Thursday, 22 January 2026

छन्द मा छत्तीसगढ़ी संचालक-जीतेंद्र वर्मा”खैरझिटिया”

 राजभाषा आयोग के 9वाँ प्रांतीय सम्मेलन मा,,संचालक के तौर मा मोर विचार अउ बातबानी....


विषय:-छन्द मा छत्तीसगढ़ी

संचालक-जीतेंद्र वर्मा”खैरझिटिया”


जोहार।

मैं बाल्को, कोरबा ले जीतेन्द्र कुमार वर्मा “खैरझिटिया”। 


“छंद मा छत्तीसगढ़ी” ये विषय ल लेके आज हमन राजभाषा आयोग के 9वाँ प्रांतीय सम्मेलन के 9 वाँ सत्र मा उपस्थित होय हन, 9- 9 के जबर संयोग घलो मिलत हे...

                       छन्द के पहली छत्तीसगढ़ी के बात करथन। छत्तीसगढ़ी...... काय ए? सिर्फ भाषा या बोली? नही छत्तीसगढ़ी हमर मान ए, अभिमान, पहिचान ए। जइसे कोनो ल बंगाली बोलत सुनथन ता जान डरथन कि  वो बंगाल के ए, कोनो ला मराठी बोलत सुनथन ता जान डरथन कि वो महाराष्ट्र के ए, वइसने छत्तीसगढ़ी बोली छत्तीसगढ़ के पहिचान ला बताथे।भाषा या बोली सिर्फ मनखे के नही बल्कि देश, राज अउ अंचल के पहिचान होथे। ता का हमला अपन पहिचान ल भुलाना चाही? नही न…. कोनो लइका के चहेरा मुहरा आचार विचार अउ चाल चलन ल देखत कतको मन बता देथे कि वो फलाना के लइका ए। काबर कि ओ लइका म ओखर ददा दाई के पहिचान दिखथें। वइसने छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली आय, जे हम ला पहिचान देथे। रंग रूप, खानपान, पहिनावा ओढ़ना, पार परम्परा अउ संस्कृति संस्कार के संगे संग भाँखा बोली घलो पहिचान के एक आभिन्न भाग आय।  यदि हमन अपन बोली भाँखा ले भागबो त हमर पहिचान घलो नँदा जही। कोनो लइका ला ओखर ददा दाई के अलावा दूसर के लइका कहिलाय मा गरब नइ होय, अउ न वो लइका बने काहय, ता छत्तीसगढ़ी बोले अउ  छत्तीसगढिया काहय मा काके शरम? छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली ए। जइसे महतारी के सेवा जतन ओखर बेटा ल ही करना पड़थे, वइसने हम सब छत्तीसगढिया मन ऊपर माई बोली छत्तीसगढ़ी के बढ़वार के भार हवै। कोनो भी भाँखा होय ओखर उत्तपत्ति बड़ श्रमसाध्य बूता होथे। आज अपन एक बात जमाना मा मनवा के देखव पता चल जही, कि कतका महीनत हे कोनो नवा शब्द गढ़ना अउ मनवाना। अइसन मा हमर पुरखा मनके महीनत बिरथा झन होय, अउ हमर माई बोली जन्मो जनम ये धरा धाम मा मिश्री घोरत रहे। भाँखा भाव के संवाहक होथे, छोटे बड़े कभू नइ होय। अइसन मा कोनो भी भाँखा ला छोटे बड़े कहना हमर नादानी होही। भाँखा ला जिंदा रखथे ओखर बोलइया, लिखइया, पढ़इया अउ समझइया मन। अउ आज बढ़वार के बूता हमर साहित्कार संगी मन बड़ सुघ्घर ढंग ले करत हे। मंच मा छत्तीसगढ़ी मा छंद के बारे मा बताये बर हमर संगी सुखदेव सिंह अहिलेश्वर(जिला कबीरधाम ले), मनीराम साहू मितान(सिमगा ले), बलराम चन्द्राकर(भिलाई ले), चोवाराम वर्मा बादल(जिला बलौदाबाजार ले), आशा देशमुख(कोरबा ले) ले हमर बीच उपस्थित हें। अउ ये सत्र के अध्यक्षता करत हें, छंद के छ के संस्थापक छंदविद अरुण कुमार निगम जी(रायपुर)। आप जम्मों के सादर स्वागत हे, एक बार जोरतार ताली—।


संगवारी हो…

                      वइसे तो छंद के कई परिनिष्ठित परिभाषा हे। फेर छंद कहे ले छत्तीसगढ़ी मा छंदे बंधे के भाव बोध होथे, अउ छंद वइसनेच आय घलो। जेन मात्रा के साथ साथ यति, गति अउ एक विशेष नियम मा बंधाय रथे। वैसे बंधाय मा ही रीतिनीति संरक्षित होथे। बंधाय छंदाय मा ही बइला ले खेत जोताथे। भर्री ला मेड़ बनाके बांधे ले ही खेत बनथे, नदी ला बांधे ले सिचाई अउ बिजली उत्पन्न होथे। कहे के मतलब नियम धियम मा बंधे ले ही काम धाम निपटथे, ता हमन काबर ऐती तेती के सोचथन?

छत्तीसगढ़ के पावन धरती धन्य हे जिहां दुनिया के पहली छंद आदिकवि महर्षि बाल्मिकी के मुख ले कौंच पक्षी के जोड़ा ला लहूलुहान देख निकलिस। हमर तुरतुरिया मा आजो बाल्मिकी जी के आश्रम विद्यमान हे। छत्तीसगढ़ के माटी धन्य हे कि रामगढ़ के पहली मा कवि कालिदास मेघदूत अउ अपन अन्य छंदबद्ध ग्रंथ के सृजन करिन।  छत्तीसगढ़ के माटी ले ही दुनिया ला छंदशास्त्र के दुर्लभ ग्रंथ छंद प्रभाकर, छंद सारावली अउ काव्य प्रभाकर जगन्नाथ प्रसाद भानु जी के कर कलम ले मिलिस। अउ जगन्नाथ प्रसाद भानु जी के जनम भुइँया ये बिलासपुर घलो धन्य हे जिहां ये पावन यज्ञ सजे हे। अनेक ऋषिमुनि के संगे संग धनी धरम दास, आमीन माता, संत गुरुघासी जी मन के छंदबद्ध बानी छत्तीसगढ़ मा आदिकाल गूंजत हे। हमर वाचिक परम्परा के भजन कीर्तन अउ गीत कविता आजों मंदरस कस मीठाते।  अइसन मा भला छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य ‘छंद’ ले कइसे विमुख हो सकथे। छत्तीसगढ़ी काव्य मा छंद पहली घलो लिखे जावत रिहिस अउ आजो लिखे जावत हे। अउ छन्द के ये धरा मा पहली घलो वर्चस्व रिहिस, आजो हे अउ अवइया बेरा मा घलो रही। 

                 छत्तीसगढ़ी काव्य मा छंद यात्रा वाचिक परम्परा के रूप मा बड़ जुन्ना समय ले चलत आवत हे। लिखित साहित्य के बात करथन ता छत्तीसगढ़ मा राज करइया राजा मनके दरबारी कवि मन के कुछ छत्तीसगढ़ी काव्य मा दिखथें, फेर उपलब्धता नगण्य स्थिति मा हे। कबीर दास जी के चेला धनी धरम दास जी के काव्य ही लिखित रूप मा सामने आथे। जेमा दोहा, सरसी, सार छंद के आलावा साखी शबद अउ पद हवै। उंखर धर्मपत्नि आमीन माता के पद के जिक्र घलो छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य मा मिलथे। संत गुरुघासी दास जी के गुरुवाणी मा घलो छंद के पुट दिखथे। विशुद्ध छत्तीसगढ़ी छंदबद्ध काव्य काहन ता पं. सुंदरलाल शर्मा जी द्वारा रचित खंडकाव्य दानलीला ही सामने आथे, जेमा दोहा, सार, तोतक, लावणी, चौपाई आदि छंद स्पष्ट दिखथे। दानलीला के आलावा सुंदरलाल शर्मा जी के अउ छंदबद्ध कविता घलो मिलथे।अन्य छंद लिखइया जुन्ना कवि मा शुकलाल प्रसाद पांडेय, मुकुधरपाण्डेय, बंसीधर पांडेय, नारायण लाल परमार, कुंजबिहारी चौबे, द्वारिकाप्रसाद तिवारी विप्र, कोदूराम दलित, नरसिंह दास, दानेश्वर शर्मा, श्यामलाल चतुर्वेदी जी के साथ साथ लक्ष्मण मस्तुरिया, लाला जगदलपुरी, बुधराम यादव, रामह्र्दय तिवारी, अरुण निगम, शंकुन्तला शर्मा, रमेश कुमार चौहान, चोवाराम वर्मा बादल  अउ बहुत अकन युवा कवि मन आज छंदबद्ध सृजन करत हें। वर्तमान समय तक लगभग 70, 80 विशुद्ध छंदबद्ध पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा मा छप चुके हे, जे हम सब बर गर्व के बात ए। छत्तीसगढ़ी भाषा मा छंद न सिर्फ लिखे छपे जावत हे, बल्कि चारों मुड़ा सोसल मीडिया मा छाए दिखथे। कवि सम्मेलन के मंच होय या रेडियो, टीवी या अन्य निजी चैनल सब कोती छंदबद्ध रचना दिखथे।

        

                हमर छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य घलो बड़ सजोर हे। हमर लोकगीत लोकगाथा, लोक नाट्य मन के एक विशेष लय तान हे, ते पाय के ओमा छंद के उपस्थिति ला नकारे नइ जा सके। भले मात्रा थोर बहुत ऊँचनीच हे, फेर लय वइसनेच होथे। मात्रा के ऊँचनीच के कारण वाचीक परम्परा हो सकथे, काबर कि ये सब जुन्ना समय ले बोलचाल माध्यम मा ही आज तक आय हे। अइसन छंद लोकछन्द कहिलाथे। भरथरी, पंडवाणी, ढोलामारू गाथा, अहिमन रानी गाथा, केवला रानी गाथा, फुलबासन गाथा, पचरा देवी गीत, फाग गीत, सोहर गीत, बिहाव पठवनी गीत,चंदैनी गीत, देवार गीत, गौरागौरी गीत, गोरखबानी, आल्हा आदि लोक गीत मन अपन विशेष धुन, लय अउ ताल के कारण छत्तीसगढ़ के लोक छंद के रूप मा स्थापित हे। 

              

                जेन चीज नियम धियम मा चलथे ओखर शास्त्र होथे। ते पाय के छंद के घलो शास्त्र हे। छंद अउ छंद शास्त्र के सम्बंध भाषा अउ व्याकरण के समान होथे। छंद ला साधे ले वो भाषा के व्याकरण पुष्ट होथे, काबर कि छंद व्याकरण के अभिन्न अंग आय। हिंदी के व्याकरण मा सब छंद पढ़थन। छत्तीसगढ़ी के घलो नवा व्याकरण पुस्तक बिलासपुर ले डॉ विनोद कुमार वर्मा अउ डॉ विनय पाठक जी के सम्पादन मा निकले हे, जेमा छंद के हिंदी के व्याकरण पुस्तक ले भी ज्यादा उदाहरण अउ जानकारी हे। छंद के प्रस्तुति या लेखन के भाषा अलग अलग हो सकथे फेर नियम धियम एके रथे। छंदबद्ध कविता कालजयी होथे, काबर कि वोमा सहज गेयता होथे, सुस्पष्टता होथे, श्रव्यता होथे, प्रभावी होथे, श्रमसाध्य होथे। छंदशास्त्र मा अतका अकन छंद के विधान हे, कि ओखर गिनती करना मुश्किल हे। डॉ एस एन दास गुप्त के अनुसार “समस्त विश्व का साहित्य किसी न किसी छंद से निबद्ध है।” कई कवि मा नवा छंद बनाए के बात करथें, जे केवल भ्रम आय। जइसे अपन घर के कोठा, बारी, कोठार जाय के रद्दा ला सड़क नइ कहि सकन वइसने बात नवा छंद मा लागू होथे। जइसे सड़क बनाए बर अच्छा जघा, बने नाप तोल, बने डामर गिट्टी अउ सड़क विभाग के बने जानकार मनखें मन के जरूरत पड़थे, वइसने नवा छंद के निर्माण  घलो भाषा शास्त्री मन विशेष माप तोल के तर्क अउ शास्त्र सम्मत करथें। विशेष नापतौल मा बने सड़क मा सब चलथें, अउ नियम मा चलथें (जइसे डेरी हाथ कोती जाना, निश्चित स्पीड मा गाड़ी चलाना आदि आदि)। सड़क मा मनमानी बिल्कुल भी नइ चले, वइसने होथे शास्त्र जिहां नियम धियम मा चले बर पड़थे। तभे तो महत्ता बढ़ जाथे। जे महत्व गीत मा शास्त्रीय गीत के हे, नृत्य मा शास्त्रीय नृत्य के हे, वइसने महत्ता शास्त्रीय छंद के हे। ते पाय के छन्द आदिकाल ले आज तक जीवित हे अउ जन जन के मुख मा रचे बसे हे। छंद के दू अर्थ होथे,आच्छादन अउ आह्लादन। आच्छादन माने रस, भाव अउ वर्ण्य विषय ला आच्छादित करना, जबकि आह्लादन मतलब मानव मन के मनोरंजन करना। कोनों भी काव्य होय जग अउ जन रंजन बर होथे, आत्म रंजन के कोई स्थान नइहे। छंद शास्त्र ले वैदिक अउ लौकिक रूप मा पढ़े देखे सुने बर मिलथे, वो वास्तव मा अद्भुत हे।  संस्कृत ला छोड़ के बात करन ता छन्द ज्यादातर क्षेत्रीय भाषा मा ही शोभायमान हे। चाहे अवधी होय, ब्रज होय, कोशली होय, मैथिली होय, बघेली होय या फेर छत्तीसगढ़ी,ये सब भाषा मा मलिक मोहम्मद जायसी, तुलसी, सुर, रहीम, कबीर, केशव, घाघ, भिखारीदास, घनानंद जइसे कतको विद्वान कवि मन कलम चलाये हें। आज खड़ी बोली मा घलो छन्द लिखे जावत हे। छत्तीसगढ़ी जेन पूर्वी हिंदी के एक भाषा आय अपन छंदबद्ध काव्य साहित्य ले लगातार पोठ होवत हे। मात्रिक अउ वर्णिक दुनो प्रकार जे छन्द सरलग छत्तीसगढ़ी मा लिखे जावत हे। वो दिन दूर नइहें जब छत्तीसगढ़ी भाषा के छंदबद्ध साहित्य घलो ब्रज, अवधी अउ मैथली कस अपन विशिष्ट स्थान बनाही। एखर बर जुन्ना समय मा लिखित काव्य साहित्य के अध्ययन, विश्लेषण अउ नवा सृजन जरूरी हे। साहित्य अउ कला भाषा के सबके बड़े रखवार होथे। तुलसी दास जी रामचरित लिखत बेरा कभू नइ सोचिस होही कि, फलां छत्तीसगढ़ी शब्द आगे, फलां बघेली होगे या फलां शब्द मैथली होगे, जबकि उन मन अवधी के कवि रहिन। ता हमन काबर सोचथन कि सबे चीन छत्तीसगढ़ी मा होय। हाँ फेर जोन भी भाषा के शब्द लेन वो वाक्य ला सरल,सहज अउ प्रवाहमय बनाय। “भले लिखाय कम। फेर वो लिखाय मा रहे दम। जुन्ना समय मा कोन कहाँ का पढ़िस कोन जानथे, फेर का लिखिस सब जानथन। ता अपन भाषा मा लिखव रमके अउ जमके। छन्द लिखे बर महिनत तो चाही ही चाही, काबर कि मात्रा के सवाल रथे। ता फल घलो तो पोठ मिलथे। तुलसी दास जी राम चरित मानस के रचना मात्रा गिन गिन के तो नइ करे होही? नही ते पहा जातिस, वइसे दू साल ग्यारह महीना ले आगर दिन कमती नोहे, तभो लय पकड़ा जाय ले कोनो भी छन्द जल्दी लिखाथे। ता छन्द बर विधान के साथ साथ लय के जानकारी होना घलो जरूरी हे।

 कुछ प्रचलित गीत कविता उदाहरण स्वरूप  सादर रखत हँव-


1,तातंक छंद- 

बुंदेले हरबोलों के मुँह, हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो, झाँसी वाली रानी थी।


2, चौपाई छंद-

जिसने सूरज चाँद बनाया। जिसने तारों को चमकाया।।

जिसने फूलों को महकाया। जिसने चिड़ियों को चहकाया।।


उठो लाल अब आंखे खोलो। पानी लाई हूं मुंह धोलो।।


3, सार छंद-

यह कदंब का पेड़ अगर माँ, होता यमुना तीरे।

मैं भी उस पर बैठ कन्हैया, बनता धीरे-धीरे।।


मां खादी की चादर दे दे, मैैैं गांधी बन जाऊं।

छन्नर छन्नर पैरी बाजे, खन्नर खन्नर चूरी।

हाँसत कूदत मटकत रेंगे, बेलबेलही टूरी।।(दलित जी)


4, लावणी छंद-

फूल तुम्हे भेजा हूं खत में, फूल नही मेरा दिल है।(फिल्मी गीत)


5, आल्हा छंद-

जिहां भिलाई कोरबा ठाढ़े, पथरा सिरमिट भरे खदान।

तांबा पीतल टीन कांच के, इहि माटी मा थाती खान।।(लक्ष्मण मस्तुरिया)


6, सरसी छंद-

राउत दोहा-अरसी फुले घमाघम भैया, मुनगा फुले सफेद।

बालकपन मा केंवरा बदे, जवानिकपन मा भेंट।।


7, जयकारी छंद-

हुए बहुत दिन बुढ़िया एक। चलती थी लाठी को टेक।

उसके पास बहुत था माल। जाना था उसको ससुराल।


अइसने कई प्रचलित छंदात्मक हिंदी, छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी गीत कविता हे, जेखर लय ला धरके छंद सहज लिखे जा सकत हे।


               छत्तीसगढ़ी के व्याकरण घलो बड़ जुन्ना हे, अउ लगातार व्याकरण के कोठी भरत जावत हे। छत्तीसगढ़ी आज सिर्फ बोली नही, बल्कि भाषा के रूप ले चुके हे। छत्तीसगढ़ी के लिपि हिंदी कस देवनानगरी ही हे। जे हिंदी, भोजपुरी, बघेली अउ अवधी भाषा ला घलो कुछ न कुछ समझ आ जथे। यदि कोई छत्तीसगढ़ी ले भागथे, दुरिहाथे ता वो मनखें समझ के घलो नासमझ बने के ढोंग करथे। छत्तीसगढ़ी मा कुकुर ला तू कहिबे ता पाछू लग जथे। बिलई ला मुनुमुनु कहिबे ता आ जथे। गाय गरुवा हई आ, ओहो तोतो ला समझथे, कुकरी कुकरा ला कुरु कुरु कहिके ता समझके तीर मा आ जथे,  ता हमन तो मनखें आन, थोर बहुत समय लगही बोले समझे मा अउ छत्तीसगढ़ी कोनो आन भाषा घलो नोहे महतारी भाषा ए, ता एला सिर्फ बोलना, लिखना,पढ़ना अउ समझना भर नइहे, बल्कि उचित स्थान अउ सम्मान दीवाये बर लगही। तभे ये माटी मा जनम धरेन तेखर कर्जा उतरही। आज छत्तीसगढ़ के कतको मनखें अभी नवा फिलिम धुरंधर आय हे तेखर एक अइसन गीत जेन समझ नइ आय वोमा नाचत झूमत गावत हे, अइसनेच बाहुबली के समय घलो होय रिहिस। मनखें मन कालके के काल्पनिक भाषा ले बोलत दिखे। ता संगवारी हो हमर छत्तीसगढ़ी तो आदि समय ले चलत मनभावन अउ गुरतुर भाँखा ए, एला बोले, लिखे, पढ़े मा कोताही काबर। हिंदी साहित्य के इतिहास ले लोक  भाषा अवधी ल नइ निकाले जा सके, काबर कि अवधी मा तुलसी, जायसी,कुतबन जैसे कतको आदिकालीन अउ भक्तिकालिन कवि मन दुर्लभ अउ कालजयी साहित्य गढ़ें हे।  रसखान, सुर, मीरा जैसे अउ कई कवि कवियित्री मन के कारण ब्रज घलो जन्मों जनम हिंदी साहित्य के हिस्सा रही। केशव, घनानन्द जैसे कवि मन के कारण मैथली ल नइ बिसारे जा सके। जबकि ये सब लोक भाषा आय। अइसन मा छत्तीसगढ़ी बर काबर सोचेल लगत हे? एखर एके कारण हे आज भी छत्तीसगढ़ी मा कायजयी अउ जादा से जादा छंदबद्ध सृजन के जरूरत हे, ता भला सृजन कोन करही? हमी मन न। ता आवन छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर सब  मिलके छंद,गीत,कविता,कहानी आदि सबे विधा मा सृजन करीं, अउ छत्तीसगढ़ी ला घलो हिंदी साहित्य में संघेरी। जय छत्तीसगढ़। जय जय छत्तीसगढ़ी


धन्यवाद

प्रस्तुति:-जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”

बाल्को, कोरबा(छग)

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