमर छत्तीसगढ़ के प्रमुख नाच मा शामिल हे। जेला अधिकतर  पूस पुन्नी याने छेरछेरा के समय मा नाचे जाथे। ये नाच मा मुख्यतः धँवई या तेंदू के छोट छोट डंडा के प्रयोग होथे, काबर कि एखर लकड़ी मजबूत अउ बढ़िया आवाज करथे। डंडा के आवाज के ताल मा ही नचइया मन गोल घेरा मा घूम घूम एक दूसर के डंडा ला एक निश्चित लय ताल मा बजाथें, अउ कमर मुड़ी ला हला हला के झुमथें। कुहकी पारना घलो डण्डा नाच के विशेषता आय। आजकल डंडा के संग ढोलक,झांझ अउ मन्जीरा तको ये नाच मा देखे बर मिलथे। ये नाच के एक विशेष लय ताल युक्त गीत होथे। डंडा नाच ला मुख्य रूप ले लड़का मन द्वारा किये जाथे। ये नाच मा लगातार घूम घूम के नाचे अउ डंडा टकरावत गीत ला दोहराए बर घलो लगथे। जब किसान मन के खेत के धान घर के कोठी मा धरा जथे ता दान पुण्य के ओखी मा मनाए जाथे छेरछेरा के तिहार, अउ इही बेरा घर घर जाके डंडा नाचत लइका सियान मन अन्न के दान पाथें। हमर छत्तीसगढ़ मा होरी के समय घलो डंडा नाचे जाथे, जेला डंडारी नाच कहिथे, फेर दुनो नाच अलग अलग बेरा व अलग अलग हावभाव के नाच आय। डंडारी विशेषकर पहाड़ी क्षेत्र मा होली के बेरा नाचे जाथे। मैदानी भाग मा डंडा नाच अउ पहाड़ी भाग मा इही सैला नृत्य कहे जाथे। जनश्रुति के अनुसार आदिवासी मन आदि देवाधिदेव महादेव ला मनाए बर येला नाचथे ता मैदानी भाग मा भगवान श्रीकृष्ण के रास नृत्य के रूप मा नाचे गाये जाथे। आदिवासी मन येला अपन पारम्परिक नृत्य मानथे। सुनब मा यहु आथे कि एखर शुरूवार राम रावण युद्ध के बाद राम विजय के समय आदिवासी  मन राम जी के स्वागत मा नाचिन, ता कहूँ कहिथे के एखर शुरुवात कृष्ण के रास लीला के समय होइस। ये नाच मा राम कॄष्ण के गीत के संग संग  शुरुवात मा भगवान गणेश, मां सरस्वती अउ गुरु वन्दना करे जाथे। पंडित मुकुटधर पांडेय जी हा ये नृत्य ला छत्तीसगढ़ के "रास नृत्य" घलो कहे हे। कतको झन मन एला छत्तीसगढ़ के डांडिया घलो कहिथे।

                      डंडा नाच मा समयानुसार साज सज्जा मा बदलाव होवत दिखथें। पहली धोती कुर्ता, कलगी, पागा,मोरपंख, कौड़ी, घुंघरू नचइया मनके सँवागा रहय, जे पारम्परिक रूप ले अभो दिखथे, फेर आजकल सुविधानुसार नचइया मन अपन अपन सँवागा के व्यवस्था करथें। ढोलक,झांझ मंजीरा संग मांदर, हारमोनियम,बासुरी  व अन्य कतको वाद्य यंत्र आज डंडा नाच के शोभा बढ़ावत दिखथे। नाचा पार्टी या फेर  हमर संस्कृति संस्कार ला देखाय के बारी आथे ता ये नाच ला कभू भी कलाकार मन मंच के माध्यम ले लोगन बीच परोसथे। नाच के बीच परइया कुहकी ला कइसे लिख के बतावँव? उह उह एक लय मा अउ एक विशेष बेरा मा नचइया मन एक साथ चिल्लाथें। देखत सुनत ये नाच बड़ मनभावन लगथे। आजकल डंडा नाच मा कतको प्रकार के करतब तको कलाकार मन करत दिखथें। आजकल बांस के डंडा घलो चलन मा आगे हे। डंडा नाचे बर सम संख्या मा नर्तक होथे, जिंखर दुनो हाथ मा  एक एक डंडा होथे। गोल घेरा मा डंडा ला दाएं बाए नाचत साथी मनके डंडा ला ठोंकत ये नृत्य ला करे जाथे।

                    वइसे तो डंडा नाच मा बड़ अकन गीत गाये जाथे, सबके वर्णन करना सम्भव नइहे, तभो कुछ पारम्परिक गीत ला लमाये के प्रयास करत हँव। सुमरनी ले ये नृत्य चालू होथे। गणेश वंदना, सरस्वती वंदना, रामकृष्ण अउ माता पिता गुरु के वन्दना घलो ये नृत्य मा सुने बर मिलथे।। सुमरनी गीत के एक बानगी,---

'पहिली डंडा ठोकबो रे भाई, काकर लेबो नाम रे ज़ोर,

गावे गउंटिया ठाकुर देवता, जेकर लेबो नाम रे ज़ोर।

आगे सुमिरो गुरु आपन ला, दूजे सुमिरों राम रे ज़ोर,

माता-पिता अब आपन सुमिरों गुरु के सुमिरों नाम रे ज़ोर।'


कुछ अउ गीत, ज्यादातर गीत के शुरुवात "तरीहरी नाना रे नाना रे भाई" काहत चालू होथे, जेखर बीच मा कहानी, कथा अउ बारी बखरी, खेती-खार संग परब तिहार के वर्णन रहिथे।


1, "एकझन राजा के सौ झन पुत्र,

    उनला मँगाइस हे मुठा मुठा माटी।"


2,  ओरिन ओरिन मुनगा लगाएंव।

     वो मुनगा फरे रहे लोर रे केंवरा, 

      तैं डँगनी मा मुनगा टोर।


3,   मन रंगी सुआ नैना लगाके उड़ भागे।

      उड़ि उड़ि सुवना, घुटवा पे बइठे।

      घुटवा के रस ला ले भागे, मन रंगी


4,  मैं बन जा रे लमडोर,

     नेकी मैं बन जा।


5,   हाय डारा लोर गे हे न।


6, तहूँ जाबे महूँ जाहुँ, राजिम मेला


ये सब पारम्परिक गीत के आलावा आजकल नवा नवा गीत भी देखे सुने बर मिलथे।

                  डंडा नचइया मन दुनो हाथ मा डंडा लेके, गोल किंजरत अलग अलग प्रकार के डंडा नाचथे। डंडा नाच के कतको प्रकार हे, एखर बारे मा हमर पुरखा कवि डॉ प्यारेलाल गुप्त जी मन अपन पुस्तक "प्राचीन छत्तीसगढ़"मा घलो विस्तार ले लिखें हें। गुप्त जी अनुसार दुधइया नृत्य, तीन डंडिया, पनिहारिन सेर, कोटरी झलक, भाग दौड़, चरखा भांज आदि कतको रूप प्रचलित हे। एखर आलावा सियान मन आधा झूल, टेटका झूल,पीठ जुड़ी, समधी भेंट, घुचरेखी आदि प्रकार के डंडा नाच के बारे मा घलो बताथे। ये सब नाच ल नाचे के अलग अलग तरीका हे, कहे के मतलब सबके अलग अलग परिभाषा हे,नाच शैली हे। 

जइसे.........

*तीन डँड़या- तीन झन संग डंडा टकराना

*आधा झूल-एक झन आदमी दुनों डंडा एक आदमी ले टकराथें।

*टेटका झूल- एक आदमी अपन आजू बाजू के आदमी ले डंडा टकराथे।

*पीठजुड़ी-पीठ जोड़के दांया बांया डंडा टकराना

*सम्बंधी भेंट-दांया बांया बारी बारी से डंडा मारना

*घुचरेखी-ऊपर अउ घुंच के नीचे डंडा मारना


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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होगे छेरछेरा


ये बात हरे हमरे तुम्हरो बीच के।

एक मुठा दिएन फेर फोटू खींच के।।


बात बानी मा होगेन सब मनखे एक।

अइसने मा का फुटही भांडी ऊँच नीच के।।


परब तिहार नता रिस्ता सब मा देखावा।

पुरखा मन मानिस दया मया सींच के।।


कइसे अउ भराही मानवता के तरिया।

मार डरेन मछरी सहीं चुक्ता छींच के।।


माया बर मया छोड़ बाजार मा।

खड़े हवँन सब आज आँख मीच के।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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चित्रांकन-दिनेश चौहान जी

नवा साल

 नवा साल


हमर बर नवा का,अउ का जुन्ना रे नवा साल।

सबर दिन रथे, काठा कोठी उन्ना रे नवा साल।1


कोंटा मा परे हें, काली के संसो मा बबा ददा। 

मंद पीके नाचत हें, मोंटू मुन्ना रे नवा साल।।2


सियान मन जिनगी बिताइन, अपन मुठा बांध के,

आज चाबत हे मनखे मन ला, चुन्ना रे नवा साल।।3


नवा जमाना मा होवत हे, अड़बड़ नवा नवा उदिम,

संस्कृति संस्कार मा लगत हे, घुन्ना नवा साल।।4


होटल ढाबा मरत ले, भीड़ भाड़ दिखत हे,

ठिहा ठौर दिखत हे निचट, सुन्ना रे नवा साल।।5


आज के मनखें काली का करही, का पता?

देखावा मा झूलत हें सब, झुन्ना रे नवा साल।।6


ना नरियर अगरबत्ती, ना खीर ना पूड़ी भाये उनला,

बोकरा खाके नाचत हें, ताता तुन्ना रे नवा साल।7


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सकट चतुर्थी

 सकट चतुर्थी

       


              भारतीय संस्कृति मा चंदा, सुरुज के संग ग्रह नक्षत्र के पूजा पाठ बारो महीना चलते रथे। वइसने एक पूजा या व्रत होथे, सकट तिहार। ये तिहार के दिन चौथ के चंदा मा भगवान गणेश ला विराजे मानके। ओखर दर्शन करके दाई, बेटी, बहिनी मन, अपन निर्जला ब्रत ला तोड़थें, अउ अपन लइका लोग के सुख समृद्धि के कामना करथें। ये सन्दर्भ मा एक कथा आथे कि, भगवान शिव हा, पार्वती द्वारा मइल ले बनाय गणेश जी के मुड़ी ला काट देथे, जेखर ले पार्वती बहुत दुखी हो जथे, अउ जब गणेश जी ला जिंदा करे बर कथे, ता ओखर मुड़ मा हाथी के मूड़ लगाथे। पावर्ती देख के खुश होथे, फेर जब अपन लइका के पहली वाले कटे मुड़ी ला देखथे ता विलाप करे लगथे। पार्वती ला विलाप करत देख, ओखर प्रण, व्रत अउ इच्छा अनुसार वो मुड़ी ला चन्द्रमा मा, शिव जी हा शुशोभित कर देथें, अउ उही दिन ले सकट तिहार के चलागन माने जाथे। माता पार्वती अपन लइका गणेश के पुर्नजीवन अउ कटे मुड़ी के संसो बर निर्जला व्रत रहिके, भगवान शिव ला अपन बात मनवाथे। तपोबल ले प्रभावित भगवान शिव, चन्द्रमा मा मुड़ ला स्थापित करे के बाद, ये आषीश देथें कि सकट के दिन जउन भी महतारी मन, चाँद ल देखत पूजा पाठ करहीं, उंखर लइका लोग के सब संकट दुरिहा जही। उपास धास के ये सिलसिला आदि समय ले अभो सरलग चलत आवत हे।    

                 

                     छत्तीसगढ़ मा ज्यादातर ये उपास ला लोधी अउ कुर्मी समाज के बेटी माई मन रहिथे। पहली कस आजो ये तिहार मा, बेटी माई मन, अपन मइके मा जुरियाके सबो सँवागा सजाके रतिहा चंदा ला नमन करत अपन निर्जला व्रत ला तोड़थें अउ लइका लोग घर परिवार के सुख समृद्धि के कामना करथें। ये दिन माटी के खिलौना, जेमा डोंगा, बाँटी,भौरा के साथ साथ पापड़, तिली लाड़ू, कोमहड़ा पाग, पूड़ी, खीर, अइरसा आदि पकवान बनाये जाथे, अउ भगवान चन्द्र गणेश ला भोग लगाय जाथे। भगवान  चंद्र गणेश ला कच्चा दूध, फूल, पान, नरियर ,अगरबती, हूम धूम आदि चढ़ाए जाथे। ये परब ला सकट चतुर्थी घलो कथे। कुछ मन चौथ के चाँद के जघा तीज के चाँद ला घलो भगवान चन्द्र गणेश मानके सकट उपास रथे।  ददा भाई मन ये तिहार के पहली अपन बेटी बहिनी ला घर ले आथे। बेटी माई मन मइके मा ये उपास ला रथें। व्रत तिहार कोनो भी होय सबके मूल मा सुख समृद्धि के कामना जुड़े हें, वइसनेच मया मेल, सुख- समृद्धि के परब आय सकट चौथ।।

          

                         उपास धास कभू भी देखावा नइ होय, ओखर मूल मा सुखसमृद्धि के कामना ही रथे, फेर आज सोसल मीडिया के युग मा लगातार नवा नवा फिजूल चोचला चिंतनीय हे। कथे भगवान भाव के भूखा ए, तभे तो सकट उपास मा  महंगा मेवा मिष्ठान के जगह महतारी मन तिल गुड़ के भोग लगाके भगवान चंद्र गणेश ला मनाथें, अउ देख देखावा ले दुरिहा रथें। सकट उपास मा, कुछ जगह सकट माता के घलो जिक्र होथे। सकट माता मां दुर्गा के ही रूप आय, जेला चौथ माता भी कहिथे। राजस्थान मा चौथ माता के कई मंदिर भी मिलथे। वइसे छत्तीसगढ़ मा सकट के दिन चंद्र दर्शन के ही चलागन हे। चंदा मा भगवान गणेश के प्रतिमूर्ती मानके पूजा पाठ करथें। उपास ले भक्ति भाव के संग तन के स्वस्थता घलो बने रथे। ते पाय के ये सब तिहार बार के बहाना उपास जेखर से भी बन सकथे, रहना चाही। उपास सुख समृद्धि के साथ जुड़ाव के काम घलो करथे। ये सब उपास मइके, ससुराल के संग पारा, परोसी मा प्रेम बढ़ाथे। जय भगवान चंद्र गणेश,जय सकट माता।


सकट तिहार-कुंडलियाँ


मइके मा जुरियाय हें, दीदी बहिनी आज।

सकट तिहार मनात हें, थारी दिया सजात।

थारी दिया सजात, हवैं बेटी माई मन।

लाड़ू पापड़ खीर, बनावत हें दाई मन।।

माँगे मया दुलार, गजानन ले व्रत रइके।

हाँसत खेलत रोज, रहै ससुरार अउ मइके।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे

 तभो नेता मन के कद बाढ़े हे


पानी बिजली के हाल बेहाल हे।

डहर बाट मा खुदे नरवा ताल हे।।

नियम धियम गुंडा मन बनात हें,

न ढंग के स्कूल न अस्पताल हे।

विकास घोषणा पत्र मा माढ़े हे।

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे।।


कपड़ा ओनहा बस सादा हे।

मन भीतर भराय खादा हे।।

कुर्सी ला पोटारे रथे सबदिन,

एको ठन पुरोये नइ वादा हे।।

जनता बर शनि साते साढ़े हे।

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे।।


फूल माला के दीवाना ये मन।

जाने बस नित खाना ये मन।।

अपन जेब मा धरके रखें सदा,

कोर्ट कछेरी अउ थाना ये मन।

तभो जयकार करइया ठाढ़े हे।

तभे नेता मन के कद बाढ़े हे।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

छन्द मा छत्तीसगढ़ी संचालक-जीतेंद्र वर्मा”खैरझिटिया”

 राजभाषा आयोग के 9वाँ प्रांतीय सम्मेलन मा,,संचालक के तौर मा मोर विचार अउ बातबानी....


विषय:-छन्द मा छत्तीसगढ़ी

संचालक-जीतेंद्र वर्मा”खैरझिटिया”


जोहार।

मैं बाल्को, कोरबा ले जीतेन्द्र कुमार वर्मा “खैरझिटिया”। 


“छंद मा छत्तीसगढ़ी” ये विषय ल लेके आज हमन राजभाषा आयोग के 9वाँ प्रांतीय सम्मेलन के 9 वाँ सत्र मा उपस्थित होय हन, 9- 9 के जबर संयोग घलो मिलत हे...

                       छन्द के पहली छत्तीसगढ़ी के बात करथन। छत्तीसगढ़ी...... काय ए? सिर्फ भाषा या बोली? नही छत्तीसगढ़ी हमर मान ए, अभिमान, पहिचान ए। जइसे कोनो ल बंगाली बोलत सुनथन ता जान डरथन कि  वो बंगाल के ए, कोनो ला मराठी बोलत सुनथन ता जान डरथन कि वो महाराष्ट्र के ए, वइसने छत्तीसगढ़ी बोली छत्तीसगढ़ के पहिचान ला बताथे।भाषा या बोली सिर्फ मनखे के नही बल्कि देश, राज अउ अंचल के पहिचान होथे। ता का हमला अपन पहिचान ल भुलाना चाही? नही न…. कोनो लइका के चहेरा मुहरा आचार विचार अउ चाल चलन ल देखत कतको मन बता देथे कि वो फलाना के लइका ए। काबर कि ओ लइका म ओखर ददा दाई के पहिचान दिखथें। वइसने छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली आय, जे हम ला पहिचान देथे। रंग रूप, खानपान, पहिनावा ओढ़ना, पार परम्परा अउ संस्कृति संस्कार के संगे संग भाँखा बोली घलो पहिचान के एक आभिन्न भाग आय।  यदि हमन अपन बोली भाँखा ले भागबो त हमर पहिचान घलो नँदा जही। कोनो लइका ला ओखर ददा दाई के अलावा दूसर के लइका कहिलाय मा गरब नइ होय, अउ न वो लइका बने काहय, ता छत्तीसगढ़ी बोले अउ  छत्तीसगढिया काहय मा काके शरम? छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली ए। जइसे महतारी के सेवा जतन ओखर बेटा ल ही करना पड़थे, वइसने हम सब छत्तीसगढिया मन ऊपर माई बोली छत्तीसगढ़ी के बढ़वार के भार हवै। कोनो भी भाँखा होय ओखर उत्तपत्ति बड़ श्रमसाध्य बूता होथे। आज अपन एक बात जमाना मा मनवा के देखव पता चल जही, कि कतका महीनत हे कोनो नवा शब्द गढ़ना अउ मनवाना। अइसन मा हमर पुरखा मनके महीनत बिरथा झन होय, अउ हमर माई बोली जन्मो जनम ये धरा धाम मा मिश्री घोरत रहे। भाँखा भाव के संवाहक होथे, छोटे बड़े कभू नइ होय। अइसन मा कोनो भी भाँखा ला छोटे बड़े कहना हमर नादानी होही। भाँखा ला जिंदा रखथे ओखर बोलइया, लिखइया, पढ़इया अउ समझइया मन। अउ आज बढ़वार के बूता हमर साहित्कार संगी मन बड़ सुघ्घर ढंग ले करत हे। मंच मा छत्तीसगढ़ी मा छंद के बारे मा बताये बर हमर संगी सुखदेव सिंह अहिलेश्वर(जिला कबीरधाम ले), मनीराम साहू मितान(सिमगा ले), बलराम चन्द्राकर(भिलाई ले), चोवाराम वर्मा बादल(जिला बलौदाबाजार ले), आशा देशमुख(कोरबा ले) ले हमर बीच उपस्थित हें। अउ ये सत्र के अध्यक्षता करत हें, छंद के छ के संस्थापक छंदविद अरुण कुमार निगम जी(रायपुर)। आप जम्मों के सादर स्वागत हे, एक बार जोरतार ताली—।


संगवारी हो…

                      वइसे तो छंद के कई परिनिष्ठित परिभाषा हे। फेर छंद कहे ले छत्तीसगढ़ी मा छंदे बंधे के भाव बोध होथे, अउ छंद वइसनेच आय घलो। जेन मात्रा के साथ साथ यति, गति अउ एक विशेष नियम मा बंधाय रथे। वैसे बंधाय मा ही रीतिनीति संरक्षित होथे। बंधाय छंदाय मा ही बइला ले खेत जोताथे। भर्री ला मेड़ बनाके बांधे ले ही खेत बनथे, नदी ला बांधे ले सिचाई अउ बिजली उत्पन्न होथे। कहे के मतलब नियम धियम मा बंधे ले ही काम धाम निपटथे, ता हमन काबर ऐती तेती के सोचथन?

छत्तीसगढ़ के पावन धरती धन्य हे जिहां दुनिया के पहली छंद आदिकवि महर्षि बाल्मिकी के मुख ले कौंच पक्षी के जोड़ा ला लहूलुहान देख निकलिस। हमर तुरतुरिया मा आजो बाल्मिकी जी के आश्रम विद्यमान हे। छत्तीसगढ़ के माटी धन्य हे कि रामगढ़ के पहली मा कवि कालिदास मेघदूत अउ अपन अन्य छंदबद्ध ग्रंथ के सृजन करिन।  छत्तीसगढ़ के माटी ले ही दुनिया ला छंदशास्त्र के दुर्लभ ग्रंथ छंद प्रभाकर, छंद सारावली अउ काव्य प्रभाकर जगन्नाथ प्रसाद भानु जी के कर कलम ले मिलिस। अउ जगन्नाथ प्रसाद भानु जी के जनम भुइँया ये बिलासपुर घलो धन्य हे जिहां ये पावन यज्ञ सजे हे। अनेक ऋषिमुनि के संगे संग धनी धरम दास, आमीन माता, संत गुरुघासी जी मन के छंदबद्ध बानी छत्तीसगढ़ मा आदिकाल गूंजत हे। हमर वाचिक परम्परा के भजन कीर्तन अउ गीत कविता आजों मंदरस कस मीठाते।  अइसन मा भला छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य ‘छंद’ ले कइसे विमुख हो सकथे। छत्तीसगढ़ी काव्य मा छंद पहली घलो लिखे जावत रिहिस अउ आजो लिखे जावत हे। अउ छन्द के ये धरा मा पहली घलो वर्चस्व रिहिस, आजो हे अउ अवइया बेरा मा घलो रही। 

                 छत्तीसगढ़ी काव्य मा छंद यात्रा वाचिक परम्परा के रूप मा बड़ जुन्ना समय ले चलत आवत हे। लिखित साहित्य के बात करथन ता छत्तीसगढ़ मा राज करइया राजा मनके दरबारी कवि मन के कुछ छत्तीसगढ़ी काव्य मा दिखथें, फेर उपलब्धता नगण्य स्थिति मा हे। कबीर दास जी के चेला धनी धरम दास जी के काव्य ही लिखित रूप मा सामने आथे। जेमा दोहा, सरसी, सार छंद के आलावा साखी शबद अउ पद हवै। उंखर धर्मपत्नि आमीन माता के पद के जिक्र घलो छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य मा मिलथे। संत गुरुघासी दास जी के गुरुवाणी मा घलो छंद के पुट दिखथे। विशुद्ध छत्तीसगढ़ी छंदबद्ध काव्य काहन ता पं. सुंदरलाल शर्मा जी द्वारा रचित खंडकाव्य दानलीला ही सामने आथे, जेमा दोहा, सार, तोतक, लावणी, चौपाई आदि छंद स्पष्ट दिखथे। दानलीला के आलावा सुंदरलाल शर्मा जी के अउ छंदबद्ध कविता घलो मिलथे।अन्य छंद लिखइया जुन्ना कवि मा शुकलाल प्रसाद पांडेय, मुकुधरपाण्डेय, बंसीधर पांडेय, नारायण लाल परमार, कुंजबिहारी चौबे, द्वारिकाप्रसाद तिवारी विप्र, कोदूराम दलित, नरसिंह दास, दानेश्वर शर्मा, श्यामलाल चतुर्वेदी जी के साथ साथ लक्ष्मण मस्तुरिया, लाला जगदलपुरी, बुधराम यादव, रामह्र्दय तिवारी, अरुण निगम, शंकुन्तला शर्मा, रमेश कुमार चौहान, चोवाराम वर्मा बादल  अउ बहुत अकन युवा कवि मन आज छंदबद्ध सृजन करत हें। वर्तमान समय तक लगभग 70, 80 विशुद्ध छंदबद्ध पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा मा छप चुके हे, जे हम सब बर गर्व के बात ए। छत्तीसगढ़ी भाषा मा छंद न सिर्फ लिखे छपे जावत हे, बल्कि चारों मुड़ा सोसल मीडिया मा छाए दिखथे। कवि सम्मेलन के मंच होय या रेडियो, टीवी या अन्य निजी चैनल सब कोती छंदबद्ध रचना दिखथे।

        

                हमर छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य घलो बड़ सजोर हे। हमर लोकगीत लोकगाथा, लोक नाट्य मन के एक विशेष लय तान हे, ते पाय के ओमा छंद के उपस्थिति ला नकारे नइ जा सके। भले मात्रा थोर बहुत ऊँचनीच हे, फेर लय वइसनेच होथे। मात्रा के ऊँचनीच के कारण वाचीक परम्परा हो सकथे, काबर कि ये सब जुन्ना समय ले बोलचाल माध्यम मा ही आज तक आय हे। अइसन छंद लोकछन्द कहिलाथे। भरथरी, पंडवाणी, ढोलामारू गाथा, अहिमन रानी गाथा, केवला रानी गाथा, फुलबासन गाथा, पचरा देवी गीत, फाग गीत, सोहर गीत, बिहाव पठवनी गीत,चंदैनी गीत, देवार गीत, गौरागौरी गीत, गोरखबानी, आल्हा आदि लोक गीत मन अपन विशेष धुन, लय अउ ताल के कारण छत्तीसगढ़ के लोक छंद के रूप मा स्थापित हे। 

              

                जेन चीज नियम धियम मा चलथे ओखर शास्त्र होथे। ते पाय के छंद के घलो शास्त्र हे। छंद अउ छंद शास्त्र के सम्बंध भाषा अउ व्याकरण के समान होथे। छंद ला साधे ले वो भाषा के व्याकरण पुष्ट होथे, काबर कि छंद व्याकरण के अभिन्न अंग आय। हिंदी के व्याकरण मा सब छंद पढ़थन। छत्तीसगढ़ी के घलो नवा व्याकरण पुस्तक बिलासपुर ले डॉ विनोद कुमार वर्मा अउ डॉ विनय पाठक जी के सम्पादन मा निकले हे, जेमा छंद के हिंदी के व्याकरण पुस्तक ले भी ज्यादा उदाहरण अउ जानकारी हे। छंद के प्रस्तुति या लेखन के भाषा अलग अलग हो सकथे फेर नियम धियम एके रथे। छंदबद्ध कविता कालजयी होथे, काबर कि वोमा सहज गेयता होथे, सुस्पष्टता होथे, श्रव्यता होथे, प्रभावी होथे, श्रमसाध्य होथे। छंदशास्त्र मा अतका अकन छंद के विधान हे, कि ओखर गिनती करना मुश्किल हे। डॉ एस एन दास गुप्त के अनुसार “समस्त विश्व का साहित्य किसी न किसी छंद से निबद्ध है।” कई कवि मा नवा छंद बनाए के बात करथें, जे केवल भ्रम आय। जइसे अपन घर के कोठा, बारी, कोठार जाय के रद्दा ला सड़क नइ कहि सकन वइसने बात नवा छंद मा लागू होथे। जइसे सड़क बनाए बर अच्छा जघा, बने नाप तोल, बने डामर गिट्टी अउ सड़क विभाग के बने जानकार मनखें मन के जरूरत पड़थे, वइसने नवा छंद के निर्माण  घलो भाषा शास्त्री मन विशेष माप तोल के तर्क अउ शास्त्र सम्मत करथें। विशेष नापतौल मा बने सड़क मा सब चलथें, अउ नियम मा चलथें (जइसे डेरी हाथ कोती जाना, निश्चित स्पीड मा गाड़ी चलाना आदि आदि)। सड़क मा मनमानी बिल्कुल भी नइ चले, वइसने होथे शास्त्र जिहां नियम धियम मा चले बर पड़थे। तभे तो महत्ता बढ़ जाथे। जे महत्व गीत मा शास्त्रीय गीत के हे, नृत्य मा शास्त्रीय नृत्य के हे, वइसने महत्ता शास्त्रीय छंद के हे। ते पाय के छन्द आदिकाल ले आज तक जीवित हे अउ जन जन के मुख मा रचे बसे हे। छंद के दू अर्थ होथे,आच्छादन अउ आह्लादन। आच्छादन माने रस, भाव अउ वर्ण्य विषय ला आच्छादित करना, जबकि आह्लादन मतलब मानव मन के मनोरंजन करना। कोनों भी काव्य होय जग अउ जन रंजन बर होथे, आत्म रंजन के कोई स्थान नइहे। छंद शास्त्र ले वैदिक अउ लौकिक रूप मा पढ़े देखे सुने बर मिलथे, वो वास्तव मा अद्भुत हे।  संस्कृत ला छोड़ के बात करन ता छन्द ज्यादातर क्षेत्रीय भाषा मा ही शोभायमान हे। चाहे अवधी होय, ब्रज होय, कोशली होय, मैथिली होय, बघेली होय या फेर छत्तीसगढ़ी,ये सब भाषा मा मलिक मोहम्मद जायसी, तुलसी, सुर, रहीम, कबीर, केशव, घाघ, भिखारीदास, घनानंद जइसे कतको विद्वान कवि मन कलम चलाये हें। आज खड़ी बोली मा घलो छन्द लिखे जावत हे। छत्तीसगढ़ी जेन पूर्वी हिंदी के एक भाषा आय अपन छंदबद्ध काव्य साहित्य ले लगातार पोठ होवत हे। मात्रिक अउ वर्णिक दुनो प्रकार जे छन्द सरलग छत्तीसगढ़ी मा लिखे जावत हे। वो दिन दूर नइहें जब छत्तीसगढ़ी भाषा के छंदबद्ध साहित्य घलो ब्रज, अवधी अउ मैथली कस अपन विशिष्ट स्थान बनाही। एखर बर जुन्ना समय मा लिखित काव्य साहित्य के अध्ययन, विश्लेषण अउ नवा सृजन जरूरी हे। साहित्य अउ कला भाषा के सबके बड़े रखवार होथे। तुलसी दास जी रामचरित लिखत बेरा कभू नइ सोचिस होही कि, फलां छत्तीसगढ़ी शब्द आगे, फलां बघेली होगे या फलां शब्द मैथली होगे, जबकि उन मन अवधी के कवि रहिन। ता हमन काबर सोचथन कि सबे चीन छत्तीसगढ़ी मा होय। हाँ फेर जोन भी भाषा के शब्द लेन वो वाक्य ला सरल,सहज अउ प्रवाहमय बनाय। “भले लिखाय कम। फेर वो लिखाय मा रहे दम। जुन्ना समय मा कोन कहाँ का पढ़िस कोन जानथे, फेर का लिखिस सब जानथन। ता अपन भाषा मा लिखव रमके अउ जमके। छन्द लिखे बर महिनत तो चाही ही चाही, काबर कि मात्रा के सवाल रथे। ता फल घलो तो पोठ मिलथे। तुलसी दास जी राम चरित मानस के रचना मात्रा गिन गिन के तो नइ करे होही? नही ते पहा जातिस, वइसे दू साल ग्यारह महीना ले आगर दिन कमती नोहे, तभो लय पकड़ा जाय ले कोनो भी छन्द जल्दी लिखाथे। ता छन्द बर विधान के साथ साथ लय के जानकारी होना घलो जरूरी हे।

 कुछ प्रचलित गीत कविता उदाहरण स्वरूप  सादर रखत हँव-


1,तातंक छंद- 

बुंदेले हरबोलों के मुँह, हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो, झाँसी वाली रानी थी।


2, चौपाई छंद-

जिसने सूरज चाँद बनाया। जिसने तारों को चमकाया।।

जिसने फूलों को महकाया। जिसने चिड़ियों को चहकाया।।


उठो लाल अब आंखे खोलो। पानी लाई हूं मुंह धोलो।।


3, सार छंद-

यह कदंब का पेड़ अगर माँ, होता यमुना तीरे।

मैं भी उस पर बैठ कन्हैया, बनता धीरे-धीरे।।


मां खादी की चादर दे दे, मैैैं गांधी बन जाऊं।

छन्नर छन्नर पैरी बाजे, खन्नर खन्नर चूरी।

हाँसत कूदत मटकत रेंगे, बेलबेलही टूरी।।(दलित जी)


4, लावणी छंद-

फूल तुम्हे भेजा हूं खत में, फूल नही मेरा दिल है।(फिल्मी गीत)


5, आल्हा छंद-

जिहां भिलाई कोरबा ठाढ़े, पथरा सिरमिट भरे खदान।

तांबा पीतल टीन कांच के, इहि माटी मा थाती खान।।(लक्ष्मण मस्तुरिया)


6, सरसी छंद-

राउत दोहा-अरसी फुले घमाघम भैया, मुनगा फुले सफेद।

बालकपन मा केंवरा बदे, जवानिकपन मा भेंट।।


7, जयकारी छंद-

हुए बहुत दिन बुढ़िया एक। चलती थी लाठी को टेक।

उसके पास बहुत था माल। जाना था उसको ससुराल।


अइसने कई प्रचलित छंदात्मक हिंदी, छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी गीत कविता हे, जेखर लय ला धरके छंद सहज लिखे जा सकत हे।


               छत्तीसगढ़ी के व्याकरण घलो बड़ जुन्ना हे, अउ लगातार व्याकरण के कोठी भरत जावत हे। छत्तीसगढ़ी आज सिर्फ बोली नही, बल्कि भाषा के रूप ले चुके हे। छत्तीसगढ़ी के लिपि हिंदी कस देवनानगरी ही हे। जे हिंदी, भोजपुरी, बघेली अउ अवधी भाषा ला घलो कुछ न कुछ समझ आ जथे। यदि कोई छत्तीसगढ़ी ले भागथे, दुरिहाथे ता वो मनखें समझ के घलो नासमझ बने के ढोंग करथे। छत्तीसगढ़ी मा कुकुर ला तू कहिबे ता पाछू लग जथे। बिलई ला मुनुमुनु कहिबे ता आ जथे। गाय गरुवा हई आ, ओहो तोतो ला समझथे, कुकरी कुकरा ला कुरु कुरु कहिके ता समझके तीर मा आ जथे,  ता हमन तो मनखें आन, थोर बहुत समय लगही बोले समझे मा अउ छत्तीसगढ़ी कोनो आन भाषा घलो नोहे महतारी भाषा ए, ता एला सिर्फ बोलना, लिखना,पढ़ना अउ समझना भर नइहे, बल्कि उचित स्थान अउ सम्मान दीवाये बर लगही। तभे ये माटी मा जनम धरेन तेखर कर्जा उतरही। आज छत्तीसगढ़ के कतको मनखें अभी नवा फिलिम धुरंधर आय हे तेखर एक अइसन गीत जेन समझ नइ आय वोमा नाचत झूमत गावत हे, अइसनेच बाहुबली के समय घलो होय रिहिस। मनखें मन कालके के काल्पनिक भाषा ले बोलत दिखे। ता संगवारी हो हमर छत्तीसगढ़ी तो आदि समय ले चलत मनभावन अउ गुरतुर भाँखा ए, एला बोले, लिखे, पढ़े मा कोताही काबर। हिंदी साहित्य के इतिहास ले लोक  भाषा अवधी ल नइ निकाले जा सके, काबर कि अवधी मा तुलसी, जायसी,कुतबन जैसे कतको आदिकालीन अउ भक्तिकालिन कवि मन दुर्लभ अउ कालजयी साहित्य गढ़ें हे।  रसखान, सुर, मीरा जैसे अउ कई कवि कवियित्री मन के कारण ब्रज घलो जन्मों जनम हिंदी साहित्य के हिस्सा रही। केशव, घनानन्द जैसे कवि मन के कारण मैथली ल नइ बिसारे जा सके। जबकि ये सब लोक भाषा आय। अइसन मा छत्तीसगढ़ी बर काबर सोचेल लगत हे? एखर एके कारण हे आज भी छत्तीसगढ़ी मा कायजयी अउ जादा से जादा छंदबद्ध सृजन के जरूरत हे, ता भला सृजन कोन करही? हमी मन न। ता आवन छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर सब  मिलके छंद,गीत,कविता,कहानी आदि सबे विधा मा सृजन करीं, अउ छत्तीसगढ़ी ला घलो हिंदी साहित्य में संघेरी। जय छत्तीसगढ़। जय जय छत्तीसगढ़ी


धन्यवाद

प्रस्तुति:-जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”

बाल्को, कोरबा(छग)

मुसवा हाथी जइसे(मात्रा-16,12)

 मुसवा हाथी जइसे(मात्रा-16,12)


छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।

सात करोड़ी धान डकारे, खबर आय हे अइसे।।


चांटी खाही अब पर्वत ला, दिंयार लोहा सोना।

निगल जही अजगर धरती ला, नइ बाँचे कुछु कोना।।

दूध दही गुड़ माखन मिश्री, कहही पथरा खइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


जंगल ला छेरी हा चरके, लगथे बिरान करही।

नवा सड़किया उजड़ जही अब, रेंगय बछिया मरही।।

सागर के पानी पी जाही, बूड़े बुढ़वा भइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


रखवारे के नीयत नइहे, देन कोन ला बद्दी।

कोन जनी कल का हो जाही, गोल्लर तिर हे गद्दी।।

ये कलजुग अउ राजपाठ के, होही विनाश कइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

लावणी छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 


लावणी छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


नहा खोर के बड़े बिहनियाँ, सँकरायत परब मनाबों।

दया मया के माँजा धरके, सुख शांति के पतंग उड़ाबों।


दान धरम पूजा व्रत करबों, गाबों मिलजुल के गाना।

छोट बड़े के भेद मिटाबों, धरबों इंसानी बाना।

खीर कलेवा खिचड़ी खोवा,तिल गुड़ लाडू खाबों।

नहा खोर के बड़े बिहनियाँ, सँकरायत परब मनाबों।


सुरुज देव ले तेज नपाबों,मंद पवन कस मुस्काबों।

सरसो अरसी चना गहूँ कस,फर फुलके जिया लुभाबों।

रात रिसाही दिन बढ़ जाही, कथरी कम्म्बल घरियाबों।

नहा खोर के बड़े बिहनियाँ, सँकरायत परब मनाबों।


मान एक दूसर के करबों,द्वेष दरद दुख ले लड़बों।

आन बान अउ शान बचाके, सबके अँगरी धर बढ़बों।

लोभ मोह के पाके पाना, जुर मिल सब झर्राबों।

नहा खोर के बड़े बिहनियाँ, सँकरायत परब मनाबों।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छत्तीसगढ़)


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मकर सक्रांती आगे

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बर   पीपर  पाना  के,

बनाके  फिलफिल्ली।

रस्सी डोरी म बाँध के,

कागत  अउ  झिल्ली।

मगन   होके   लइका,

हवा  के उल्टा  भागे।

मकर सक्रांती  आगे।

मकर सक्रांती  आगे।


कखरो  खिसा  म हे,

तिली लाड़ू,मुर्रा लाड़ू

त  कखरो  खिसा म,

अंगाकर,चीला रोटी।

खेले   बर  निकले हे,

संगी   संगवारी  संग,

बिहनिया  के   होती।

जुड़  - जुड़   जाड़ हे,

घाम तीर सब  लोरे हे।

कोनो लइका नाचत हे,

त  कोनो   कुड़कुडाय,

हाथ        जोड़े      हे।

माँघ के  महीना   देख,

जाड़ ;जाय बर   लागे।

मकर  सक्रांती   आगे।

मकर  सक्रांती   आगे।


चूल्हा तीर ले दाई,उठत नइ हे।

चाहा चलत   हे , ददा   पानी ;

पूछत              नइ          हे।

घाम         ल               घलो,

पारा भर मिल के ;तापत  हे ।

डोकरी  दाई   लइका खेलाय,

त डोकरा बबा ढेरा आँटत हे।

कोनो बांटी अउ गिल्ली खेले,

त  कोनो   मताय      भँवरा।

चूरे सेमी साग;तात-तात भात,

झड़क     उपरहा      कँवरा।

बहिनी       खेले     बिल्लस,

छुन  -  छुन     छांटी   बाजे।

मकर      सक्रांती      आगे।

मकर      सक्रांती      आगे।


मिंसा -  कुटा     के    धान,

धरागे  कोठी - मइरका  म।

हरही  गाय ल ढिल  मिलगे,

बियारा के ओधे खइरपा म।

उतेरा-ओन्हारी के  रखवारी,

भारी          चलत        हे।

पढ़इया  - लिखइया  मनके,

तियारी;  भारी   चलत   हे।

मेला  - मड़ई  नाचा - कूदा,

गाँव  -  गाँव     म    छागे।

मकर     सक्रांती     आगे।

मकर     सक्रांती     आगे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


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मकर सक्रांति(सार छंद)


सूरज जब धनु राशि छोड़ के,मकर राशि मा जाथे।

भारत  भर  के मनखे मन हा,तब  सक्रांति  मनाथे।


दिशा उत्तरायण  सूरज के,ये दिन ले हो जाथे।

कथा कई ठन हे ये दिन के,वेद पुराण सुनाथे।

सुरुज  देवता हा सुत शनि ले,मिले इही दिन जाये।

मकर राशि के स्वामी शनि हा,अब्बड़ खुशी मनाये।

कइथे ये दिन भीष्म पितामह,तन ला अपन तियागे।

इही  बेर  मा  असुरन  मनके, जम्मो  दाँत  खियागे।

जीत देवता मनके होइस,असुरन नाँव बुझागे।

बार बेर सब बढ़िया होगे,दुख के घड़ी भगागे।

सागर मा जा मिले रिहिस हे,ये दिन गंगा मैया।

तार अपन पुरखा भागीरथ,परे रिहिस हे पैया।

गंगा  सागर  मा  तेखर  बर ,मेला  घलो  भराथे।

भारत भर के मनखे मन हा,तब सक्रांति मनाथे।


उत्तर मा उतरायण खिचड़ी,दक्षिण पोंगल माने।

कहे  लोहड़ी   पश्चिम  वाले,पूरब   बीहू   जाने।

बने घरो घर तिल के लाड़ू,खिचड़ी खीर कलेवा।

तिल अउ गुड़ के दान करे ले,पायें सुख के मेवा।

मड़ई  मेला  घलो   भराये, नाचा   गम्मत   होवै।

मन मा जागे मया प्रीत हा, दुरगुन मन के सोवै।

बिहना बिहना नहा खोर के,सुरुज देव ला ध्यावै।

बंदन  चंदन  अर्पण करके,भाग  अपन सँहिरावै।

रंग  रंग  के  धर  पतंग  ला,मन भर सबो उड़ाये।

पूजा पाठ भजन कीर्तन हा,मन ला सबके भाये।

जोरा  करथे  जाड़ जाय के,मंद  पवन  मुस्काथे।

भारत भर के मनखे मन हा,तब सक्रांति मनाथे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)



मुसवा मन रइपुर में- सार छन्द

 मुसवा मन रइपुर में- सार छन्द


बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।

खाय धान ला हवै पचावत, नाचत गावत सुर में।।


मुड़ धर बइठे हे लंबोदर, बिलई देखत भागे।

धाने भर मा पेट भरे नइ, खाथें कुकरी सागे।।

सजा बदी नइ लागे वोला, चपकाये नइ खुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


घूम घूम के चारो कोती, खोजत रहिथें दौलत।

कुछ बिगाड़ नइ पाये ओखर, नीर घलो हा खौलत।।

सेना भारी डेना भारी, उमियायें मदचुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


धरा गगन पाताल घलो ला, भाजी पाला जाने।

सात पुस्त बर माल सकेले, बेच धरम ईमाने।।

बेरा रहिते दे बर पड़ही, मिला दवाई गुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मुसवा(सार छंद)

 

मुसवा(सार छंद)


कुरकुर-कुरकुर करे रात दिन,मुसवा करिया करिया।

कुटी  कुटी  कपड़ा  ला  काटे,मति हा जाथे छरिया।


खा खा के भोगाये हावै,धान चँउर फर भाजी।

भँदई पनही घलो तुनागे,नइ बाँचत हे खाजी।

कभू खोधरे परवा छानी,अउ घर अँगना कोड़े।

तावा के रोटी ला झड़के,आरुग कुछु नइ छोड़े।

चोरो बोरो घर हर लागे,कोला परगे परिया---------।

कुरकुर-कुरकुर करे रात दिन,मुसवा करिया करिया।


बिदबिद बिदबिद भागे भारी,खटिया मा चढ़ जावै।

हाथ  गोड़  ला घलो ककोने,नींद  कहाँ  ले आवै।

कुरिया कोठी कोठा कोला,सबे खूँट हे कोरा।

मुसवा  लेड़ी  मा भरगे हे,पाठ पठउँहा बोरा।

बरी बिजौरी बाँचत नइहे,नइ बाँचत हे फरिया------।

कुरकुर-कुरकुर करे रात दिन,मुसवा करिया करिया।


साँप असन पुछी दिखत हे,खरहा कस हे काया।

मनखे  तनखे  ला  नइ घेपे,मुसवा के बड़ माया।

आँखी लाल ठाढ़ मूँछ हे,देख बिलैया भागे।

छेना खरही माटी होगे,घर हा डोलन लागे।

भारी उधम मचावत हावै,चीं चीं चीं चीं नरिया------।

कुरकुर-कुरकुर करे रात दिन,मुसवा करिया करिया।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को (कोरबा)

भारतीय रेल और हिंदी छत्तीसगढ़ी गीत संगीत: एक संछिप्त अध्ययन

 भारतीय रेल और हिंदी छत्तीसगढ़ी गीत संगीत: एक संछिप्त अध्ययन


भारतीय रेल को भारत की जीवन रेखा कहा जाता है। यह केवल यात्रा और सामान ढुलाई का साधन नहीं है, बल्कि मनोरंजन और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का भी एक सशक्त माध्यम है। फिल्मों, गीतों और एल्बमों में रेलगाड़ी को विशेष स्थान दिया गया है, चाहे वह बॉलीवुड हो या क्षेत्रीय सिनेमा या एल्बम। रेलगाड़ी का सफर हर किसी के जीवन में किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है, और बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने रेल यात्रा का अनुभव न किया हो।  


 "रेल" शब्द अंग्रेज़ी से और "गाड़ी" शब्द हिंदी से मिलकर बना है, जबकि शुद्ध हिंदी में इसे "लोहपथगामिनी" कहा जाता है। अंग्रेजों ने 1837 में मद्रास में माल ढुलाई के लिए "रेल हिल" नामक मालगाड़ी का सर्वप्रथम प्रयोग किया था। बाद में यात्री परिवहन के लिए इसका विस्तार हुआ। भारत में यात्रियों के लिए पहली  रेलगाड़ी 16 अप्रैल 1853 को मुंबई से ठाणे के बीच चली थी। यह घटना भारतीय परिवहन इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है। भारत में पहली इलेक्ट्रिक ट्रेन 1925 में बॉम्बे सिटी से पुणे के बीच चली।  


भारतीय रेल का अपना एक अलग वृहद बजट होता है, और इसे स्वतंत्र रूप से संचालित किया जाता है। भारतीय रेल के जनक लॉर्ड डलहौजी को माना जाता है, जिन्होंने भारत में रेल को प्राथमिकता दी और इसके विस्तार की नींव रखी। 1951 में भारतीय रेल का राष्ट्रीयकरण किया गया और 42 विभिन्न रेलवे कंपनियों को मिलाकर छह क्षेत्रों में विभाजित किया गया।  


आज भारतीय रेल का नेटवर्क लगभग 115,000 किलोमीटर लंबा है और यह एशिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है। रोज़ाना लगभग 2.35 करोड़ यात्री रेल से सफर करते हैं, जो महाद्वीपीय देश ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से भी अधिक है। वर्तमान में भारतीय रेल के 19 जोन हैं, जिसमें बिलाससपुर 16 वे जोन के अन्तर्गत सम्मिलित है। अमेरिका, चीन और रूस के बाद रेल नेटवर्क के रूप में भारतीय रेल चौथे स्थान पर आता है।  


भारतीय रेल भीड़ का सामना करने में दुनिया की सबसे बड़ी व्यवस्था है। यह केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि आजीविका और अर्थव्यवस्था का अद्भुत आधार भी है। रेलगाड़ी भारतीय जीवन का अभिन्न अंग है—यात्रा, संस्कृति, साहित्य और मनोरंजन सभी में इसकी गहरी छाप है। यह न केवल लोगों को उनके गंतव्य तक पहुँचाती है, बल्कि भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना को भी मजबूती प्रदान करती है।


प्राप्त जानकारी के अनुसार 1930 के अमेरिकी मूक फ़िल्म में पहली बार ट्रेन को दिखाया गया। भारतीय सिनेमा में ट्रेन का दृश्य 1940 के बाद की फ़िल्मों में दिखाई देने लगा। सम्भवतः जवाब (1942) ही वह फ़िल्म है जिसमें पहली बार ट्रेन का दृश्य और ट्रेन को लेकर गीत प्रस्तुत किया गया। पुराने समय के कुछ गीत विशेष रूप से ट्रेन में गाए गए हैं। नए फ़िल्मों में तो ऐसे अनेक गीत मिल जाते हैं, पर यहाँ कुछ पुराने गीतों के नाम और उनकी फ़िल्मों के नाम प्रस्तुत हैं, जो ट्रेन में गाए गए हैं।

- तूफ़ान मेल, दुनिया ये दुनिया – जवाब (1942)  

- आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ – जागृति (1954)  

- देख तेरे संसार की हालत – नास्तिक (1954)  

- बस्ती बस्ती, पर्वत पर्वत – रेलवे प्लेटफॉर्म (1955)  

- है अपना दिल तो आवारा – सोलहवाँ साल (1958)  

- औरतों के डब्बे में – मुड़ मुड़ के ना देख (1960)  

- मैं हूँ झूम झूम झूमरू – झूमरू (1961)  

- मुझे अपना यार बना लो – बॉय फ्रेंड (1961)  

- मैं चली, मैं चली – प्रोफेसर (1962)  

- रुख से ज़रा नक़ाब हटा दो – मेरे हुज़ूर (1968)  

- मेरे सपनों की रानी – आराधना (1969)  

- हम दोनों दो प्रेमी – अजनबी (1974)  

- गाड़ी बुला रही है – दोस्त (1974)  

- होगा तुमसे प्यारा कौन – ज़माने को दिखाना है (1977)  

- पल दो पल का साथ हमारा – द बर्निंग ट्रेन (1980)  

- हाथों की चाँद लकीरों का – विधाता (1982)  

- सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं – कुली (1983)  

- साजन मेरा उस पार है – गंगा, जमुना, सरस्वती (1988)  

-यूँ ही कट जाएगा सफ़र-   हम हैं राही प्यार के(1993)

- कब से कर रहे हैं तेरा इंतज़ार – कभी हाँ कभी ना (1994)  

- छैया छैया – दिल से (1998)  

- कस्तो मज़ा है रेलैमा – परिणीता (2005)  

- मनु भैय्या क्या करेंगे – तनु वेड्स मनु (2011)  


रेल से सम्बंधित नामो को लेकर भी भारतीय सिनेमा में सैकड़ो फिल्म बनाएं गए है, कुछ चर्चित फिल्मो के नाम इस प्रकार है-

-रेलवे प्लेटफार्म(1955)- अभिनेता सुनीलदत्त, ये फिल्म एक ट्रेन स्टेशन पर फंसे यात्रियों और उनके बीच एक प्रेम त्रिकोण के इर्द-गिर्द घूमती है।

-ट्रेन टू पाकिस्तान (1998, हिंदी/पंजाबी) – खुशवंत सिंह के उपन्यास पर आधारित, विभाजन के समय ट्रेन और उससे जुड़ी त्रासदी पर केंद्रित।  

-द बर्निंग ट्रेन (1980) – लगभग ट्रेन पर ही फिल्माया गया है।

-द ट्रेन (2007, हिंदी) – इमरान हाशमी अभिनीत रोमांटिक थ्रिलर, ट्रेन यात्रा और रहस्य कथा पर केंद्रित।  

-प्लेटफार्म(2993)-अजय देवगन अभिनीत

-चेन्नई एक्सप्रेस (2013) – शाहरुख़ खान और दीपिका पादुकोण की सुपरहिट फ़िल्म, जिसका नाम और कहानी दोनों ट्रेन यात्रा से जुड़ी हैं।  

-लव एक्सप्रेस (2011) – एक हल्की-फुल्की रोमांटिक कॉमेडी, जिसमें ट्रेन यात्रा के दौरान कहानी आगे बढ़ती है। इसके आलावा और भी कई फिल्म हैं।


बॉलीवुड सिनेमा में ट्रेन को लेकर कई प्रसिद्ध गीत बने हैं। कुछ उल्लेखनीय गीत इस प्रकार हैं:  

- तूफ़ान मेल दुनिया रे दुनिया – फ़िल्म जवाब (1942)  

- गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है – फ़िल्म दोस्त (1974)  

- छुक-छुक छुक-छुक रेलगाड़ी, रेलगाड़ी – अशोक कुमार द्वारा गाया गया गीत, फ़िल्म आशीर्वाद (1968)  

- दिल्ली से रेलगाड़ी छुक-छुक आएगी, गुड्डे की डैडी जी को लाएगी– फ़िल्म सुहाग  

- कोई हसीना जब रूठ जाती है तो… स्टेशन से गाड़ी जब छूट जाती है – फ़िल्म शोले (1980)  

- राम करे टूट जाए रेलगाड़ी, मेरे साजन को जो ना लाई – फ़िल्म रुपए दस करोड़ (आशा भोसले का गीत)  

- मुंबई से रेल चली, दिल्ली से रेल चली – फ़िल्म लव मैरिज (1984)  

- इंजन की सीटी में म्हारे मन डोले, चला चला रे ड्राइवर गाड़ी होले-होले – फ़िल्म माँ, 

इसके अतिरिक्त और भी कई गीत है।


छत्तीसगढ़ी गीतों में भी रेलगाड़ी को लेकर कई चर्चित और पुराने गीत मिलते हैं। कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं:  

- कायाखंडी भजन – कैसा रेल बनाया जी? ए गा बनाने वाला कैसा रेल बनाया जी?  

- निकल जाबो रेल बैठ के – एक लोकप्रिय लोकगीत।  

- धुर्वाराम मरकाम और दुखिया बाई का गाया हुआ गीत – रेलगाड़ी छुक-छुक रेलगाड़ी छुक-छुक। रायपुर ले ये छूटे रे संगी, राजनांदगांव मा रुक-रुक। रेलगाड़ी छुक-छुक रेलगाड़ी छुक-छुक।  

- गोरेलाल बर्मन का सुमधुर गीत – तोर मोर माया के रेलगाड़ी गोरी सनसनानन चलन दे वो। नैन मिलाके टिकट कटाले, दोनों के बैठे के जगह बनाले। हरा बत्ती ला जलन दे न वो। तोर मोर माया के रेलगाड़ी गोरी सनसनानन चलन दे न वो।  

- एक बहुप्रचलित ददरिया- गाड़ी पछिन्दर छुकछुक करथे। तोला नइ देखों ता दिल धुकधुक करथे, छूट जाही वो परान।

- रेलगाड़ी रेलगाड़ी रेलगाड़ी रेल… चलो चली मिलके खेलबो, रेलगाड़ी खेल। रेलगाड़ी रेलगाड़ी रेलगाड़ी रेल… (यह गीत रेडियो में अक्सर बजता था और श्रोताओं को बहुत भाता था।) छत्तीसगढ़ी में और भी कई नए गीत है।


रेल सम्बंधी हजारों कविताओं में कुछ हिंदी कवि और उनकी रेल-आधारित कविताएँ प्रस्तुत है-

- आलोकधन्वा – कुछ चीज़ें अब भी अच्छी हैं (रेल यात्रा से जुड़ा अनुभव)  

- पंकज चतुर्वेदी – इच्छा (रेल संदर्भित कविता)  

- अरुण कमल – डेली पैसेंजर (रेल यात्री का जीवन)  

- संदीप तिवारी – घुमक्कड़ लड़की (रेल यात्रा का चित्रण)  

- उदय प्रकाश – रेलपथ (रेल और जीवन का रूपक)  

- निलय उपाध्याय – सफ़र, यात्रा, मुझे जिलाए रखने वाले का पता (रेल यात्रा और जीवन दर्शन)  

- विनोद कुमार शुक्ल – ट्रेन (रेल और संवेदनाओं का मेल)  

- राजेश जोशी – एक रेल गुज़रती है (रेल और समय का प्रतीक)  

- वीरेन डंगवाल – बैठना है तुम्हारे (रेल इंजन और जीवन का रूपक)  

- रवि भूषण पाठक – भाप इंजन (रेल इंजन पर कविता)  

- हेमंत देवलेकर – रेल (रेल और यात्राओं का चित्रण)  


छत्तीसगढ़ के कवियों ने भी छत्तीसगढ़ी और हिंदी में रेलगाड़ी को लेकर कविताएँ लिखी हैं। इनमें सुरेश पैगवार, संतोष मिरी, रामरतन श्रीवास, बलराम चंद्राकर जैसे कवि प्रमुख हैं। इसके अलावा और भी कई कवि हैं जिन्होंने रेलगाड़ी को विषय बनाकर अपनी कविताओं में चित्रण किया है।  


 बलराम चंद्राकर की बागीश्वरी सवैया उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत है-

चले रेलगाड़ी इहाँ ले वहाँ जी, सुहाना लगे मोर ए देश हा।

कहूँ मालगाड़ी सवारी कहूँ हे, जुड़े हे सबो छोर ए देश हा।।

दिये रेल लाखों करोड़ों ला रोटी, रखे हे बने शोर ए देश हा।

तरक्की मा भारी हवे रेलगाड़ी, तभे मारथे जोर ए देश हा।।


इस तरह रेलगाड़ी हमारे गीत-संगीत और जीवन में गहराई से समाहित है। रेलगाड़ी को लेकर अनेक बाल कविताएँ भी रची गई हैं, जिन्हें बच्चे बड़ी तन्मयता से सुनते हैं और बड़े भी उनमें डूब जाते हैं। रेलगाड़ी से सम्बन्धित कई रेलगाड़ी से संबंधित कुछ गीत हिंदी और छत्तीसगढ़ी में मैंने संकलित करने का प्रयास किया है। यह सूची पूर्ण नहीं है, क्योंकि गीत-संगीत की संख्या बहुत अधिक है। फिर भी, कुछ चुनिंदा गीत आपके मनोरंजन के लिए प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।  


संकलन

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मर लग गे फोटू विडियो-सार छंद*

 *मर लग गे फोटू विडियो-सार छंद*


होवत नइहें एक्को बूता, बिन हल्ला गुल्ला के।

धन दौलत इज्जत नइ बाँचे, घर दुवार खुल्ला के।।


तोपे ढाँके भात साग ला, कोन जुठारे सकही।

फेर मनुष मन आज बने हें, सिरतों जकहा जकही।।

सबे दिखावा मा बइठे हें, गाड़ा ला उल्लाके।

धन दौलत इज्जत नइ बाँचे, घर दुवार खुल्ला के।।


ददा छोड़के सगा छोड़के, धरे हवें मोबाइल।

फोटू विडियो बना बना के, मारत हें स्टाइल।।

फोटू के बिन होय भजन नइ, पंडित ना मुल्ला के।

धन दौलत इज्जत नइ बाँचे, घर दुवार खुल्ला के।।


देखइया मन देखत रइहीं, काम आय नइ एको।

गुण गियान के जिहाँ कदर नइ, तिहाँ कुच्छु झन फेको।।

तन मन ला कर देथे कँगला, आदत कहकुल्ला के।

धन दौलत इज्जत नइ बाँचे, घर दुवार खुल्ला के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मड़ई मेला(दोहा गीत)

 मड़ई मेला(दोहा गीत)


मोर  गाँव  दैहान   मा,मड़ई  गजब भराय।

दुरिहा दुरिहा के घलो,मनखे मन जुरियाय।


कोनो सँइकिल मा चढ़े,कोनो खाँसर फाँद।

कोनो  रेंगत  आत   हे,झोला   झूले  खाँद।

मड़ई मा मन हा मिले,बढ़े मया अउ मीत।

जतके हल्ला होय जी,लगे  ओतके  गीत।

सब्बो रद्दा बाट मा,लाली कुधरिल छाय।

मोर गाँव दैहान  मा,मड़ई  गजब भराय।


किलबिल किलबिल हे करत,गली खोर घर बाट।

मड़ई   मनखे    बर    बने,दया   मया   के   घाट।

संगी  साथी  किंजरे,धरके देखव हाथ।

पाछू  मा  लइका चले,दाई  बाबू साथ।

मामी मामा मौसिया,पहिली ले हे आय।

मोर गाँव  दैहान मा,मड़ई गजब भराय।


ओरी   ओरी   बैठ  के,पसरा  सबो   लगाय।

सस्ता मा झट लेव जी,कहिके बड़ चिल्लाय।

नान  नान  रस्ता  हवे,सइमो  सइमो होय।

नान्हे लइका जिद करे,चपकाये बड़ रोय।

खई खजानी खाय बर,लइका रेंध लगाय।

मोर  गाँव  दैहान  मा,मड़ई  गजब भराय।


चना चाँट गरमे गरम,गरम जलेबी लेव।

बड़ा  समोसा  चाय हे,खोवा पेड़ा सेव।

भजिया बड़ ममहात हे,बेंचावय कुसियार।

घूमय तीज तिहार कस,होके सबो तियार।

फुग्गा मोटर कार हा,लइका ला रोवाय।

मोर गाँव दैहान  मा,मड़ई गजब भराय।


बहिनी मन सकलाय हे,टिकली फुँदरी तीर।

सोना  चाँदी  देख  के, धरे  जिया  ना  धीर।

जघा जघा बेंचात हे, ताजा ताजा साग।

बेंचइया चिल्लात हे,मन भावत हे  राग।

खेल मदारी ढेलुवा,सबके मन ला भाय।

मोर गाँव दैहान  मा,मड़ई गजब भराय।


चँउकी  बेलन बाहरी,कुकरी मछरी गार।

साज सजावट फूल हे,बइला के बाजार।

लगा  हाथ  मा   मेंहदी,दबा  बंगला   पान।

ठंडा सरबत अउ बरफ,कपड़ा लगे दुकान।

कई किसम के फोटु हे, देखत बेर पहाय।

मोर  गाँव दैहान  मा,मड़ई  गजब भराय।


जिया भरे झोला भरे,मड़ई मनभर घूम।

संगी साथी सब मिले,मचे रथे बड़ धूम।

दिखे कभू दू चार ठन,दुरगुन एको छोर।

मउहा पी कोनो लड़े,कतरे पाकिट चोर।

मजा उही हा मारही,मड़ई जेहर आय।

मोर गाँव दैहान मा,मड़ई गजब भराय।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)



माँग होटल ढाबा के- कुंडलियाँ छंद

 माँग होटल ढाबा के- कुंडलियाँ छंद


मजबूरी मा खाय बर, होटल ढाबा होयँ।

फेर मनुष मन आज के, रोज खाय बर रोयँ।।

रोज खाय बर रोयँ, सबे होटल ढाबा मा।

हाँसत हें पोटार, दिखावा ला काबा मा।।

तन के रखें खियाल, तौंन मन राखयँ दूरी।

बनगे फैशन आज, रहै पहली मजबूरी।।


घर कस जेवन नइ मिले, मनखे तभो झपायँ।

रोज रोज पार्टी कही, घर ले बाहिर खायँ।।

घर ले बाहिर खायँ, जुरै संगी साथी सब।

कोन भला समझायँ, सबे ला भावै ये अब।।

खानपान वैव्हार, आज सब होगे करकस।

चैन सुकून पियाँर, कहाँ मिल पाही घर कस।।


आज जमाना हे नवा, होटल सब ला भायँ।

अपन हाथ मा राँध खा, पहली जन मुस्कायँ।

पहली जन मुस्कायँ, भात बासी खा घरके।

होटल जावैं आज, लोग लइका सब धरके।।

खा मशरूम पुलाव, भात ला मारे ताना।

पहुँच चुके हे देख, कते कर आज जमाना।


बासी कड़हा कोचरा, काय परोसा दान।

हाड़ी सँग वैपार हे, त का धरम ईमान।

त का धरम ईमान, सबें होटल ढाबा के।

का का राँध खवाय, तभो इतरायें खाके।

धन सँग तन बोहायँ, बने होटल के दासी।

होगे मनुष अलाल, खायँ होटल मा बासी।


पानी पइसा मा मिले, कणकण देवयँ तोल।

काय जानही वो भला,दया मया के मोल।

दया मया के मोल, जानही का होटल हा।

पइसा जा बोहायँ, कामकाजी अउ ठलहा।

रथे मसाला तेल, खायँ नइ दादी नानी।

नाती नतनिन पूत, बहू पीयें ले पानी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

गजब दिन भइगे

 गजब दिन भइगे


गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।

गुरुजी के गुर्रई अउ, सुँटी बेत देखे।।


दाई के दरघोटनी, सील लोड़हा के चटनी।

नजरे नजर झूलथे, पठउँहा के पटनी।।

बबा के ढेरा, अउ बारी के केरा।

कोठी काठा मरकी, गँजाये पेरा।।

कोदईधोना झेंझरी, नियम नेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।।


कोठा के झँउहा, खरहेरा गरू गाय।

पपीता मुनगा पेड़, सपना मा आय।।

गोबर के छर्रा छीटा, चूल्हा के आगी।

खुमरी मैनकप्पड़, साफा पागा पागी।।

तरिया के लद्दी, अउ नदी नरवा के रेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।।


घठोंदा के पचरी अउ, पथरा बुलाथे।

सल्हई पँड़की बोली, गजब मन भाथे।।

जुन्ना बर पीपर अउ, छींद बोइर जाम।

हरर हरर बूता अउ, मरत ले काम।।

नाक बोहई लइका के, सियानी चेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Sunday, 4 January 2026

फिल्मी गानों से सीखें छंद ========

 फिल्मी गानों से सीखें छंद ======== 

        फिल्मी गानों से सीखें छंद 

            फिल्म संसार में अधिकांश गाने किसी न किसी भारतीय सनातनी छंद पर आधारित हैं। इन गानों को बहुत ही आकर्षक धुन में गाया गया है और बहुत ही सम्मोहक पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया गया है। इस लिए ये गाने हमको सरलता से कंठस्थ हो जाते हैं और इनकी लय सहज ही मन में स्थापित हो जाती है। इस लय के अनुकरण से हम संबन्धित छंद की रचना कर सकते हैं और छंद के विधान को भी समझ सकते है। छंद है क्या ? लय का व्याकरण ही तो है छंद। यदि छंद की लय मन में बैठ जाये तो समझिए छंद भी मन में स्थापित हो गया, भले ही हम उसके विधान को शब्दों में व्यक्त न कर सकें। और यदि ऐसा हो गया तो फिर छंद के विधान को समझने में भी देर नहीं लगेगी, जिसके अंतर्गत लय के साथ चरण-संख्या, तुकांत विधान, यति आदि की बात भी सम्मिलित रहती है। आइये किसी एक गाने का उदाहरण लेकर बात करें- 

छोडो न मेरा’ आँचल, सब लोग क्या कहेंगे । 

हमको  दिवाना’  तुमको, काली घटा कहेंगे। 

 इस गाने की पंक्तियों को गाते समय गुरु और लघु पर ध्यान दें तो हम पाते हैं की प्रत्येक पंक्ति में लघु-गुरु एक निश्चित क्रम में ही आते हैं और वह क्रम इस प्रकार है- 

छोडो न/ मेरा’ आँचल/, सब लोग/ क्या कहेंगे 

221/ 2122/ 221/ 2122 अथवा 

गागाल गालगागा गागाल गालगागा 

यह मापनी अथवा लगावली  है उस छंद की, जिस पर यह गाना आधारित है और उस छंद का नाम है दिग्पाल। इसे मृदुगति भी कहते हैं। मूल छंद में ऐसी चार पंक्तियाँ होती हैं जिन्हें चरण कहते हैं और क्रमागत दो-दो चरण अलग-अलग समतुकांत होते हैं।  इस छंद पर या किसी अन्य छंद पर जब कोई गाना, गीत, गीतिका, ग़ज़ल या कोई अन्य कविता रची जाती हैं तब तुकांत विधान बदल जाता है और चरण-संख्या का प्रतिबन्ध समाप्त हो जाता है। तब इस छंद को हम उस रचना का ‘आधार छंद’ कहते हैं। प्रस्तुत उदाहरण में दिये गए फिल्मी गाने ‘छोडो न मेरा’ आँचल, सब लोग क्या कहेंगे’ का आधार छंद ‘दिग्पाल’ या ‘मृदुगति’ है। 

            आइए उपर्युक्त छंद को सम्मिलित करते हुए हम कुछ और भारतीय सनातनी छंदों की चर्चा करते हैं जिनके आधार पर अनेक फिल्मी गानों का निर्माण हुआ है जिनकी सहायता से हम इन छंदों के स्वरूप को सरलता से हृदयस्थ कर सकते हैं और इनके आधार पर शुद्धता और सटीकता के साथ मुक्तक, गीत, गीतिका, ग़ज़ल, भजन, कीर्तन, खंडकाव्य, महाकाव्य आदि की रचना कर सकते हैं। 


(1) दिग्पाल (या मृदुगति) छंद 

मापनी- 221 2122 221 2122 

लगावली- गागाल गालगागा गागाल गालगागा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) छोडो न/ मेरा’ आँचल/, सब लोग/ क्या कहेंगे 

2) सारे ज/हाँ से’ अच्छा/ हिन्दोस/तां हमारा 

3) गुज़रा हु/आ ज़माना/ आता न/हीं दुबारा  

4) ऐ दिल मु/झे बता दे/, तू किस पे’/ आ गया है? 

मूल छंद का उदाहरण- 

हमने कहा हृदय से, तुमने मज़ाक जाना,

बिखरा लहू हमारा, वह लाल रंग माना। 

वह खेल था तुम्हारा, तुम थे बड़े खिलाड़ी,

हम ही समझ न पाए, कितने रहे अनाडी।

- तिलक जैन 


(2) सुमेरु छन्द 

मापनी- 1222 1222 122 

लगावली- लगागागा लगागागा लगागा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) मुहब्बत अब/ तिजारत बन/ गयी है 

2) मै’ तन्हा था/ मगर इतना/ नही था

3) मुहब्बत कर/ने’ वाले कम/ न होगें

4) अकेले हैं/ चले आओ/ जहां हो

5) हमें तुमसे/ मुहब्बत हो/ गयी है

मूल छंद का उदाहरण- 

चलाती देश को यह भीड़ देखो,

उजाड़ा भीड़ का वह नीड़ देखो। 

कठिन पहचान है अपनी बचाना,

कहीं तुम भीड़ में ही खो न जाना। 

-स्वरचित 


(3) विधाता छंद 

मापनी- 1222 1222 1222 1222

लगावली- लगागागा लगागागा लगागागा लगागागा

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) सुहानी चां/दनी रातें/ हमे सोने/ नही देतीं

2) मुझे तेरी/ मुहब्बत का/ सहारा मिल/ गया होता

3) चलो इक बा/र फिर से अज/नबी बन जा/यॅँ हम दोनों

4) बहारों फू/ल बरसाओ/ मे’रा महबू/ब आया है 

5) सजन रे झू/ठ मत बोलो/ खुदा के पा/स जाना है 

मूल छंद का उदाहरण- 

ग़ज़ल हो या भजन कीर्तन , सभी में प्राण भर देता ,

अमर लय ताल से गुंजित , समूची सृष्टि कर देता l

भले हो छंद या सृष्टा , बड़ा प्यारा 'विधाता' है ,

सुहानी कल्पना जैसी , धरा सुन्दर सजाता है। 

- स्वरचित 


(4) शक्ति छंद  

मापनी- 122 122 122 12 

लगावली- लगागा लगागा लगागा लगा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) तुम्हारी/ नज़र क्यों/ खफा हो/ गयी, 

2) बदन पे/ सितारें/ लपेटे/ हुए ... 

3) दिखाई/ दिये यूँ/ कि बेखुद/ किया 

मूल छंद का उदाहरण- 

चलाचल चलाचल अकेले निडर,

चलेंगे हजारों, चलेगा जिधर l

दया-प्रेम की ज्योति उर में जला,

टलेगी स्वयं पंथ की हर बला l

- स्वरचित 


(5) वाचिक भुजंगप्रयात छंद 

मापनी- 122 122 122 122 

लगावली- लगागा लगागा लगागा लगागा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) तुम्हीं मे/रे’ मंदिर/ तुम्हीं मे/री’ पूजा/

2) वो’ जब या/द आये/ बहुत या/द आये । 

3) ते’रे प्या/र का आ/सरा चा/हता हूँ 

4) बने चा/हे’ दुश्मन/ जमाना/ हमारा 

5) अजी रू/ठकर अब/ कहाँ जा/इयेगा 

मूल छंद का उदाहरण- 

सदा काम आओ कभी मुँह न मोड़ो।

पड़ी हो मुसीबत सदा नेह जोड़ो।

सदा राम का नाम लेते रहोगे ।

बनेंगे सभी काम , विजयी बनोगे ।। 

- रीता ठाकुर 


(6) आनंदवर्धक (या पीयूषवर्ष) छंद 

मापनी- 2122 2122 212 

लगावली- गालगागा गालगागा गालगा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) दिल के अरमां/ आंसुओं में/ बह गए  

2) है अगर दुश्/मन ज़माना/ ग़म नहीं  

3) पर्वतों से/ आज मैं टक/रा गया

4) कल चमन था/ आज इक सह/रा हुआ

5) दिल ते’री दी/वानगी में/ खो गया

6) आपके पह/लू में’ आकर/ रो दिये 

मूल छंद का उदाहरण 

लोग कैसे , गन्दगी फैला रहे ,

नालियों में छोड़ जो मैला रहे l

नालियों पर शौच जिनके शिशु करें,

रोग से मारें सभी को, खुद मरें l  

- स्वरचित 


(7) सार्द्धमनोरम छंद 

मापनी- 2122 2122 2122 

लगावली- गालगागा गालगागा गालगागा 

छंदाधारित फिल्मी गाना- 

1) छोड़ दो आँ/चल ज़माना/ क्या कहेगा 

मूल छंद का उदाहरण- 

मानते भय से, कभी मन से नहीं कुछ। 

संहिताओं में नहीं अपना कहीं कुछ। 

पर्व ही केवल मनाते रह गये हम। 

देश का बस गान गाते रह गए हम। 

- ओम नीरव 


(8) वाचिक राधा 

मापनी- 2122 2122 2122 2 

लगावली- गालगागा गालगागा गालगागा गा 

छंदाधारित फिल्मी गाना- 

1) बस यही अप/राध में हर/ बार करता/ हूँ,

   आदमी हूँ/ आदमी से/ प्यार करता/ हूँ। 

मूल छंद का उदाहरण-  

कौन ऊपर बैठकर रसकुम्भ छलकाये।

छोड़ कर दो-चार छींटे प्यास उमगाये।

कौन विह्वलता धरा की देख मुस्काता,

छेड़ता है राग, गाता और इठलाता।

- ओम नीरव 


(9) गीतिका  (या वाचिक सीता) छंद 

मापनी- 2122 2122 2122 212 

लगावली- गालगागा गालगागा गालगागा गालगा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) आपकी नज़/रों ने’ समझा/ प्यार के का/बिल मुझे 

2) चुपके' चुपके/ रात दिन आँ/सू बहाना/ याद है 

मूल छंद का उदाहरण- 

शब्द के संग्राम में, तलवार है यह गीतिका। 

कायरों पर सिंहनी का वार है यह गीतिका। 

विश्व में हिन्दी हमारे राष्ट्र की पहचान है । 

गीतिका में हिन्द-हिन्दी का अमिट सम्मान है। 

- राहुल द्विवेदी स्मित 


(10) वाचिक महालक्ष्मी छंद 

मापनी- 212 212 212 

लगावली- गालगा गालगा गालगा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) ज़िंदगी/ की न टू/टे लड़ी 

2) ज़िन्दगी/ प्यार का/ गीत है 

मूल छंद का उदाहरण- 

साधना तुम, तुम्हीं सर्जना, 

कवि हृदय की तुम्हीं कल्पना। 

गीत हो तुम, तुम्हीं गीतिका। 

तुम महाकाव्य हो प्रीति का। 

- स्वरचित 


(11) वाचिक स्रग्विणी छंद 

मापनी- 212 212 212 212 

लगावली- गालगा गालगा गालगा गालगा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) खुश रहे/ तू सदा/ ये दुआ/ है मे’री  

2) कर चले/ हम फ़िदा/ जानो’-तन/ साथियों 

3) तुम अगर/ साथ दे/ने का’ वा/दा करो  

4) बेखुदी/ में सनम/ उठ गए/ जो कदम

5) मैं ते’रे/ इश्क में/, मर न जा/ऊँ कहीं 

6) जिन्दगी/ हर कदम/ इक नई/ जंग है 

7) जिंदगी/ का सफर/ है ये’ कै/सा सफर

मूल छंद का उदाहरण- 

दाढ़ियाँ हैं विविध, हैं विविध चोटियाँ।

धर्म की विश्व में हैं विविध कोटियाँ। 

क्या कहें उस मनुज के कथित धर्म को, 

जो जिये स्वार्थ में त्याग सत्कर्म को। 

- स्वरचित 


(12) वाचिक गंगोदक छंद 

मापनी- 212 212 212 212 212 212 212 212 

लगावली- गालगा गालगा गालगा गालगा गालगा गालगा गालगा गालगा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) तुम अगर/ साथ दे/ने का’ वा/दा करो/, मैं यूँ’ ही/ मस्त नग/मे सुना/ता रहूँ।

2) मैं ते’रे/ इश्क में/, मर न जा/ऊँ कहीं/ तू मुझे/ आजमा/ने की’ को/शिश न कर।  

मूल छंद का उदाहरण- 

छांदसी काव्य की सर्जना के लिए, भाव को शिल्प आधार दे शारदे ! 

साथ शब्दार्थ के लक्षणा-व्यंजना से भरा काव्य-संसार दे शारदे !

द्वेष की भीति को प्रीति की रीति से, दे मिटा स्नेह संचार दे शारदे ! 

विश्व की वेदना पीर मेरी बने, आज ऐसे सुसंस्कार दे शारदे ! 

- स्वरचित 


(13) वाचिक बाला छंद

मापनी- 212 212 2122 

लगावली- गालगा गालगा गालगागा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) रात भर/ का है’ मे’ह/मां अँधेरा 

2) आज सो/चा तो’ आँ/सू भराये

3) जा रहा/ है वफ़ा/ का जनाज़ा 

मूल छंद का उदाहरण- 

रोटियाँ चाहिए कुछ घरों को 

रोज़ियाँ चाहिए कुछ करों को 

काम हैं और भी ज़िंदगी में 

क्या रखा इश्क़-आवारगी में। 

- स्वरचित 


(14) वाचिक पंचचामर छंद 

मापनी- 12 12 12 12 , 12 12 12 12 

लगावली- लगा लगा लगा लगा, लगा लगा लगा लगा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

ये' ज़िं/दगी/ सवा/ल है/, कि ज़िन्/दगी/ जवा/ब है। 

मूल छंद का उदाहरण- 

जहाँ समान एकता खुशी वहाँ सदा मिले,

जहाँ नहीं समानता कहाँ समीपता मिले। 

बने प्रगाढ़ शृंखला कड़ी-कड़ी जहाँ मिले, 

जुड़े जहाँ अनेक हाथ लक्ष्य तो वहाँ मिले। 

- राजेश कुमारी 


(15) लावणी छंद (मापनीमुक्त) 

विधान- 30 मात्रा, 16,14 पर यति, अंत में वाचिक गा 

लावणी (30 मात्रा) = चौपाई (16 मात्रा) + 14 मात्रा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) गोरे गोरे चाँद से’ मुख पर, काली काली आंखें हैं। 

2) आओ बच्चों तुम्हे दिखायेँ, झाँकी हिंदुस्तान की ।  

3) खूब लड़ी मर्दानी थी वह, झांसी वाली रानी थी।  

4) फूल तुम्हें भेजा है खत में, फूल नहीं मेरा दिल है। 

5) एक डाल पर तोता बोले, एक डाल पर मैना। 

6) रात कली इक ख्वाब में' आई, और गले का हार हुई। 

7) कसमें वादें प्यार वफ़ा सब , बातें हैं बातों का क्या ?

8) रामचन्द्र कह गए सिया से , ऐसा कलियुग आएगा

मूल छंद का उदाहरण- 

तिनके-तिनके बीन-बीन जब, पर्ण कुटी बन पायेगी, 

तो छल से कोई सूर्पणखा, आग लगाने आयेगीl 

काम-अनल चन्दन करने का, संयम बल रखना होगा, 

सीता-सी वामा चाहो तो, राम तुम्हें बनना होगाl 

- स्वरचित 


(16) सार छंद (मापनीमुक्त) 

विधान- 28 मात्रा, 16,12 पर यति, अंत में वाचिक गागा 

सार (28 मात्रा) = चौपाई (16 मात्रा) + 12 मात्रा 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) रोते-रोते हँसना सीखो , हँसते-हँसते रोना। 

2) मेरे नैना सावन भादो , फिर भी’ मे’रा मन प्यासा 

मूल छंद का उदाहरण- 

कितना सुन्दर कितना भोला, था वह बचपन न्यारा l 

पल में हँसना पल में रोना, लगता कितना प्यारा l 

अब जाने क्या हुआ हँसी के, भीतर रो लेते हैं l 

रोते-रोते भीतर-भीतर, बाहर हँस देते हैं l 

- स्वरचित 


(17) पदपादाकुलक छंद 

विधान- 16 मात्रा, प्रारम्भ में गा/द्विकल अनिवार्य, इस गा/द्विकल के बाद एक त्रिकल आये तो उसके बाद पुनः दूसरा त्रिकल अनिवार्य। 

छंदाधारित फिल्मी गाना-

जब दर्द नहीं था सीने में,

क्या खाक मजा था जीने में। 

मूल छंद का उदाहरण- 

कविता में हो यदि भाव नहीं, 

पढने में आता चाव नहीं l 

हो शिल्प भाव का सम्मेलन, 

तब कविता होती मनभावन l  

- स्वरचित 


(18) मत्तसवैया/राधेश्यामी छंद (मापनीमुक्त) 

विधान- 32 मात्रा, 16,16 पर यति, 16-16 मात्रा के प्रत्येक पद के प्रारम्भ में गा/द्विकल अनिवार्य, इस गा/द्विकल के बाद एक त्रिकल आये तो उसके बाद पुनः दूसरा त्रिकल अनिवार्य। 

छंदाधारित फिल्मी गाना- 

दिल लूटने’ वाले जादूगर, अब मैंने’ तुझे पहचाना है।

मूल छंद का उदाहरण- 

जिस गर्भकोश में निराकार, आते-आते साकार हुआ,

इच्छा की भी न प्रतीक्षा की, ऐसा पोषण सत्कार हुआ। 

इच्छापेक्षी तरु कल्प लगा, जिसके आगे बस नाम-नाम,

विधि की ऐसी पहली कृति को, मन बार-बार करता प्रणाम। 

- स्वरचित 


(19) जयकरी/चौपई छंद (मापनीमुक्त) 

विधान- 15 मात्रा, अंत में गाल अनिवार्य 

छंदाधारित फिल्मी गाना- 

तौबा ये मतवाली चाल , 

झुक जाये फूलों की डाल। 

मूल छंद का उदाहरण- 

भोंपू लगा-लगा धनवान, 

फोड़ रहे जनता के कान l 

ध्वनि-ताण्डव का अत्याचार, 

कैसा है यह धर्म-प्रचार l 

- स्वरचित 


(20) चौपाई छंद (मापनीमुक्त) 

विधान- 16 मात्रा, अंत में गाल वर्जित। 

छंदाधारित फिल्मी गाने- 

1) दीवानों से ये मत पूछो,  

   दीवानों पे क्या गुज़री है । 

2) कहीं दूर जब दिन ढल जाये 

  शाम की' दुल्हन नजर चुराए 

मूल छंद का उदाहरण- 

बिनु पग चलै सुनै बिनु काना, 

कर बिनु करै करम विधि नाना l 

आनन रहित सकल रस भोगी, 

बिनु बानी बकता बड़ जोगी l

 - तुलसीदास 


      इन उदाहरणों की संख्या बहुत सीमित है जबकि छंदों की संख्या बहुत बड़ी है। सारे छंद तो निश्चित ही फिल्मी गानों से नहीं सीखे जा सकते हैं किन्तु अभी बहुत बड़ी संख्या में छंद शेष है जिन्हें फिल्मी गानों से सीखा जा सकता है। आप चाहें तो इस दिशा में आगे बढ़ सकते है। यदि कुछ ऐसे नये उदाहरण मिलते हैं तो मुझे भी सूचित कर कृतार्थ करें। 

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मेरा यह आलेख श्री सर्वेश अस्थाना द्वारा संपादित मासिक पत्र 'साहित्यगंधा' के अंकों सितंबर और अक्तूबर 2017 में क्रमशः प्रकाशित हो चुका है। 

- ओम नीरव , चलभाष- 08299034545, 07526063802

फिल्मी गानों से छंद

 

22 Dec 2021 · 13 min read

फिल्मी गानों से छंद

फिल्मी गानों से छंद
फिल्म संसार में अधिकांश गाने किसी न किसी भारतीय सनातनी छंद पर आधारित हैं। इन गानों को बहुत ही आकर्षक धुन में गाया गया है और बहुत ही सम्मोहक पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया गया है। इस लिए ये गाने हमको सरलता से कंठस्थ हो जाते हैं और इनकी लय सहज ही मन में स्थापित हो जाती है। इस लय के अनुकरण से हम संबन्धित छंद की रचना कर सकते हैं और छंद के विधान को भी समझ सकते है। छंद है क्या? मुख्यतः लय का व्याकरण ही तो है छंद। यदि छंद की लय मन में बैठ जाये तो समझिए छंद भी मन में स्थापित हो गया, भले ही हम उसके विधान को शब्दों में व्यक्त न कर सकें। और यदि ऐसा हो गया तो फिर छंद के विधान को समझने में भी देर नहीं लगेगी, जिसके अंतर्गत लय के साथ चरण-संख्या, तुकांत विधान, यति आदि की बात भी सम्मिलित रहती है। आइये कुछ फिल्मी गानों के उदाहरण लेकर बात करें।
उदाहरण – एक
पहले हम एक ऐसे फिल्मी गाने का उदाहरण लेते हैं जो मापनीयुक्त मात्रिक छंद पर आधारित है, जैसे-
छोडो न मेरा’ आँचल, सब लोग क्या कहेंगे ।
हमको दिवाना’ तुमको, काली घटा कहेंगे।
इस गाने की पंक्तियों को गाते समय गुरु अर्थात गा और लघु अर्थात ल पर ध्यान दें तो हम पाते हैं कि प्रत्येक पंक्ति में लघु-गुरु एक निश्चित क्रम में ही आते हैं और वह क्रम इस प्रकार है –
छोडो न/ मेरा’ आँचल/, सब लोग/ क्या कहेंगे
221/ 2122/ 221/ 2122 अथवा
गागाल गालगागा गागाल गालगागा
यह मापनी अथवा लगावली है उस छंद की जिस पर यह गाना आधारित है और उस छंद का नाम है दिग्पाल। इसे मृदुगति भी कहते हैं। मूल छंद में ऐसी चार पंक्तियाँ होती हैं जिन्हें चरण कहते हैं और क्रमागत दो-दो चरण अलग-अलग समतुकांत होते हैं। इस छंद पर या किसी अन्य छंद पर जब कोई गाना, गीत, गीतिका या कोई अन्य गेय कविता रची जाती हैं तब तुकांत और चरण संख्या का विधान बदल जाता है और तब इस छंद को हम उस रचना का ‘आधार छंद’ कहते हैं। प्रस्तुत उदाहरण में दिये गये फिल्मी गाने ‘छोडो न मेरा’ आँचल, सब लोग क्या कहेंगे’ का आधार छंद ‘दिग्पाल’ या ‘मृदुगति’ है।
उदाहरण – दो
पहले हम एक ऐसे फिल्मी गाने का उदाहरण लेते हैं जो मापनीयुक्त वर्णिक छंद के वाचिक रूप पर आधारित है, जैसे-
ज़िंदगी का सफर है ये’ कैसा सफर,
कोई’ समझा नहीं कोई’ जाना नहीं।
इस गाने की पंक्तियों को गाते समय गुरु अर्थात गा और लघु अर्थात ल पर ध्यान दें तो हम पाते हैं कि प्रत्येक पंक्ति में लघु-गुरु एक निश्चित क्रम में ही आते हैं और वह क्रम इस प्रकार है –
ज़िंदगी/ का सफर/ है ये’ कै/सा सफर,
कोई’ सम/झा नहीं/ कोई’ जा/ना नहीं।
212/ 212/ 212/ 212
गालगा गालगा गालगा गालगा
यह मापनी अथवा लगावली है उस छंद की, जिस पर यह गाना आधारित है और उस छंद का नाम है वास्रग्विणी अर्थात वाचिक स्रग्विणी। मूल छन्द में ऐसी चार पंक्तियाँ होती हैं जिन्हें चरण कहते हैं और क्रमागत दो-दो चरण अलग-अलग समतुकांत होते हैं। इस छंद पर या किसी अन्य छंद पर जब कोई गीत, गीतिका, मुक्तक या कोई अन्य गेय कविता रची जाती हैं, तब तुकांत और चरण संख्या का विधान बदल जाता है और तब इस छंद को हम उस रचना का ‘आधार छंद’ कहते हैं। प्रस्तुत उदाहरण में दिये गए फिल्मी गाने ‘ज़िंदगी का सफर है ये’ कैसा सफर’ का आधार छंद वास्रग्विणी है।
उदाहरण – तीन
अंत में हम एक ऐसे फिल्मी गाने का उदाहरण लेते हैं जो मापनीमुक्त मात्रिक छंद पर आधारित है, जैसे-
रामचन्द्र कह गये सिया से , ऐसा कलयुग आयेगा,
हंस चुगेगा दाना तुनका , कौआ मोती खायेगा।
इस इस गाने की पंक्तियों को गाते समय गुरु अर्थात गा और लघु अर्थात ल पर ध्यान दें तो हम पाते हैं कि प्रत्येक पंक्ति में लघु-गुरु किसी निश्चित क्रम में नहीं आते हैं अर्थात यह गाना जिस छंद पर आधारित है उसकी कोई निश्चित मापनी नहीं है। दूसरे शब्दों में यह एक मापनीमुक्त मात्रिक छंद है। ऐसे गाने को फिल्मी धुन में ही गाकर उसकी लय को हम अपने मन में स्थापित कर लेते हैं और फिर उसी लय पर अपनी रचना करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में छंद का व्याकरण अमूर्त रूप में हमारे मन में स्थापित हो जाता है लेकिन हम उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते हैं। इसे शब्दों में व्यक्त करने के लिए अर्थात इस लय के आधार-छंद को जानने के लिए किसी जानकार व्यक्ति अथवा पुस्तक का सहारा लेना आवश्यक हो जाता है। इस उदाहरण के गाने का आधार छंद ‘लावणी’ है। लावणी के एक चरण में 30 मात्रा होती हैं, 16,14 पर यति होती है, और अंत में वाचिक गा होता है। वस्तुतः यह छंद चौपाई की 16 मात्रा में मानव की 14 मात्रा मिला देने से बनता है। यथा-
रामचन्द्र कह गये सिया से
2121 11 12 12 2 (कुल 16 मात्रा का चौपाई)
ऐसा कलयुग आएगा
22 1111 222 (14 मात्रा का मानव)
अस्तु, लावणी = चौपाई + मानव
यदि इस छंद के चरण के अंत में गागा अनिवार्य हो तो ‘कुकुभ’ और यदि अंत में गागागा अनिवार्य हो तो ‘ताटंक’ छंद हो जाता है। ये दोनों छंद लावणी के अंतर्गत ही आते हैं। इसलिए जटिलताओं से बचते हुए लावणी पर सृजन करना अधिक सुविधाजनक रहता है।

विशेष
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम किसी छंद के नाम या विधान को नहीं जानते हैं लेकिन फिल्मी गानों के अनुकरण से उस छंद की लय मन में स्थापित कर लेते है और हम उस लय पर रचना करने में सक्षम हो जाते हैं। यह स्थिति रचनाकार के लिए बड़ी सहज और सुखद होती है। हाँ, यह बात अलग है की लय में होने वाली चूक को समझने और सुधारने के लिए उस लय का व्याकरण अर्थात आधार छन्द समझने की आवश्यकता बनी रहती है।
आइए उपर्युक्त छंदों को सम्मिलित करते हुए हम कुछ और भारतीय सनातनी छंदों की चर्चा करते हैं जिनके आधार पर अनेक फिल्मी गानों का निर्माण हुआ है। इन गानों की सहायता से हम छंदों के स्वरूप को सरलता से हृदयस्थ कर सकते हैं और इनके आधार पर शुद्धता और सटीकता के साथ मुक्तक, गीत, गीतिका, भजन, कीर्तन, खंडकाव्य, महाकाव्य आदि की रचना कर सकते हैं। ध्यान रहे कि मात्रापतन को उद्धरण चिह्न ( ’ ) से व्यक्त किया गया है।
उल्लेखनीय है कि फिल्मी गाने की जो पंक्ति उदाहरण में दी गयी है उसके आधार छन्द पार पूरे गाने का आधारित होना अनिवार्य नहीं हैं। गाने की अन्य पंक्तियाँ किसी अन्य छन्द पर भी आधारित हो सकती हैं।

(1) दिग्पाल (या मृदुगति) छंद
मापनी- 221 2122 221 2122
लगावली- गागाल गालगागा गागाल गालगागा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) छोडो न/ मेरा’ आँचल/, सब लोग/ क्या कहेंगे
2) सारे ज/हाँ से’ अच्छा/ हिन्दोस/तां हमारा
3) गुज़रा हु/आ ज़माना/ आता न/हीं दुबारा
4) ऐ दिल मु/झे बता दे/, तू किस पे’/ आ गया है?
मूल छंद का उदाहरण-
क्यों गीत के सहारे, धन चाहता कमाना,
उद्देश्य और ही कुछ, है सर्जना बहाना।
सम्मान गीत का यह, सर्वोच्च सर्व सुखकर,
वह गीत मीत बन कर, थिरके किसी अधर पर।

(2) सुमेरु छन्द
मापनी- 1222 1222 122
लगावली- लगागागा लगागागा लगागा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) मुहब्बत अब/ तिजारत बन/ गयी है
2) मै’ तन्हा था/ मगर इतना/ नही था
3) मुहब्बत कर/ने’ वाले कम/ न होगें
4) अकेले हैं/ चले आओ/ जहां हो
5) हमें तुमसे/ मुहब्बत हो/ गयी है
मूल छंद का उदाहरण-
चलाती देश को यह भीड़ देखो,
उजाड़ा भीड़ का वह नीड़ देखो।
कठिन पहचान है अपनी बचाना,
कहीं तुम भीड़ में ही खो न जाना।

(3) विधाता छंद
मापनी- 1222 1222 1222 1222
लगावली- लगागागा लगागागा लगागागा लगागागा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) सुहानी चां/दनी रातें/ हमे सोने/ नही देतीं
2) मुझे तेरी/ मुहब्बत का/ सहारा मिल/ गया होता
3) चलो इक बा/र फिर से अज/नबी बन जा/यॅँ हम दोनों
4) बहारों फू/ल बरसाओ/ मे’रा महबू/ब आया है
5) सजन रे झू/ठ मत बोलो/ खुदा के पा/स जाना है
मूल छंद का उदाहरण-
ग़ज़ल हो या भजन कीर्तन, सभी में प्राण भर देता ,
अमर लय ताल से गुंजित, समूची सृष्टि कर देताl
भले हो छंद या सृष्टा, बड़ा प्यारा ‘विधाता’ है ,
सुहानी कल्पना जैसी, धरा सुन्दर सजाता है।

(4) शक्ति (या वाभुजंगी) छंद
मापनी- 122 122 122 12
लगावली- लगागा लगागा लगागा लगा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) तुम्हारी/ नज़र क्यों/ खफा हो/ गयी,
2) बदन पे/ सितारें/ लपेटे/ हुए …
3) दिखाई/ दिये यूँ/ कि बेखुद/ किया
मूल छंद का उदाहरण-
चलाचल चलाचल अकेले निडर,
चलेंगे हजारों, चलेगा जिधर।
दया-प्रेम की ज्योति उर में जला,
टलेगी स्वयं पंथ की हर बला।

(5) वाभुजंगप्रयात छंद
मापनी- 122 122 122 122
लगावली- लगागा लगागा लगागा लगागा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) तुम्हीं मे/रे’ मंदिर/ तुम्हीं मे/री’ पूजा/
2) वो’ जब या/द आये/ बहुत या/द आये ।
3) ते’रे प्या/र का आ/सरा चा/हता हूँ
4) बने चा/हे’ दुश्मन/ जमाना/ हमारा
5) अजी रू/ठकर अब/ कहाँ जा/इयेगा
मूल छंद का उदाहरण-
अकेला अकेला कहाँ जा रहा हूँ,
कहो तो बता दूँ जहाँ जा रहा हूँ।
लगा मृत्यु से है भयाक्रांत मेला,
चला मृत्यु को भेंटने मैं अकेला।

(6) आनंदवर्धक छंद
मापनी- 2122 2122 212
लगावली- गालगागा गालगागा गालगा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) दिल के अरमां/ आंसुओं में/ बह गए
2) है अगर दुश्/मन ज़माना/ ग़म नहीं
3) पर्वतों से/ आज मैं टक/रा गया
4) कल चमन था/ आज इक सह/रा हुआ
5) दिल ते’री दी/वानगी में/ खो गया
6) आपके पह/लू में’ आकर/ रो दिये
मूल छंद का उदाहरण
लोग कैसे, गन्दगी फैला रहे,
नालियों में छोड़ जो मैला रहेl
नालियों पर शौच जिनके शिशु करें,
रोग से मारें सभी को, खुद मरेंl

(7) सार्द्धमनोरम छंद
मापनी- 2122 2122 2122
लगावली- गालगागा गालगागा गालगागा
छंदाधारित फिल्मी गाना-
छोड़ दो आँ/चल ज़माना/ क्या कहेगा
मूल छंद का उदाहरण-
मानते भय से, कभी मन से नहीं कुछ।
संहिताओं में नहीं अपना कहीं कुछ।
पर्व ही केवल मनाते रह गये हम।
देश का बस गान गाते रह गये हम।

(8) रजनी छन्द
मापनी- 2122 2122 2122 2
लगावली- गालगागा गालगागा गालगागा गा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) बस यही अप/राध में हर/ बार करता/ हूँ,
आदमी हूँ/ आदमी से/ प्यार करता/ हूँ।
2) आँसुओं में/ चाँद डूबा/ रात मुरझा/यी
मूल छंद का उदाहरण-
कौन ऊपर बैठकर रसकुम्भ छलकाये।
छोड़ कर दो-चार छींटे प्यास उमगाये।
कौन विह्वलता धरा की देख मुस्काता,
छेड़ता है राग, गाता और इठलाता।

(9) गीतिका छन्द
मापनी- 2122 2122 2122 212
लगावली- गालगागा गालगागा गालगागा गालगा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) आपकी नज़/रों ने’ समझा/ प्यार के का/बिल मुझे
2) चुपके’ चुपके/ रात दिन आँ/सू बहाना/ याद है
मूल छंद का उदाहरण-
शीत ने कैसा उबाया, क्या बतायें साथियों!
माह दो कैसे बिताया, क्या बतायें साथियों!
रक्त में गर्मी नहीं, गर्मी न देखी नोट में,
सूर्य भी देखा छुपा-सा, कोहरे की ओट में।

(10) वामहालक्ष्मी छंद
मापनी- 212 212 212
लगावली- गालगा गालगा गालगा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) ज़िंदगी/ की न टू/टे लड़ी
2) ज़िन्दगी/ प्यार का/ गीत है
मूल छंद का उदाहरण-
साधना तुम, तुम्हीं सर्जना,
कवि हृदय की तुम्हीं कल्पना।
गीत हो तुम, तुम्हीं गीतिका।
तुम महाकाव्य हो प्रीति का।

(11) वास्रग्विणी छंद
मापनी- 212 212 212 212
लगावली- गालगा गालगा गालगा गालगा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) खुश रहे/ तू सदा/ ये दुआ/ है मे’री
2) कर चले/ हम फ़िदा/ जानो’-तन/ साथियों
3) तुम अगर/ साथ दे/ने का’ वा/दा करो
4) बेखुदी/ में सनम/ उठ गए/ जो कदम
5) मैं ते’रे/ इश्क में/, मर न जा/ऊँ कहीं
6) जिन्दगी/ हर कदम/ इक नई/ जंग है
7) जिंदगी/ का सफर/ है ये’ कै/सा सफर
मूल छंद का उदाहरण-
दाढ़ियाँ हैं विविध, हैं विविध चोटियाँ।
धर्म की विश्व में हैं विविध कोटियाँ।
क्या कहें उस मनुज के कथित धर्म को,
जो जिये स्वार्थ में त्याग सत्कर्म को।

(12) वागंगोदक छंद
मापनी- 212 212 212 212 212 212 212 212
लगावली- गालगा गालगा गालगा गालगा गालगा गालगा गालगा गालगा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) तुम अगर/ साथ दे/ने का’ वा/दा करो/, मैं यूँ’ ही/ मस्त नग/मे सुना/ता रहूँ।
2) मैं ते’रे/ इश्क में/, मर न जा/ऊँ कहीं/ तू मुझे/ आजमा/ने की’ को/शिश न कर।
मूल छंद का उदाहरण-
छांदसी काव्य की सर्जना के लिए, भाव को शिल्प आधार दे शारदे !
साथ शब्दार्थ के लक्षणा-व्यंजना से भरा काव्य-संसार दे शारदे !
द्वेष की भीति को प्रीति की रीति से, दे मिटा स्नेह संचार दे शारदे !
विश्व की वेदना पीर मेरी बने, आज ऐसे सुसंस्कार दे शारदे !

(13) वाबाला छंद
मापनी- 212 212 2122
लगावली- गालगा गालगा गालगागा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) रात भर/ का है’ मे’ह/मां अँधेरा
2) आज सो/चा तो’ आँ/सू भराये
3) जा रहा/ है वफ़ा/ का जनाज़ा
मूल छंद का उदाहरण-
रोटियाँ चाहिए कुछ घरों को,
रोज़ियाँ चाहिए कुछ करों को।
काम हैं और भी ज़िंदगी में,
क्या रखा इश्क़-आवारगी में।

(14) वापंचचामर छंद
मापनी- 12 12 12 12 , 12 12 12 12
लगावली- लगा लगा लगा लगा, लगा लगा लगा लगा
छंदाधारित फिल्मी गा-
ये’ ज़िं/दगी/ सवा/ल है/, कि ज़िन्/दगी/ जवा/ब है।
मूल छंद का उदाहरण-
विचार आ गया उसे निबद्ध छंद में किया,
रसानुभूति के लिए निचोड़ भी दिया हिया।
परन्तु नव्य-नव्य गीत गीत तो हुआ तभी,
किसी अजान ने समोद गुनगुना दिया कभी।

(15) हरिगीतिका (या वामुनिशेखर) छन्द
मापनी- 2212 2212 2212 2212
अथवा- 11212 11212 11212 11212
लगावली- गागालगा गागालगा गागालगा गागालगा
अथवा- ललगालगा ललगालगा ललगालगा ललगालगा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) इक रास्ता/ है ज़िन्दगी/ जो थम गए/ तो कुछ नहीं.
2) हम बेवफा/ हरगिज न थे/ पर हम वफ़ा/ कर ना सके
3) किसी’ राह में/ किसी’ मोड़ पर/ कही’ चल न दे/ना’ तू’ छोड़कर
मूल छंद का उदाहरण-
उस ज्ञान का हम क्या करें जो, दंभ में अनुदार हो।
उस रूप का हम क्या करें जिस, में न मृदुता-प्यार हो।
जो हैं अकारण रूठते हम, उन ग्रहों से क्या डरें।
जो मूलतः व्यापार हो उस, धर्म का हम क्या करें।

(16) पारिजात छंद
मापनी- 2122 1212 22
लगावली- गालगागा लगालगा गागा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) ज़िंदगी इम्/तहान ले/ती है।
2) तुमको’ देखा/ तो’ ये ख़या/लाया।
3) दिल-ए-नादां/ तुझे हुआ/ क्या है।
4) आज फिर जी/ने’ की तमन्/ना है।
5) फिर छिड़ी रा/त बात फू/लों की।
6) यूँ ही’ तुम मुझ/से’ बात कर/ती हो।
7) हुश्न वाले/ ते’रा जवा/ब नहीं।
8) आज फिर जी/ने’ की तमन्/ना है
मूल छंद का उदाहरण-
फाग गाकर गयी चली होली,
कौन जाने कि किस गली हो ली।
राख़ का ढेर बच रहा नीरव,
फिर नया खेल रच रहा नीरव।

(17) दिग्बधू छन्द,
मापनी- 221 2122 221 212
अथवा- गागाल गालगागा गागाल गालगा
छंदाधारित फिल्मी गाना-
किस्मत से’/ मिल गए हो/ मिलकर जु/दा न हो
मूल छंद का उदाहरण-
संसार है नरक भी संसार स्वर्ग भी,
दुख-धाम है कभी तो सुखधाम है कभी।
जो भूल कर स्वयं को परहित सदा जिए,
संसार स्वर्ग जैसा उस व्यक्ति के लिए।

(18) वाराभातायगागा छन्द
मापनी- 2122 1122 1122 22
लगावली- गालगागा ललगागा ललगागा गागा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) आज कल पाँ/व ज़मी पर/ नही’ पड़ते/ मेरे
2) मेरे’ महबू/ब तुझे मे/री’ मुहब्बत/ की’ कसम
3) पांव छू ले/ने’ दो’ फूलों/ को’ इनायत/ होगी
4) वो मे’री नीं/द मे’रा चै/न मुझे लौ/टा दे
मूल छंद का उदाहरण-
सोच कर व्यर्थ नहीं त्रस्त रहो दुनियाँ में।
काम में व्यस्त रहो मस्त रहो दुनिया में।
देखना बंद करो व्यर्थ असंभव सपना,
बात कल की न करो आज सँवारो अपना।

(19) वातारासरालगा छन्द
मापनी- 221 2121 1221 212
लगावली- गागाल गालगाल लगागाल गालगा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) मिलती है’/ जिंदगी में’/ मुहब्बत क/भी कभी
2) हर फ़िक्र/ को हवा में’/ उड़ाता च/ला गया
3) दिल चीज/ क्या है’ आप/ मे’री जान/ लीजिये
4) लग जा ग/ले कि फिर ये’/ हसीं रात/ हो न हो
5) दिल ढूँढ/ता है’ फिर व/हीं’ फुर्सत के’/ रात दिन
6) मैं जिंद/गी का’ साथ/ निभाता च/ला गया
7) दुनिया क/रे सवाल/ तो’ हम क्या ज/वाब दें
8) हैरान/ हूँ मैं’ आप/की’ जुल्फों को।/ देखकर
9) दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें
मूल छंद का उदाहरण-
जब हो समय सटीक तभी काम कीजिए।
विपरीत काल नाम सदा राम लीजिए।
जब कीजिए महान सदा कर्म कीजिए,
अपनाइए सुपन्थ सदा धर्म कीजिए।

(20) लावणी छंद (मापनीमुक्त)
विधान- 30 मात्रा, 16,14 पर यति, अंत में वाचिक गा
लावणी (30 मात्रा) = चौपाई (16 मात्रा) + समकल (14 मात्रा)
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) गोरे गोरे चाँद से’ मुख पर (16 मात्रा), काली काली आंखें हैं (14 मात्रा)
2) खूब लड़ी मर्दानी थी वह (16 मात्रा), झांसी वाली रानी थी (14 मात्रा)
3) फूल तुम्हें भेजा है खत में (16 मात्रा), फूल नहीं मेरा दिल है (14 मात्रा)
4) रात कली इक ख्वाब में’ आई (16 मात्रा), और गले का हार हुई (14 मात्रा)
5) कसमें वादें प्यार वफ़ा सब (16 मात्रा), बातें हैं बातों का क्या (14 मात्रा)
6) रामचन्द्र कह गए सिया से (16 मात्रा), ऐसा कलियुग आयेगा (14 मात्रा)
मूल छंद का उदाहरण-
तिनके-तिनके बीन-बीन जब, पर्ण कुटी बन पायेगी,
तो छल से कोई सूर्पणखा, आग लगाने आयेगी।
काम-अनल चन्दन करने का, संयम बल रखना होगा,
सीता-सी वामा चाहो तो, राम तुम्हें बनना होगा।

(21) सार छंद (मापनीमुक्त)
विधान- 28 मात्रा, 16,12 पर यति, अंत में वाचिक गागा
सार (28 मात्रा) = चौपाई (16 मात्रा) + 12 मात्रा
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) रोते-रोते हँसना सीखो (16 मात्रा), हँसते-हँसते रोना (16 मात्रा)
2) मेरे नैना सावन भादो (16 मात्रा), फिर भी’ मे’रा मन प्यासा (16 मात्रा)
मूल छंद का उदाहरण-
कितना सुन्दर कितना भोला, था वह बचपन न्यारा।
पल में हँसना पल में रोना, लगता कितना प्यारा।
अब जाने क्या हुआ हँसी के, भीतर रो लेते हैं।
रोते-रोते भीतर-भीतर, बाहर हँस देते हैं।

(22) पदपादाकुलक छंद (मापनीमुक्त)
विधान- 16 मात्रा, प्रारम्भ में द्विकल अनिवार्य, इस द्विकल के बाद एक त्रिकल आये तो उसके बाद पुनः दूसरा त्रिकल अनिवार्य। वस्तुतः पदपादाकुलक के चरण में 2,6,10 मात्राओं के बाद ही त्रिकल-त्रिकल युग्म आ सकता है, यदि 0,4,8 मात्राओं के बाद त्रिकल-त्रिकल युग्म वर्जित है, यदि ऐसा होगा तो तो लयभंग हो जायेगी। इसमें सभी समकल होते हैं, जबकि विषम और विषम मिल कर समकल हो जाता है जैसे त्रिकल और त्रिकल मिल कर षड्कल हो जाता है।
छंदाधारित फिल्मी गाना-
जब (द्विकल) दर्द (त्रिकल) नहीं (त्रिकल) था सीने में,
क्या (द्विकल) खाक (त्रिकल) मजा (त्रिकल) था जीने में।
मूल छंद का उदाहरण-
कविता में हो यदि भाव नहीं,
पढने में आता चाव नहीं।
हो शिल्प भाव का सम्मेलन,
तब कविता होती मनभावन।

(23) मत्तसवैया/राधेश्यामी छंद (मापनीमुक्त)
विधान- 32 मात्रा, 16,16 पर यति, 16-16 मात्रा के प्रत्येक पद के प्रारम्भ में गा/द्विकल अनिवार्य, इस गा/द्विकल के बाद एक त्रिकल आये तो उसके बाद पुनः दूसरा त्रिकल अनिवार्य। वस्तुतः वस्तुतः इसके प्रत्येक 16 मात्रा के पद में 2,6,10 मात्राओं के बाद ही त्रिकल-त्रिकल युग्म आ सकता है, यदि 0,4,8 मात्राओं के बाद त्रिकल-त्रिकल युग्म वर्जित है, यदि ऐसा होगा तो लयभंग हो जायेगी। इसमें सभी समकल होते हैं, जबकि विषम और विषम मिल कर समकल हो जाता है जैसे त्रिकल और त्रिकल मिल कर षड्कल हो जाता है।
छंदाधारित फिल्मी गाना-
दिल लूटने’ वाले जादूगर (16 मात्रा), अब मैंने’ तुझे पहचाना है (16 मात्रा)।
मूल छंद का उदाहरण-
जिस गर्भकोश में निराकार, आते-आते साकार हुआ,
इच्छा की भी न प्रतीक्षा की, ऐसा पोषण सत्कार हुआ।
इच्छापेक्षी तरु कल्प लगा, जिसके आगे बस नाम-नाम,
विधि की ऐसी पहली कृति को, मन बार-बार करता प्रणाम।

(24) जयकरी/चौपई छंद (मापनीमुक्त)
विधान- 15 मात्रा, अंत में गाल अनिवार्य
छंदाधारित फिल्मी गाना-
तौबा ये मतवाली चाल (15 मात्रा),
झुक जाये फूलों की डाल (15 मात्रा)।
मूल छंद का उदाहरण-
भोंपू लगा-लगा धनवान,
फोड़ रहे जनता के कान।
ध्वनि-ताण्डव का अत्याचार,
कैसा है यह धर्म-प्रचार।

(25) चौपाई छंद (मापनीमुक्त)
विधान- 16 मात्रा, अंत में गाल वर्जित। वस्तुतः चौपाई के चरण में 0,4,8 मात्राओं के बाद ही त्रिकल-त्रिकल युग्म आ सकता है, यदि 2,6,10 मात्राओं के बाद त्रिकल-त्रिकल युग्म वर्जित है, यदि ऐसा होगा तो लयभंग हो जायेगी। इसमें सभी समकल होते हैं, जबकि विषम और विषम मिल कर समकल हो जाता है जैसे त्रिकल और त्रिकल मिल कर षड्कल हो जाता है।
छंदाधारित फिल्मी गाने-
1) दीवानों से ये मत पूछो (16 मात्रा),
दीवानों पे क्या गुज़री है (16 मात्रा)।
2) कहीं दूर जब दिन ढल जाये (16 मात्रा),
शाम की’ दुल्हन नजर चुराए (16 मात्रा)।
मूल छंद का उदाहरण-
धर्म बना व्यापार अनोखा,
हर्र-फिटकरी बिन रँग चोखा।
गुरु-घंटाल स्वाँग दिखलाते,
घन-आदर दोनों ही पाते।
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संदर्भ ग्रंथ – ‘छन्द विज्ञान’, लेखक- आचार्य ओम नीरव, पृष्ठ- 376, मूल्य- 600 रुपये, संपर्क- 8299034545