मुसवा मन रइपुर में- सार छन्द
बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।
खाय धान ला हवै पचावत, नाचत गावत सुर में।।
मुड़ धर बइठे हे लंबोदर, बिलई देखत भागे।
धाने भर मा पेट भरे नइ, खाथें कुकरी सागे।।
सजा बदी नइ लागे वोला, चपकाये नइ खुर में।
बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।
घूम घूम के चारो कोती, खोजत रहिथें दौलत।
कुछ बिगाड़ नइ पाये ओखर, नीर घलो हा खौलत।।
सेना भारी डेना भारी, उमियायें मदचुर में।
बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।
धरा गगन पाताल घलो ला, भाजी पाला जाने।
सात पुस्त बर माल सकेले, बेच धरम ईमाने।।
बेरा रहिते दे बर पड़ही, मिला दवाई गुर में।
बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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