Thursday, 16 July 2026

काव्याञ्जलि- दलित जी

 काव्याञ्जलि- दलित जी


करिस छंद के जौन हा, लिख लिख नित बढ़वार।

पग मा माथ नवाँव मँय, पिरो भाव के हार।।1


नाँव मिटाये नइ मिटै, करनी जेखर पोठ।

साहित के आगास मा, बरै सियानी गोठ।।2


पैरी जब जब बाजही, मुख मा आही गीत।

दया मया सत बाढ़ही, फुलही फलही मीत।।3


रचना रिगबिग हे बरत, भले बछर गे बीत।

डहर नवा गढ़ते हवै, जनकवि जी के गीत।।4


जनकवि जी के काव्य ए, जन जन के आवाज।

पढ़े दलित जी मंच ले, करै जिया मा राज।।5


नाँव अमर जुगजुग रही, जब तक पुरवा नीर।

जनकवि कोदू राम जी, लिखिन जगत के पीर।।6


साहित के वो देंवता, जनकवि वो कहिलाय।

बगरै बाँढ़य छंद बड़, आस ओखरे आय।।7


सँजो ददा के आस ला, अरुण निगम जी आज।

पालत पोंसत छंद ला, करत हवैं निक काज।।8


साधक बन सीखत हवैं, कतको कवि मन छंद।

महूँ करत हँव साधना, लइका अँव मतिमंद।।9


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को (कोरबा)


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