वैध शराब-कुंडलियाँ
पीयव वैध शराब ला, हे अवैध बेकार।
साथ देव सरकार के, झन पारव गोहार।
झन पारव गोहार, कोष बर हवै जरूरी।
जनता मन के मांग, इही मा होही पूरी।।
भट्ठी बढ़ही रॉज5, मरौ चाहे तुम जीयव।
सरकारी फरमान, वैध दारू ले पीयव।।
मानो शासन बात ला, होठ दाँत मा दाब।।
वैध शराब अमृत हरे, जहर अवैध शराब।
जहर अवैध शराब, बचो पीये ले येला।
बेंचे जेला लोग, कई मोहल्ला ठेला।।
वैध शराब बिसाव, स्वाद ओखर पी जानो।
भरत हवै नित कोष, बात शासन के मानो।।
भट्ठी हे सरकार के, काबर जाथस भूल।
दू पइसा बचही कही, इती उती झन ढूल।
इती उती झन ढूल, तीर के भट्ठी मा जा।
होही यदि तकलीफ, बात शासन ला बतला।।
असली मंद खरीद, मना शादी अउ छट्ठी।
झांक तीर तखार, हवै सरकारी भट्ठी।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
चुप हैं
बाबा लोग लत लोभ और प्रपंच लेकर चुप हैं।
नेता साहब वैपारी नोटों का बंच लेकर चुप हैं।।
आम जनता शिफ्ट बलेनो पंच लेकर चुप हैं।।
वक्ता कवि लेखक माइक मंच लेकर चुप हैं।।
अय्यासी करने वाले माल टंच लेकर चुप हैं।।
दल्ला लोग टूर और पंच लंच लेकर चुप हैं।।
खैरझिटिया
पावस पावन-सवैया
पावस पावन आ बरसावन लागत हे रस धार सखा।
तरिया परिया हरिया भरगे जल लांघत हावय पार सखा।।
गरजे बदरा चमके बिजुरी जस मातय हावय रार सखा।
झिंगुरा खग दादुर मोर ह गावय लागय रोज तिहार सखा।।
खोर गली बन बाग कली सब नीर ल पी मुस्कात जही।
ताल कुआँ नदिया नरवा भरही तब दादुर बात कही।।
सूरज देव लुकाय रही त बिहान घलो हर रात रही।
झींगुर चातक मोर खुशी अब मोर जिया म हमात नही।।
पावस के बड़ पावन बूंद ल लावत हे बरसा धरके।
हाँसत हे बखरी अउ रोज नहावत हे परवा घर के।।
ताल खुशी म नाचत हे सुर छेड़त हे डबरा भरके।
मंद फुहार धरे बरसा सब जीव म आस भरे झरके।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा
https://youtu.be/j2V9_XbiozI?si=nW_f6ZdokiZwPjCg
मनखें मनके अति-सार छंद
सब के संख्या हवै बराबर, ताल मेल तभ्भे हे।
जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।
हवा दवा फर फूल देय बन, बन बिन नइ जिनगानी।
ताल नदी नरवा नदिया दै, जीव जंतु ला पानी।।
माटी उप्पर छाभे गारा, ये जग संकट में हे।
जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।
मनखें मनके स्वारथ आघू, कुछु हा नइ बाँचत हें।
हाय हटर कर रतन जोरके, देख देख नाँचत हें।
हाथी माँछी कुकुर बिलाई, धरती मा सब्बे हे।
जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।
कोनो काटे बन बिरवा ला, कोनो नदिया पाटे।
मछरी कुकरी कुकुर मार के, लहू घलो ला चाँटे।।
मनुष अकेल्ला जी पाही का, कतका अवकाते हे।
जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।
मनखें करैं जे मन मा आये, कइसन किरिया खाहे।
अपन जघा मा सबें जियत हें, तभो जातरी आहे।।
भुगते पड़ही करनी के फल, लिखे विधाता जे हे।
जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।
जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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