बस मिही भर बोलत हँव।
अखबार चुप हें, बाजार चुप हें।
विस्तार चुप हें, सार चुप हें।।
संसद चुप हें, सड़क चुप हें।
दमदार चुप हें, कड़क चुप हें।।
रीत चुप हें, नीत चुप हें।
गाथा चुप हें, गीत चुप हें।
निराशा चुप हें, आशा चुप हें।
आखर चुप हें, भाषा चुप हें।।
मैं कोरा कागत अपन गत तोलत हँव।
सब तो चुप हें,बस मिही भर बोलत हँव।।
छोटे चुप हें, बड़े चुप हें।
सोए चुप हें, खड़े चुप हें।।
कोट चुप हें, कछेरी चुप हें।
दुकान चुप हें, फेरी चुप हें।
गांव चुप हें, शहर चुप हें।
गहर चुप हें, लहर चुप हें।
विज्ञान चुप हें, भूगोल चुप हे।
बाँसुरी चुप हें, ढोल चुप हें।।
मैं मुँह लुकात बेगारी, मुँह खोलत हँव।
सब तो चुप हें, बस मिही भर बोलत हँव।।
सवाल चुप हें, जवाब चुप हें।
जागरण चुप हें, ख्वाब चुप हें।।
दिल्ली चुप हें, दरबार चुप हें।
नींव चुप हें, मीनार चुप हें।।
मौज चुप हें, दर्द चुप हें।
पावस चुप हें, सर्द चुप हें।
मेढ़क चुप हें, मयूर चुप हें।
कौवाँ चुप हें, कुकुर चुप हें।
मैं आदमी अपन आप ला टटोलत हँव।
सब तो चुप हें, बस मिही भर बोलत हँव।।
सदी के महा महानायक चुप हे।
खिलाड़ी चुप खलनायक चुप हें।।
टाईगर चुप हें, भाई चुप हें।।
पालक चुप हें, कसाई चुप हें।।
डंडा चुप हें, झंडा चुप हें।
मौलवी चुप हें, पंडा चुप हें।।
समाजसेवी, समाज सुधारक चुप हे।
धरम करम धरइया प्रचारक चुप हें।।
सत्ता के सुख पाय बर विष घोलत हँव।
सब तो चुप हें,बस मिही भर बोलत हँव।।
शेर चुप हें, सियार चुप हें।
मचान चुप हें, मियार चुप हें।
सच चुप हें, झूठ चुप हें।
बहार चुप हें, ठूठ चुप हें।।
बाजा चुप हें, राजा चुप हें।
बासी चुप हें, ताजा चुप हें।
आम चुप हें, खास चुप हें।।
मंजिल चुप हें, तलाश चुप हें।।
छद्म आँधी मा रहिरहि डोलत हँव।
सब तो चुप हें,बस मिही भर बोलत हँव।।
आलू चुप हें, गोभी चुप हें।
चमचा चुप हें, लोभी चुप हें।।
चोर चुप हें, रखवार चुप हें।
ज्ञानी चुप हें, गवाँर चुप हें।।
सग चुप हें, आन चुप हें।।
रात चुप हें, दिनमान चुप हें।।
प्रीत चुप हें, बैर चुप हें।।
हाथ चुप हें, पैर चुप हें।।
मैं पापी पेट भूख मा डोलत हँव।
सब तो चुप हें, बस मिही भर बोलत हँव।।
बार चुप हें, मास चुप हें।।
दूर चुप हें, पास चुप हें।।
शिव चुप हें, जीव चुप हें।
दूध चुप हें, घीव चुप हें।।
सोना चुप हें, चाँदी चुप हें।
बफे चुप हें, माँदी चुप हें,
शिक्षा चुप हें ,भिक्षा चुप हें।
तृप्ति चुप हें, इच्छा चुप हें।।
आँखी के आंसू मा मछरी झोलत हँव।
सब तो चुप हें, बस मिही भर बोलत हँव।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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