*प्रेम, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत संगम - पुन्नी के चंदा*
डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ की पुस्तक पुन्नी के चंदा छत्तीसगढ़ी साहित्य की एक उल्लेखनीय कृति है,जिसमें प्रेम,लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह मात्र कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि कवि के हृदय में समाहित प्रेम की सजीव अभिव्यक्ति है। ‘पुन्नी’ उनकी धर्मपत्नी का नाम है और ‘चंदा’ स्वयं कवि का प्रतीक बनकर सामने आता है। इस प्रकार यह कृति व्यक्तिगत प्रेम और आत्मीयता को साहित्यिक रूप देती है। कविता-संग्रह में गीत, साल्हो, गीतिका, ददरिया और ग़ज़लें सम्मिलित हैं, जिनमें घर-गाँव, खेत-खार, नदी-पहाड़, मेला-मड़ई और भाव-भजन का चित्रण है। कवि ने प्रेम की कोमल अनुभूतियों के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों, जैसे विवाह की गंभीरता और आत्मनिर्भरता की आवश्यकता, को भी रेखांकित किया है। साथ ही छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक सहिष्णुता और मेहनतकश जीवन को गौरवगान के रूप में प्रस्तुत किया है।
पहली ही कविता में कवि अपनी प्रेयसी से अपने प्रेम को पढ़ने का अनुनय विनय करता हुआ दिखाई देता है, साथ ही यह ज्ञात होता है कि यह गीत कवि द्वारा लिखित एक प्रेम पत्र है।
थोरिक आरो ले ले ओ।
मोर जी हा जुड़ाही थोरिक आरो ले ले ओ।
सबों कइथें तोर मया म हो गेंव मय मतवार ।
डोंगरगढ़ हा देखबे बनहीच अब तोर ससुरार ।। थोरिक आरो ले ले ओ।....
पुस्तक पढ़ने के बाद पाठक कवि और उसके प्रेयसी के मध्य पनपने वाले प्रेम को सहज समझ सकते हैं। बम्लेश्वरी धाम डोंगरगढ़ का विशेष जिक्र कवि ने किया है, साथ ही डोंगरगढ़ को प्रेयसी का मायका भी बताया है। प्रेम के एक बानगी इस कविता में देखिए-
सोवत जागत उठत बइठत तोरेच गीत मंय गाथंव।
आरो पाके तोर मंय जोड़ी एती ओती जाथंव।
मोर सुख चैन नींद गंवागे ओ,
काली महुआ बीने ल तंय आबे ।।..
अटूट प्रेम प्रदर्शित करती काव्य पंक्तियां दृष्टव्य हैं-
तोर बिगर जिनगी के आज कोनो ठिकाना नइहे।
तोर रहे ले मंय हंव, तंय नइ त ये जमाना नइहे।
शादी का बंधन केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि एक गहन जिम्मेदारी है। विवाह तभी किया जाता है जब युवक- युवती आत्मनिर्भर होकर कमाने लगता है, क्योंकि उसे परिवार का भरण-पोषण करना होता है। साथ ही सही उम्र भी जरूरी है। इसी तथ्य को कवि विशेष रूप से रेखांकित करते हुए कहता है कि विवाह का उद्देश्य केवल उत्सव या आनंद नहीं, बल्कि जीवन की जिम्मेदारियों को निभाना है। यथा -
भांवर के पहिले चेतव चेतावव पढ़व अउ कमाव गा।
गुड्डा-गुड्डी के खेल नइहे टूरा-टूरी के बिहाव गा।।
निम्नलिखित कविता में कवि ने छत्तीसगढ़ की महानता का गुणगान किया गया है। साथ ही अपने प्रदेश को महान बताते हुए उसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता को उजागर किया है-
काकर पांव पखारंव मैं अउ काकर करंव बखान
मोर छत्तीसगढ़ हे महान।
साल्हो, पंडवानी अउ ददरिया सबो के मन ल भाथें
राऊत नाचा, पंथी अउ करमा हर उत्सव म सुहाथें
इहां के कन-कन म लिखे हे गीता अउ कुरान
मोर छत्तीसगढ़ हे महान....
कवि कहता है कि मेहनत, देह का पसीना और मिट्टी ही छत्तीसगढ़ की असली पहचान है। खेती-किसानी छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि यही हमारी संस्कृति और जीवन का आधार है। किसान का खेत और उसकी मेहनत ही घर की इज्जत है। यदि हम अपनी जमीन और खेती को छोड़ देंगे, तो हमारी अस्मिता और सम्मान भी मिट्टी में मिल जाएगा।
मेहनत देह म माटी पसीना हे छत्तीसगढ़ के निसानी।
छोड़ो झन ये भुइया ल झन छोड़व अपन किसानी।।
अपन घर के इज्जत अपन माटी म झन मिलावव रे ।।
एक बाल कविता भी संग्रहित है है इस काव्य संग्रह में । कुछ पंक्तियाँ-
दूध ल करिया बिलाई पी गे।
भात खावत हे रोगहा कालू ।।
चाहे प्रेम की कविता हो या जनजागरण या फिर प्रकृति की, भाव की गूढ़ता के साथ-साथ शिल्प की प्रगाढ़ता भी विश्वकर्मा जी की विशेष खासियत है। सरल और सहज शब्दों के प्रयोग के साथ अलंकारिक छटा ने कविता को और अधिक निखार दिया है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत है-
अनुप्रास अलंकार — “गिजिर गिजिर हांसत हे सुंदरी”,मट मट मट मट,गिजगिज गिजगिज।
रूपक अलंकार — “चूंदी अस लागे नागिन लपटे” फूल सरी खिलके,नागिन कस चुन्दी,तंय हस मोर गंगा सागर।
उपमा अलंकार — “चूंदी जस लागे नागिन, "मोरनी कस नाचय,"मोर आंखी के पुतरी तंय मोर पुन्नी के चन्दा"।
मानवीकरण अलंकार — “गावत हे कोयली, नाचत हवे मोर”
"नंदिया, नरवा, तरिया सबो देहीं एकर गवाही"
ऐसे ही और अनेक उदाहरण मिलते हैं। इसके साथ ही कविता में चित्रात्मकता और ध्वन्यात्मकता का भी सुंदर प्रयोग दिखाई देता है, जिससे रचना और अधिक प्रभावशाली बन गई है।
हिंदी के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी भाषा में भी समान रूप से गद्य और पद्य दोनों विधाओं में लेखन करने वाले डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ जी की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उसमें से एक अहम पुस्तक है
छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "पुन्नी के चंदा"। इस पुस्तक में दो दर्जन गीत,कविताएं संग्रहित है। इस पुस्तक के अधिकांश कविता गीतात्मक है।
मुझे इस पुस्तक के कविताओं और गीतों को न सिर्फ पढ़ने बल्कि अधिकांश गीतों को विश्वकर्मा जी के मधुर कंठ से सुनने का भी सौभाग्य मिला है। जितने उत्कृष्ट वे लिखते हैं, उतनी ही उत्कृष्ट उनकी प्रस्तुति भी रहती है। पुन्नी के चंदा प्रेम, लोकसंस्कृति, मेहनतकश जीवन और छत्तीसगढ़ की महानता का पिटारा है। यह कृति पाठकों को कवि के हृदय की गहराइयों से जोड़ती है, जहाँ व्यक्तिगत प्रेम और सांस्कृतिक- सामाजिक चेतना एक साथ प्रवाहित है। पाठक इस पुस्तक को जरूर पढ़ें।
*जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"*
बालको,कोरबा(छग)
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पुन्नी के चंदा (छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह)
कवि - डॉ.माणिक विश्वकर्मा'नवरंग'
प्रकाशक -वैभव प्रकाशन, रायपुर (छ.ग.)
कीमत - 100 रुपये
वर्ष -2014 (छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा)
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