जंगल झाड़ी के विनास-लावणी छंद
पर्वत के पर्वत कुचरागे, छोट शिला सुर सूरत ए।
कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।
खेल करै नेता अधिकारी, बेचे जंगल झाड़ी ला।
उद्योगी के जेब भरे बर, रोके जीवन गाड़ी ला।।
बाट निहारे सड़क पूल हा, काटे रूख मुहूरत ए।
कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।
माटी महतारी के छाती, सबे जघा खोदावत हे।
धन्ना मनके नजर गड़े हे, खेत खार बोहावत हे।।
लगथे आजे उजड़ जही बन, अइसन काय जरूरत ए।
कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।
विकसित भारत के सपना ला, इसने कहूँ सँजोना हे।
हवा नीर तक ला ले पीबों, ता जिनगी भर रोना हे।।
आघू पीढ़ी ला जे खावय, ते मानव नइ धूरत ए।
कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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