मैंने कल को देखा है
घुलती हवाओं में जहरीले कण,
ढलती उम्र, ढलता तन।
आपदाओं का पहाड़ टूट रहा है,
असहाय, बेबस हरदम लूट रहा है।
विनाश की अपार आँधी,
अपार बल को देखा है।
मैंने कल को देखा है।
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नोटों की गर्मी के आगे
खामोश लब्ज़ हैं।
हर आलम पर राज उनका,
हर चीज़ पर कब्ज़ है।
रुपयों की खनक पर नाचते
अमीरों के दल को देखा है।
मैंने कल को देखा है।
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हर बख़्त अय्याशी का
बिगुल बजाते हैं।
नशे में चूर न जाने
कितने ज़ख्म दे जाते हैं।
ये घनघोर अँधेरा,
ये मौत का डेरा।
जहरीली नागिन भी
जब पैतरा कसती है,
तो छोड़कर अमीरों को
सिर्फ़ गरीबों को डँसती है।
अपनी ही भीड़ में
वो खुद पीसे जाते हैं।
सिर्फ़ उन पर कहानी,
कविता लिखी जाती है।
नेताओं की पहल
और उनके हल को देखा है।
मैंने कल को देखा है।
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रिश्तों का बंधन न जाने
कब तक चलेगा।
बेगुनाहों की चिता
न जाने कब तक जलेगा।
औरों का दर्द, औरों को समझ आता कहाँ है।
इंसानियत का फ़र्ज़, इंसान कहाँ निभाता है।
मानवता को नदारद होते,
और बढ़ते छल को देखा है।
मैंने कल को देखा है।
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