गजब दिन भइगे
गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।
गुरुजी के गुर्रई अउ, सुँटी बेत देखे।।
दाई के दरघोटनी, सील लोड़हा के चटनी।
नजरे नजर झूलथे, पठउँहा के पटनी।।
बबा के ढेरा, अउ बारी के केरा।
कोठी काठा मरकी, गँजाये पेरा।।
कोदईधोना झेंझरी, नियम नेत देखे।
गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।।
कोठा के झँउहा, खरहेरा गरू गाय।
पपीता मुनगा पेड़, सपना मा आय।।
गोबर के छर्रा छीटा, चूल्हा के आगी।
खुमरी मैनकप्पड़, साफा पागा पागी।।
तरिया के लद्दी, अउ नदी नरवा के रेत देखे।
गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।।
घठोंदा के पचरी अउ, पथरा बुलाथे।
सल्हई पँड़की बोली, गजब मन भाथे।।
जुन्ना बर पीपर अउ, छींद बोइर जाम।
हरर हरर बूता अउ, मरत ले काम।।
नाक बोहई लइका के, सियानी चेत देखे।
गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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