*छत्तीसगढ़ मा अभिवादन के परम्परा मा जोहार अउ जय जोहार*
गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज भगवान के नाम के महिमा के बखान करत लिखथें कि-
1,एक घड़ी आधो घड़ी, पुनि आधो के आध।
तुलसी चर्चा राम के, कटे कोटि अपराध।।
2,कलयुग केवल नाम अधारा।
सुमर सुमर नर उतरहीं पारा।।
आदिजुग ले मनखें मन भगवान के महिमा के गुनानवाद करत आवत हें, नाम लेवत आवत हें, चाहे भजन कीर्तन होय या फेर दुआ सलामती या फेर अभिवादन। भारतीय संस्कृति मा अभिवादन करे के जुन्ना परम्परा हे। अभिवादन मा जय राम, राम राम, जय श्री कृष्ण, राधे राधे, सीताराम, जय भगवान, जय भोले, हरि ओम, जय माता दी आदि ...... कस कतकोन नाम मनखें मन लेथें। जेमा वो विधाता के नाम तो लेवाते हे, संगे संगे इही अभिवादन के बहाना मनखें के आत्मीय जुड़ाव, मया ममता अउ सादर सम्मान के भाव घलो दिखथें। वइसे तो बड़े के छोटे मन पाँव पायलागी करथें, फेर गांव घर के रोज मिलइया लइका, सियान, जवान मन ला अभिवादन करके आदर भाव दे जाथें। अभिवादन के शब्द बोले बर बड़े छोटे नइ लगे सब अपन जुड़ाव अउ विनम्रता देखावत अभिवादन करथें। छत्तीसगढ़ मा मितान बदे के घलो रिवाज। एक मितान दूसर मितान ल घलो बरोबर अभिवादन के शब्द बोलथे, जैसे- सीताराम मितान, जय जोहार मितान, सीताराम गंगाजल, गंगाबारु आदि आदि।
मनखें मनके आपस मा मेल मिलाप के बेरा अभिवादन स्वरूप भगवान मनके नाम लेय के ये जुन्ना परम्परा, आजो सरलग चलन मा हे। आज आधुनिक काल मा गुडमार्निंग, गुड़ इवनिंग,हाय हलो,नमस्ते----आदि कस कतको नवा शब्द घलो सुनब मा मिलथे। पंथ अउ समाज के अनुसार घलो अभिवादन मा जय सतनाम, साहेब बन्दगी, जय बूढ़ादेव, जय बड़ादेव, जय लोधेश्वर, जय बहादुरीन कलारिन, जय राजिम दाई, जय शकाम्भरी........ आदि कस अउ कतकोन अपन अपन इष्ट देव के नाम लेवत मनखें मन दिखथें। धरम अनुसार घलो अलग अलग अभिवादन के शब्द प्रचलित हे, जैसे सलाम, खुदा हाफिज आदि आदि। हमर भारत वर्ष मा भिन्न भिन्न राज के पहिचान उंखर अभिवादन ले घलो हो जथे, जइसे तमिलनाडु अउ केरल मा वणक्कम, पंजाब मा सत श्री काल, राजस्थान मा खम्बा घणी, गुजरात मा केम छो ---आदि चलथे, वइसने हमर राज छत्तीसगढ़ के बहुप्रचचित अभिवादन के शब्द आय जोहार। हमर छत्तीसगढ़ के पार परम्परा, संस्कृति संस्कार अउ तीज तिहार मा कृषि अउ ऋषि संस्कृति के साथ साथ आदिवासी संस्कृति के घलो बरोबर योगदान हें। "जोहार" जे आदिवासी संस्कृति के उपज आय। जेला मुख्य रूप ले आस्ट्रो एशियाई/मुंडारी या सन्थाली भाषा ले निकले एक आदिवासी अभिवादन के शब्द माने जाथे। जेखर मूल अर्थ मा प्रकृति के प्रति भाव समर्पण समाहित हे। "जोहार" हमर छत्तीसगढ़ के संगे संग उड़ीसा, झारखंड, मध्यप्रदेश अउ पश्चिम बंगाल के वनांचल क्षेत्र मा अभिवादन के रूप मा सुने बर मिलथे। जोहार माने जो अउ हार या जउन हार गय हे, उंखर मन बर या उंखर जयकार, अइसन शाब्दिक अर्थ बिल्कुल भी नोहे। बल्कि जोहार के एक अर्थ- जय+हर ला माने जाथे, जय मतलब जय जयकार अउ हर माने प्रकृति के देवता भगवान शिव। मतलब जोहार मा भगवान शिव अउ प्रकृति के जयजयकार समाहित हे। भगवान शिव आदिवासी संस्कृति मा अपन विशेष स्थान रखथें, बड़ादेव, बूढ़ादेव......आदि रूप मा भी भगवान शिव ला पूजे भी जाथे। जोहार के मूल मा सबके कल्याण करइया भगवान शिव अउ प्रकृति के जयकार हे। जोहार कहे से देश, राज,पेड़ प्रकृति अउ मनखें संग जीव जानवर आदि सबो के सलामती अउ बढ़वार के भाव झलकथे।
कतको मनखें मन जोहार के संग जय जोड़के "जय जोहार" घलो कथें, जेला सियान/ जानकार मन सही नइ माने।जइसे राम राम ह जय राम होइस, जय, भोले ह जय भोले होइस, सतनाम ह सतनाम होइस.......... लगथे इही सब के देखा देखी अउ भाव प्रवाह के सेती जोहार घलो आज "जय जोहार" के रूप ले ले हे। जानकार मन जोहार शब्द ला अपन आप मा पूर्ण अउ सार्थक अभिवादन के शब्द माने हें, फेर अभी चलन मा जय जोहार घलो हे। जय जुड़े के एक कारण यहू हो सकथे। जइसे खेवनहार, पालनहार, संहार------ आदि शब्द ल देखबों ता येमा हार मतलब हरना अर्थ हे। आखिर खेवनहार/पालनहार/डोंगहार------ तो वो विधाता/भगवान ही आय। मतलब जोहार माने जो हरन करने वाला ए, अर्थात जो दुख हरइया ए। अइसन दुख हरइया के जय हो, इही भाव मा "जय जोहार" घलो प्रासंगिक लगथे। जोहार के घलो दू भेद दिखथे- सेवा जोहार अउ जय जोहार। आज सेवा जोहार बनांचल अउ जयजोहार मैदानी छत्तीसगढ़ के अभिवादन के शब्द बन गय हे। उड़ीसा, झारखंड,पश्चिम बंगाल अउ मध्यप्रदेश के वनांचल क्षेत्र मा आजो अभिवादन बर जोहार ही बोले जाथें।
पहली बेर जोहार कोन बोलिस होही, ये शब्द इहाँ कब ले प्रचलित हे, ए डाहर जाबों ता रामचरित मानस के अयोध्याकांड मा एक चोपाई हे, जेमा निषादराज जी महराज भगवान राम ले मिले के बेरा उन लाजोहार करत अपन सैन्य साज के बढ़वार के कामना करत दिखथें--
*चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी॥*
माने निषादराज जी द्वारा त्रेता युग मा ये शब्द के प्रयोग के वर्णन मिलथे। निषादराज जी पेड़ प्रकति के बीच रहत रिहिन ते पाय के वनांचल मा ये शब्द आजो प्रचलित हे। जोहार ले ही जोहारना बने हे, जेखर मतलब हे अपन श्रद्धा भाव ला व्यक्त करना। यादव भाई मन के दोहा मा सुने बर घलो मिलथे, "ठाकुर घर जोहारेल गेंव बुचुवा हड़िया मा बासी रे" माने मिलेल जाना, भाव प्रकट करना एखर मूल अर्थ ए। पौनी पसारी के नेंग करत गांव मा ठाकुर, लोहार, बैगा आदि मन घलो घर घर जोहारथे अउ अपन पौनी पसारी लेथें।। कुछ मन भड़के, चिढ़े या खिसियात बेरा घलो कथें कि "मैं फलाना ला बनेच जोहारेंव" फेर एखर मतलब सकारात्मक न होके अपन रिस/रोष ला व्यक्त करना हे।
जोहार शब्द ला लेके छत्तीसगढ़ी मा कतको कन मनमोहक गाना सुने बर मिलथे।
कुछ गीत के मुखड़ा प्रस्तुत हे- जोहर जोहर मोर ठाकुर देवता/
बिहना के जोहार लेले, मुस्काके जोहार लेले।
देवी जोहार-जोहार/
तोला गाड़ा गाड़ा जोहार/
तैं जोहार लेबे संगी/
जोहार ले सगा/
छेरछेरा जोहार/
तोला सौ सौ जोहार, घेरी बेरी जोहार।।
सेवा जोहार/
जोहार जोहार दाई/
तोला जोहार दाई/जोहार हे जोहार हे/
जोहार जोहार देव
जोहार बुढ़िदाई------
आदि कतकोन गीत मा जोहार संघरे हे, कुछ गीत मन मा मा जय जोहार भी हे। जइसे- जय जोहार ले ले मोर भैया.... अउ कतकोन गीत हे
जोहार सिर्फ अभिवादन के शब्द नोहे, येला बोले भर नइ जाय बल्कि बोलत बेरा हाथ घलो जोड़े जाथे, जेमा सम्मान, विनम्रता अउ आदर के भाव झलकथे। सार मा कहन ता जोहार मा जग कल्याण के भाव, आदर सत्कार, विनम्रता,अभिवादन, सुवागत आदि के संगे संग एक भावात्मक जुड़ाव हे। ता आप जम्मो ला मोर जोहार हे पायलागी हे।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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