Thursday, 16 July 2026

डिजिटल युग कब तक टिकही-सार छंद

 डिजिटल युग कब तक टिकही-सार छंद


हे अवशेष हजार साल के, कागज पाथर रूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


सबें चीज डिजिटल होवत हे, बात खुशी के आये।

लउहा लउहा काम होत हे, सब मनखें अपनायें।।

रुपिया पइसा पोथी पाथर, घूमे डिजिटल लूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


नाम काम तक डिजटल होगे, डिजटल होगे सेवा।

कोन जनी काली का होही, कोन ह खाही मेवा।।

डिजिटल डाटा डिलीट होय त, जाथे अंधा कूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


डिजिटल डाँका के तक डर हे, मनुष बने हे थोरे।

नेट सेट अउ पासवर्ड बिन, डिजिटल दाँत निपोरे।।

मिला डरे हन अमृत मदरस, दूध दही सब सूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


का पीतल सोना चांदी कस, डिजिटल सिक्का चलही।

कोष खजाना कोठी धन बिन, डिजिटल भजिया तलही।।

बिन अवशेष कहाँ हो पाही, अंतर रंक-उ भूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

No comments:

Post a Comment