Sunday, 22 March 2026

महतारी-लावणी छंद

 महतारी-लावणी छंद


मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।

मया लुटाथे बेसुध होके, अवतारी उपकारी ए।।


मया कतिक होथे माई के, तउल सके नइ कोनों हा।

कलम काय गुण बरनन सकही, नइ सकैं धरा नभ दोनों हा।।

महतारी देवी धरती के, सगरो जगत पुजारी ए।

मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।


नइ पनपे ये जग मा जिनगी, मया बिना महतारी के 

जतन लोग लइका के करथे, तज सुख दुनियादारी के।।

महतारी ए खान मया के, बाकी सब बैपारी ए।

मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।


मया पाय बर महतारी के, देवन तक तरसत रहिथे।

मुख मा लोरी अँचरा ओली, गोरस गंगा कस बहिथे।।

लड़ जाथे लइकन बर सब ले, ज्वाला ए चिंगारी ए।

मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 20 March 2026

चइत नवरात्री अउ हिन्दू नव बछर के गाड़ा गाड़ा बधाई आगे आगे नवा साल

 चइत नवरात्री अउ हिन्दू नव बछर के गाड़ा गाड़ा बधाई


नवा साल-गीत


ये नवा साल मा का हे नवा।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


चैत अँजोरी एक्कम, दाई पधारे हे।

माता के भक्ति मा, गूँजत घर द्वारे हे।।

सब माँ ला मनाएँ, जस गा।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


जम्बूद्वीप के जामुन, नवा सजे हे।

उल्हवा निमवा मा, फूल लदे हे।।

नाचे रुख राई, फूल पात पा।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


सरसो अरसी चना गहूँ, घर आवत हे।

पडकी परेवना मन झूम झूम गावत हें।।

जाड़ घाम के नइहे पता।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)




आगे आगे नवा साल 


आगे आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।

डारा  पाना  गीत   गाये,पुरवाही  मा  हाल।


पबरित महीना हे,एक्कम  चैत अँजोरी के।

दिखे चक ले भुइँया हा,रंग लगे हे होरी के।

माता रानी आये हे,रिगबिग बरत हे जोती।

घन्टा शंख बाजत हे,संझा बिहना होती।

मुख  मा  जयकार  हवे ,तिलक  हवे  भाल।

आगे आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।


नवा  नवा  पाना  मा,रूख  राई नाचत हे।

परसा फुलके लाली,रहिरहि के हाँसत हे।

कउहा अउ मउहा हा इत्तर लगाये हे।

आमा  के  मौर मा छोट फर आये हे।

कोयली  नाचत गावत हे,लहसे आमा डाल।

आगे आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।


सोन फूल्ली बेंच बम्भरी,पयरी बेंचे चॉदी के।

मउहा  परसा   पाना  म, पतरी बने मांदी के।

अमली कोकवानी हा,सबला ललचाय।

मन  के  चरत  हावय,छेल्ला गरू गाय।

लइका  मन  नाचत  हे,झनपूछ हाल चाल।

आगे आगे नवा सालआगे आगे नवा साल।


खेत ले घर आगे हे,चना गहूँ सरसो अरसी।

गर्मी  के  दिन आवत  हे,बेंचावत हे करसी।

साग भाजी बारी म,निकलत हे जमके।

दीया  रोज  बरत  हे, गली खोर चमके।

बरतिया मन नाचत हे,दफड़ा दमऊ के ताल।

आगे  आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


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नवा बछर (सार छंद)


फागुन के  रँग कहाँ हटे हे, कहाँ  घटे हे मस्ती।

नवा बछर धर चैत हबरगे,गूँजय घर बन बस्ती।


चैत  चँदैनी  चंदा  चमकै,चमकै रिगबिग जोती।

नवरात्री के पबरित महिना,लागै जस सुरहोती।

जोत जँवारा  तोरन  तारा,छाये चारों कोती।

झाँझ मँजीरा माँदर बाजै,झरै मया के मोती।

दाई  दुर्गा  के  दर्शन ले,तरगे  कतको  हस्ती।

फागुन के रँग कहाँ हटे हे,कहाँ घटे हे मस्ती।


कोयलिया बइठे आमा मा,बोले गुरतुर बोली।

परसा  सेम्हर  पेड़  तरी  मा,बने  हवै रंगोली।

साल लीम मा पँढ़री पँढ़री,फूल लगे हे भारी।

नवा  पात धर नाँचत हावै,बाग बगइचा बारी।

खेत खार अउ नदी ताल के,नैन करत हे गस्ती।

फागुन  के रँग कहाँ हटे  हे,कहाँ  घटे हे मस्ती।


बर  खाल्हे  मा  माते पासा, पुरवाही मन भावै।

तेज बढ़ावै सुरुज नरायण,ठंडा जिनिस सुहावै।

अमरे बर आगास गरेरा,रहि रहि के उड़ियावै।

गरती चार चिरौंजी कउहा,मँउहा बड़ ममहावै।

लाल कलिंदर ककड़ी खीरा,होगे हावै सस्ती।

फागुन के रँग कहाँ हटे हे,कहाँ घटे हे मस्ती।


खेल मदारी नाचा गम्मत,होवै भगवत गीता।

चना गहूँ सरसो घर आगे,खेत खार हे रीता।

चरे  गाय गरुवा मन मनके,घूम घूम के चारा।

बर बिहाव के बाजा बाजै,दमकै गमकै पारा।

चैत अँजोरी नवा साल मा,पार लगे भव कस्ती।

फागुन के रँग  कहाँ  हटे  हे,कहाँ घटे हे मस्ती।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरखिटिया"

बाल्को(कोरबा)


नवरात🐾🐾


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माता रानी के आगे , नवरात  संगी रे।

दाई के पँवरी म , नंवे हे  माथ संगी रे।


बिराजे हे दाई,गाँव गली खोर म,

कुँवार अंजोरी  हे, पाख संगी रे।


झांझ  - मंजीरा ,  मादर   बजत  हे,

जस-सेवा  सेऊक  हे,गात  संगी रे।


बरत हे देवाला,रिगबिग-रिगबिग,

अंगना म लइका,मेछरात संगी रे।


घन्टा अउ संख संग,गुंजत हे आरती,

भरे माड़े  हे परसाद म,परात संगी रे।


संख चक्र गदा धरे,बघवा म बइठे,

धरम ध्वजा दाई,फहरात  संगी रे।


चल   रे  "जीतेन्द्र" , भक्ति   के  रद्दा,

दाई दुर्गा के रहि,मुड़ म हाथ संगी रे।


             जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


              बालको(कोरबा)


              9981441795


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गंगोदक सवैया

देख  नारा  लगे  रात  बारा  बजे जेन  सोये  रही तेन खोही  सदा।

नाचही ताल मा जे नवा साल मा ओखरे नाम मा शान होही सदा।

फोकटे  वो नवा साल फैले नसा  जाल पैसा  सिराही पदोही सदा।

चैत जोती जलाले नवा साल वाले जिया मा खुशी दाइ बोही सदा।


खैरझिटिया

विश्व गौरैय्या दिवस विशेष- दोहा गीत

 विश्व गौरैय्या दिवस विशेष- दोहा गीत


गौरैय्या चिरई हरौं, फुदकत रहिथौं खोर।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


मोर पेट भर जाय बस, दाना  देबे  छीत।

पानी रखबे घाम मा, जिनगी जाहूँ जीत।।

गोटीं मोला मारके, देथस काबर खेद।

भले पड़े या झन पड़े, जी हो जाथे छेद।।

हावय तोरे हाथ मा, ये जिनगी हा मोर।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


दू दाना के आस मा, आथँव बिना बुलाय।

कभू पेट जाथे अघा, कभू रथँव बिन खाय।

जंगल झाड़ी भाय नइ, नइ भाये वीरान।

मनुष देख फुदकत रथँव, मैं पंछी अंजान।।

पानी पुरवा पेड़ मा, बिख जादा झन घोर।।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


बाढ़त हावय ताप हा, बाढ़त हे संताप।

छिन भर मा मर जात हौं, मैंहा अपने आप।

सबदिन मैं फुदकत रहौं, इही हवै बस आस।

गाना गाहूँ तोर बर, छोड़ भूख अउ प्यास।

कुनबा देख सिरात हे, आरो ले ले मोर।।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


जीतेंद्र वर्मा"खैझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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कुंडलियाँ छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


गौरइया


परछी अँगना मा फुदक, मन ला लेवै जीत।

वो गौरइया नइ दिखे, नइ सुनाय अब गीत।।

नइ सुनाय अब गीत, सिरावत हे गौरइया।

मारे पानी घाम, मनुष तक हे हुदरैया।

छागे छत सीमेंट, जिया मा गड़गे बरछी।

उजड़त हे बन बाग, कहाँ हे परवा परछी।।


काँदी पैरा जोड़ के, झाला अपन बनाय।

ठिहा ठौर के तीर मा, गौरइया इतराय।।

गौरइया इतराय, चुगे उड़ उड़ के दाना।

छत छानी मा बैठ, सुनावै गुरतुर गाना।

आही गाही गीत, रखव जल भरके नाँदी।

गौरइया के जात, खोजथे पैरा काँदी।।


दाना पानी छीन के, हावय मनुष मतंग।

बाढ़त स्वारथ देख के, गौरइया हे दंग।।

गौरइया हे दंग, तंग जिनगी ला पाके।

गाके काय सुनाय, मौत के मुँह मा जाके।

छिन छिन सुख अउ चैन, झरे जस पाके पाना।

कहाँ खुशी सुख पाय, कोन ला माँगे दाना।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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कुंडलियाँ


चिरई बइठे हाथ मा,कइसे चूमय गाल।

मनखे मनहा आज तो,बनगे हावै काल।

बनगे हावै काल, हवा पानी ला चुँहके।

मरे पखेड़ू भूख,छिंनय चारा ला मुँह के।

जंगल झाड़ी काट, करत हे मनके तिरई।

काखर कर बतियाय,अपन पीरा ला चिरई।


खैरझिटिया


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गीत-चिरई बर पानी


चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।

गरमी के बेरा आगे, तड़पे जीव परानी।।


जरत हवय चटचट भुइँया, हवा तात तात हे।

मनखे बर हे कूलर पंखा, जीव जंतु लरघात हे।।

रुख राई के जघा बनगे, हमर छत छानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


बिहना आथे चिंवचिंव गाथे, रोथे मँझनी बेरा।

प्यास मा मर खप जाथे, संझा जाय का डेरा।।

काल बनगे जीव जंतु बर, हमर मनमानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


दू बूँद पानी माँगे, दू बीजा दाना।

पेड़ पात बीच रहिथे, बनाके ठिकाना।।

चिरई बिन कहानी कइसे, कही दादी नानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


https://youtu.be/KOhYz_btXhQ?si=-9HU9ANTZirSyr_A&sfnsn=wiwspwa

खेती अफीम के-सरसी छंद

 खेती अफीम के-सरसी छंद


धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।

का होही अब छत्तीसगढ़ के, चढ़े करेला नीम।।


गोल्लर पइधे धान खेत मा, हें किसान मजबूर।।

हवे चमाचम बाड़ नसा के, मनखें तक ले दूर।।

पर नइ मारन सके परिंदा, हवें रखे बर टीम।

धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।।।


बड़े बड़े पहिचान बताके, कतको एकड़ घेर।

सूट पहिर के करे किसानी, इँखरे हावँय बेर।।

दानी धर्मी इहिमन बनगें, लें लें के इस्कीम।।

धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।।।


काय उगाही का ला खाहीं, कुच्छु समझ नइ आय।

लालच के खेती बाढ़त हे, करम धरम तिरियाय।।

खेती के होही का काली,  दरकत हावय बीम।

धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको, कोरबा(छग)


लगथे अइसने मा दारू बंद होही। विकल्प आवत हे

घर होना चाही.....

 ......घर होना चाही.....

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मनखे अस त मों मया ल,

फरे हस त गुत्तुर फर होना चाही|


कर मनके;मन ल भाय त,

फेर ऊप्पर वाले के,डर होना चाही|


इतराबे धन के राहत ले,

फेर मरे म नसीब कबर होना चाही|


अत्तीक झन भूला अपनेच म,

दुनिया के घलो खबर होना चाही|


बड़े नई होय कोनो धन-दऊलत ले,

बड़का बने बर छाती जबर होना चाही|


चाहे महल-अटारी;फ्लेट ;बंगला राहय,

फेर वोला सबले पहिली घर होना चाही|


               जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया'

                   बाल्को(कोरबा)

आज फेर कलम धरे हों.......

 ....आज फेर कलम धरे हों.......

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ओखर बर जे दबते जात हे|

ओखरो बर जे तपते जात हे|

जेन नई बोल सके,

अपन मन के भॉखा|

जेन खात हे,

जघा-जघा चॉटा|

कतरो रोवत हे ,

सुसक-सुसक के|

गोड़ तरी चपकाय हे,

मचान म घलो चक के|

दरद ल दिल के,

देखा नई सके|

जेन रॉंधथे रोटी,

फेर खा नई सके|

जुलूम के तॉवा म,

मंहू जरे हों.............|

आज फेर कलम धरे हों||


गिरे-थके हपटे बर|

खोंचका-डिपरा ल खपटे बर|

सुमत के दिया बारे बर|

अंधरा के ऑखी उघारे बर|

बंटाय मया ल जोरे बर|

सुवारथ के सुरता छोरे बर|

सिखाय बर इंसानी बात|

मॉगे बर सबके साथ|

पंवरी म सबके परे हों.........|

अाज फेर कलम धरे हों......|


खा पेटभर; खवा पेटभर|

कखरो रोटी ल,झन नंगा पेटभर|

देखा भुलाय ल रद्दा|

झन खन कखरो बर गढ्ढा|

उजरा ओनहा- कोनहा ल|

सजा दाई सोनहा ल|

कखरो बॉटा ल ,

कोनो ल खान झन दे|

फोकटे नई रोय,

कोनो ल ऑसू बोहान झन दे|

बॉटे म बढ़ते मया,

मंय धरे मया खड़े हों.....|

आज फेर कलम धरे हों...|

              जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                  बाल्को(कोरबा)

Monday, 16 March 2026

बता भला-सार छंद

 बता भला-सार छंद


आन भरोसा तेल गैस सिम, तकनीकी तन टावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


पर के देख दिखावा मा ये, चलत हवय जिनगानी।

आँय बाँय सब बुता काम हे, चुप हें दादी नानी।।

जल बिन जल जावत हे टोंटा, हवय पखाना सावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


काके करन गुमान भला अब, नइहें खेती बाड़ी।

बेंच भांज के घर दुवार ला, लेवत हावन गाड़ी।।

कटगे निमुवा बर पीपर सँग, चंदन चीड़ चितावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


चूल्हा चाकी लकड़ी नइहें, कइसे जेवन पकही।

टूरा मन जकहा बन घूमँय, टूरी मन बन जकही।।

नेकी धरमी ज्ञानी नइहें, ना नेता कद्दावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जगन्नाथ ए अपन हाथ हा, महिनत पुरथे खुद के।

स्वारथ के सब रिस्ता नाता, चार पहर बस फुदके।।

लत परवादिस फोकट मा दे, अब माँगें न्यौछावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गड़ी

 शक्ति छन्द- गड़ी चल


गड़ी चल ढुलाबों दुनो गड़गड़ी।

मया के सबे दिन झरे बस झड़ी।।

झड़क भात बासी अदौरी बड़ी।

किंजरबों गली मा हँसत हर घड़ी।


निकलबों ठिहा ले बहाना बना।

बबा डोकरी दाइ माँ ला मना।

सबें यार जुरबोंन बर रुख कना।

नँगत खेलबों धूल माटी सना।


कका देही गारी दिखाही छड़ी।

तभो नइ टुटे मीत मन के लड़ी।

गड़ी चल ढुलाबों दुनो गड़गड़ी।

मया के सबे दिन झरे बस झड़ी।।


उड़ाबों हवा मा बना फिलफिली।

चना भूंज खाबोंन खाबों तिली।।

नहाबों नदी मा उड़ाबों मजा।

जगाबों सुते ला नँगाड़ा बजा।।


छिंदी चार आमा कमल के जड़ी।

झराबोंन अमली ग जिद मा अड़ी।।

गड़ी चल ढुलाबों दुनो गड़गड़ी।

मया के सबे दिन झरे बस झड़ी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

भाजी बोहार के

 भाजी बोहार के


भाजी बोहार के।

राँध भूंज बघार के।।

दे लसुन मिर्चा के फोरन।

अउ छीटा मार  दार के।।


तन मा चुस्ती देथे,

सुस्ती जाथे हार के।।

बढ़त जात हे मांग भारी,

विनाश होवत हे खेत खार के।


ले दे के ये भाजी मिलथे,

चक्कर लगाय मा बाजार के।।

नइ हे पइसा हाथ मा,

ता देखत रह मुँह फार के।।


बड़ गुणकारी होथे ये भाजी,

राँध खा डकार के।

कफ दुरिहाथे,पाचन बढ़ाथे,

पेट के कृमि ला मार के।।


गर्मी घरी आथे,

उल्हवा उल्हवा राँध निमार के।

फर फूल घलो होथे काम के,

रख पेड़ ला दुलार के।।


जे खाय ते जाने स्वाद ला,

का होही बताय मा चार के।

भाजी पाला बैद आय तन मन के,

अउ मुख्य साग आय बुधियार के।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Friday, 6 March 2026

अऊ आगे बईरी बादर तन म मॉस नई बॉचे हे,


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  अऊ आगे बईरी बादर


तन म मॉस नई बॉचे हे,

अब हाड़ा ल घलो खा डर |

मोर सपना ल सरोय बर,

अऊ आगे बईरी बादर|

करेजा ल चानी करेबर,

फर म चना के पानी भरे बर|

रौंदें  बर  लाख-लाखड़ी  ल|

बॉचे-खोंचे आस आखरि ल|

मसरंगी अरसी के फूल कस,

हिरदे म जागे रिहिस सपना|

राहेर सरसो कस खड़े रेंहेव,

बईरी  हवा  हलईस  कतना|

लिड़िंग-लिड़िंग हालत रेंहेव,

अऊ आगे बिपत आगर....|

सरोय  बर मोर  सपना  ल,

अऊ आगे बईरी बादर......|


मोर मंसूर ल मसके बर|

मारे टोंटा ल कसके धर|

मंय   गंहू   कस,  गोहार   पारत  हंव|

जांगर ल जीतेव,जिनगी ल हारत हंव|

बुता करथन; करके करेजा के चानी|

फेर फूले-लुवे-मिंसे के बेरा; गिरथे पानी|

मंय कॉपत हंव थर-थर,

सब कीथे  जॉंगर हे त का डर.......?

मोर सपना  ल  सरोय  बर,

अऊ आगे  बईरी बादर.................|


पड़े ले थपड़ा ,करके थोथना तिरछा|

सुसके कोला म,धनिया-मेथी-मिरचा|

बिगड़हा बनाय हे जनम जात,

भगवान  मोर  रासि |

मोर लगाय ऑलू-भॉटा-गोभी,

अरो  लेहे   फॉंसी |

किसानी ल धरम मान के,

सिधोथो खेत-खार,बखरी-बारी|

उद्धमी ब्यपारी मन हॉसथे ,

गरियाथे बेटा-बहू-सुवारी |

मन  ल  मनाथो ,

किसान होय के सजा पा डर.....|

सपना ल सरोय बर,

अऊ आगे बईरी बादर.............|

               जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                     बाल्को( कोरबा)

                     ९९८१४४१७९५

Sunday, 1 March 2026

गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)

 गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)



आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।


बिन अमुवा के करे कोयली का, कांता हा बिन कंत।।



बिन फुलवा के हावय सुन्ना, मोर जिया के बाग।


आसा के तितली ना भौरा, ना सुवना के राग।।


हे बहार नइ पतझड़ बस हे, हावय दुःख अनंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



सनन सनन बोलय पुरवइया, तन मन लेवय् जीत।


आय पिया हा हाँसत गावत, धर फागुन जे गीत।।


मरत हवै मन माँघ मास मा, पठा संदेश तुरंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



देख दिखावा के दुनिया हा, बैरी होगे मोर।


छीन डरिस सुख चैन पिया के, काट मया के डोर।


पुरवा पानी पियत बने ना, आगे बेरा अंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को, कोरबा(छग)



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 होरी अउ पीरा पलायन के- सरसी छन्द



होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।


रंग छीच के फेर बुझाहूँ, फागुन हवय बुलात।।



देवारी के दीया बुझथे, बरथे मन मा आग।


शहर दिही दू पइसा कहिके, देथौं गाँव तियाग।


अपन ठिहा मा दरद भुलाहूँ, फागुन ला परघात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।।



प्लास आम डूमर कस ठाढ़े, नित गातेंव मल्हार।


फोकट देहस मोला भगवन, पेट पार परिवार।


जनम भूमि जुड़ अमरइया हे, करम भूमि हे तात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।।



अइसन रँगबे सब ला आँसो, हे फागुन महराज।


सबे बाँह बर होवै बूता, झलकत रहै अनाज।।


दरद पलायन के झन भुगते, गाँव गुड़ी देहात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)




दोहा गीत- माँ शारदे



जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


तोर शरण मा आय हौं, आरो लेबे मोर।।



तैं जननी सुर साज के, तिही ज्ञान आधार।


तोर कृपा के सध जथे, भव बाधा संसार।।


रखबे मोला बाँध के, अँचरा के माँ कोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



नइ चाही माँ धन रतन, नइ चाही रँग रूप।


मन भीतर अज्ञान के, रहय न एको कूप।


वीणा के झंकार मा, गुँजै गली घर खोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



झरत रहय माँ बोल मा, सबदिन सुर संगीत।


प्रेम देख मैं हार जँव, अहंकार लौं जीत।


दै सुकून नित सांझ हा, आस जगावै भोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को, कोरबा(छग)






गीत- बने करे भगवान(सरसी छंद)

 गीत- बने करे भगवान(सरसी छंद)



काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।


महिनत करथौं पइसा पाथौं, नइ डोले ईमान।



पचे नहीं फोकट के पइसा, जस आये तस जाय।


होथे बिरथा बड़का बनना, कखरो ले के हाय।।


बने करम नित करत रहौं मैं, भरत रहै धन धान।


काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।।



खून पछीना के धन दौलत, देवय चैन सुकून।


जादा के हे लालच बिरथा, लोभ मोह ए घून।


बने करम के होथे पूजा, करम धरम अउ दान।


काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।।



घूसखोर के गत देखे हँव, माया पइस न राम।


लरहा बनके घुमते रहिगे, होगिस काम तमाम।।


इँहें सरग हे इँहें नरक हे, लिखथे करम विधान।


काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)




गीत-करजा(लावणी छन्द)



बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।


लूट लूट बाजार बैंक ला, पाय रथें बड़का दरजा।



राज देश दुनिया मा करथें, करत रथें नित मनमानी।


उँखर ठिहा मा नेता गुंडा, अउ अफसर भरथें पानी।


सुरा सुंदरी शौक पुरावय,जय जयकार करयँ परजा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



दुनिया के कोना कोना मा, करजा के महल अटारी।


कहे कंगला अपन आप ला, आय चुकाये के बारी।


देश छोड़ के होवैं चंपत, कहि जो करना हे कर जा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



भेद करे बाजार बैंक हा, सूट बूट अउ पटको के।


एक ठिहा मा पहुँचे पइसा, घींसय पनही कतको के।


लगे एक घर कोट कछेरी, धरे एक ला घर घर जा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



मान शान ला भारत भू के, कोनो कोढ़ी झन चाँटे।


एक होय सब नियम धियम हा, बैंक रेवड़ी झन बाँटे।


फोकट मा बाँटे बर हे ता, सबके खीसा ला भर जा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)





लाजवाब कृति - गांव के हो गए (हिंदकी संग्रह)*

 *लाजवाब कृति  - गांव के हो गए (हिंदकी संग्रह)* 



                  डॉ माणिक विश्वकर्मा "नवरंग" जी की कृति "गाँव के हो गए" पढ़ने को मिला। पढ़कर मैं पूर्णतः "नवरंग" जी का हो गया। मैं क्या?  जो भी पाठक इस पुस्तक को पढ़ेंगे "नवरंग" जी के कायल हो जाएंगे। "गांव के हो गए" ग़ज़ल संग्रह (हिंदकी) एक अथाह सागर की भाँति है,जिसमें, जो पाठक जितना गोता लगाएगा, वो उतना ही जीवनोपउयोगी मोती निकाल सकता है। नवरंग साहब की बेजोड़, बेबाक लेखनी में उनके अनुभव का साक्षात सम्मिश्रण इस पुस्तक में है। नवरंग साहब की यह पुस्तक एक तरफ उनके जीवन की परिभाषा नज़र आती है तो दूसरी तरफ पाठकों को जीवन जीने की कला सिखाती है। हर कलेवर की रचना, बेजोड़ शब्द शिल्प, बिंब, प्रतीक, मुहावरें आदि में पिरोकर नवरंग जी ने इस पुस्तक में अपने मनोभाव और अनुभव को उकेरा है। 208 ग़ज़लों का विशाल संग्रह, आज के समय और विचारों को हूबहू परिभाषित कर, अलौकिक आनंद की सृष्टि निर्मित करने में पूर्णतः सक्षम है। सुप्त मनोभाव उद्वेलित करने की क्षमता नवरंग जी की ग़ज़लों में समाहित है। समाहित है- स्वच्छ चिंतन, सादगी, सत्य, जिम्मेदारी, प्रेम भाव, दर्द, इंसानियत जैसे मानवीय मूल्यों की सभी ज़रूरी चीजें। जीवन और मृत्यु के बीच नवरंग साहब ने अपनी लेखनी के माध्यम से एक हिंडोलना निर्मित कर दिया है, जिसमें मनुष्य सर्वत्र झूलता नजर आता है।


                 विसंगतियों को फटकारते हुए, निर्माण और नवनिर्माण की परिकल्पना नवरंग जी की लेखनी की ख़ासियत है। साहित्यकार होने की सच्ची परिभाषा नवरंग जी के साहित्य में सहज नज़र आती है।  सर्व प्रचलित विषयों को भी मौलिक ढंग से कहने की ताकत नवरंग जी की लेखनी में है। सभी ग़ज़लों के बारे में लिख पाना सम्भव नही है, फिर भी कुछ मतलों, शेरों का जिक्र करना चाहूंगा।



सुर तुलसी हूँ न केशव दास हूँ मैं


भूख से व्याकुलजनों की प्यास हूँ मैं।


चापलूसी कर नही सकता किसी की,


जन्म से बेबाक हूँ बिंदास हूँ मैं।



बेवजह मैं आज तक बोला नही हूँ


सत्य के पथ पर कभी डोला नही हूँ।


जानता हूँ खेल में बाजी पलटना,


मित्रवर पत्ता अभी खोला नही हूँ।


उक्त शेर नवरंग जी को परिभाषित करते नज़र आ रहे, जिसमें उनकी सहजता,सरलता,स्वाभिमान,सत्यता और आत्मविश्वास के साथ साथ बिंदास और बेबाकपन है।



ज़रूरत पड़ने पर अपनों और रिश्ते नातों के लिये ख़ामोशी और कुर्बानी की बात करते हुए, नवरंग जी लिखते है--


दर्द सहना पड़े तो सह लेना


चोट खा लेना वार मत करना।


टूटकर रिश्ते कभी नही जुड़ते,


भूलकर भी दरार मत करना।


राज़ मन मे दबा के रख लेना


तुम कभी इश्तिहार मत करना।



श्रम,अभाव और पीड़ा को शब्द देना,कोई नवरंग जी से सीखें-


पेट में सूरज लिए निकला हूँ घर से


शाम की ख़ातिर सुबह से जल रहा हूँ।


नाम के पीछे कभी भागा नही हूँ


अनबूझे प्रश्नों का मैं ही हल रहा हूँ।



धीरज ,सन्तोष, सब्र जीवन की ज़रूरी चीजों में से एक है, इसे ज़िंदगी के शब्दकोश में किस तरह समाहित करना चाहिये, एक बानगी देखिये-


मन को काबू में रखने से खुशियां मिलती है


धीरे-धीरे दुख का हर लम्हा टल जाता है


लाख हवा विपरीत रहे फिर भी इस गुलशन में


जिसकी किस्मत में फलना है वो फल जाता है



परोपकार और स्वालम्बन मानवता का मापदंड है,तभी तो नवरंग जी क़लम चलाते हुए लिखते है--


फिर ना कहना दोस्तों जोड़ा नहीं


बो दिया एक बार भी कोड़ा नहीं


हो सका जितना किया मैं शौक़ से


काम औरों के लिए छोड़ा नहीं


चल सको तो दूर तक ले जाऊंगा


मैं किसी की राह का रोड़ा नहीं



फक्कड़पन सादगी जिन्दगी में कुछ इस तरह हो--


जिंदगी में सुर नहीं है लय नहीं है


इसलिए मन में किसी का भय नहीं है


पूछते हैं लोग ठहरूँगा कहां पर


मुझको जाना किधर है यह तय नहीं है


आपको अच्छा नहीं लगता करूं क्या


यह मेरा अंदाज़ है अभिनय नहीं है



नवरंग जी के शब्द दर्पण की तरह दाग़ दिखाते नज़र आते है----


कब तलक चल पाओगे लेकर मुखौटा


सब समझते हैं बुरे कितने भले हो


जिसने भी बढ़ कर दिया है हाथ तुमको


मूंग छाती में उसी की तुम दले हो


सीढ़ियों के वास्ते बैठे रहे तुम


क्या किसी के साथ दो पल भी चले हो



मनुष्य को दूरदर्शी होकर कोरे दिखावे से दूर चले जाने की बात कहते हुए,नवरंग जी लिखते है---


नींव गर कमजोर हो तो घर बदल देता हूं मैं


छोड़कर शहनाइयां को दूर चल देता हूं मैं



व्यवस्था पर तंज कसते हुए नवरंग जी लिखते है-


योजनाएं कागजों में है सफल


जी रहे हैं ये मसल है क्या करें


पा गया बहुरूपिया मंत्री का पद


आजकल वो ही सफल है क्या करें


रोज होता है पलायन गांव से


फाइलों में ही फसल है क्या करें



अर्श से फर्श पर पहुँची ज़िंदगी, कोई क़ागज का टुकड़ा नही होता है, जो हवाओं में उड़ जाए। परिश्रम कभी भी व्यर्थ नही जाता, इसी तरह के भाव, प्रकट करते हुए नवरंग जी लिखते है--


धूल से लिपता हूं कीचड़ से सना हूं


इसलिए मजबूत हूं सबसे घना हूं


है सभी हैरान क्यों टूटा नहीं मैं


धुन रहे हैं सिर निहाई का बना हूं


खिल रही है शाखाएं मेरे ही दम से


जो जड़ों को सींचता हो वो तना हूँ



गरीबी भुखमरी के बीच क़ागजी पहल के कोरे किस्से, कैसे नवरंग जी की क़लम से छूट जाएंगे---


हर तरफ रोटी नून के किस्से


माह हफ्ते दो जून के किस्से


वक्त पे कारगर नहीं होते


 कागजी है कानून के किस्से



फटकार में भी शालीनता, नवरंग जी की ख़ासियत है, शब्द तीर की तरह लक्ष्य भेदन में समर्थ है -


सालों भट्ठी में तपा हूं तब गला हूं


इसलिए सब कह रहे हैं जलजला हूं


ज़ुल्म सहने की मेरी फ़ितरत नहीं है


छीन लूंगा नींद रातों की बला हूँ



कुछ लोग मद महुआ के नशे में चूर है, तो कुछ लोग चीज बस के, तभी तो नवरंग जी कहते है,


लोग आदत से बहुत मजबूर हैं


कीजिएगा क्या नशे में चूर हैं


लूटते हैं जो वफ़ा के नाम पर


ठीक क्या हो पाएंगे नासूर हैं



इतिहास में नाम दर्ज़ कराने के लिए ज़िंदगी के सारे जंग जीतने पड़ते हैं, हार निराशा जैसी चीजों से दूर होकर  विश्वास लेकर आगे बढ़ना पड़ता है, तभी तो नवरंग जी लिखते हैं-


दर्ज़ होते हैं वही इतिहास में


जीतते हैं जंग जो खरमास में


दिल किसी का तोड़ना अच्छा नहीं


हौसला होता है हर विश्वास में


जीत लेंगे हम यकीनन एक दिन


आज हिम्मत और प्रण है पास में



वर्ष,व्यवस्था और वातावरण की वस्तुस्थिति पर चुटकी लेते हुए नवरंग जी लिखते हैं---


कल रहा जो वही आज का हाल है


बोलने के लिए यह नया साल है


योजनाएं धरी की धरी रह गई


जो मिला मित्रवर जी का जंजाल है


बेवजह लोग डरते रहे उम्र भर


जिस्म पर भेड़ के शेर की खाल है



ख़ास चलता है आम चलता है


बस इसी तरह काम चलता है


नाम लिखना जिन्हें आता नहीं


ऐसे लोगों का नाम चलता है


इल्म वाले किनारे बैठे हैं


आजकल तामझाम चलता है



समाज में बेवजह शोर-शराबा देख दिखावा किस कदर हावी है नवरंग जी की पंक्ति  देखिये-


तुम मेरी मौत को भुनाना मत


हर जगह अस्थियां ले जाना मत


डाल देना नदी में चुपके से


देश भर में बिगुल बजाना मत


दूर रखना मुझे सियासत से


नाम पर झांकियां सजाना मत


 लोग हर बात को समझते हैं


 बेवजह शोर तुम मचाना मत



इंसान को इंसानियत से लबरेज़ आत्म आंकलन करने की ज़रूरत है, तभी तो नवरंग जी कहते हैं--


प्यार से आजकल डांटता कौन है


खाइयाँ औरो की पाटता कौन हैं


जो मिला वह उठाते रहे उम्र भर


बेबसी में भला छाँटता कौन है


लोग लिखने लगे औरों की गलतियां


अपनी गुस्ताखियां आँटता कौन है



नवरंग जी ने मानव समाज में जो देखा उसे हूबहू लिख दिया, पर लिखने जा अंदाज़ क्या कहना--


रहा जुगनू जब से सितारा हुआ हूं


तभी से शहर में नकारा हुआ हूं


नदिया तो सब पूजा करते थे मेरी


समुंदर से मिलकर मैं खारा हुआ हूं



पहले भोले थे ये शहर वाले


दांत रखते हैं अब जहर वाले


औरों के दम पर लोग उड़ते हैं


अब परिंदे बचे न पर वाले



पौराणिक कथ्य का आधुनिक परिवेश में प्रयोग पाठक को वाह-वाह करने के लिए मजबूर कर देता है-


करने से पहले वार कई बार सोचना


धोखे से मारा जाए वह बाली नहीं हूं मैं


बरगद बना हुआ हूं मैं दुनिया के वास्ते


तूफ़ां में टूट जाए वह डाली नहीं हूं मैं



मंदिर में था तो कोई मुझे जानता न था


बाज़ार में आते ही ख़बर हो रहा हूं मैं



बिंब,प्रतीक और अभिव्यक्ति की कलात्मकता कोई नवरंग जी से सीखे--


मेढकी को जुकाम आया है


आजकल मुद्दा ये गर्माया है


मछलियां कांपने लगी डर से


बाखुदा कैसा वक्त आया है


जांच से यह नतीजा निकला है


आग मेंढक ने ही लगाया है


वो पकड़ में नहीं आया अब तक


सारे षड्यंत्र का जो पाया है


 


नवरंग जी की हिंदकी संग्रह में सिर्फ हिंदी का नहीं बल्कि विविध आयातित भाषाओं(उर्दू,फारसी,तुर्की,अंग्रेजी--) का भी प्रयोग, बेशुमार हुआ है, मनुष्य की फ़ितरत को शेर में बांधते हुए नवरंग जी कहते हैं---


है हवा जिस तरफ उस तरफ फेस कर


जी रहे हैं सभी आत्मा बेचकर


गांव पहले जहां था वहीं रह गया


लोग आए गए रोटियां सेक कर


यह नया दौर है बच के रहना


यहां कोई रुकता नहीं चीखते देखकर



आज हर कोई जल्दी मुकाम पाने के लिए छटपटा रहा है, पर मानव मेहनत कम और जुगत ज्यादा बना रहा है, तभी तो नवरंग जी लिखते हैं---


पकने से पहले वो बिकना चाहता है


मीर गालिब जैसा दिखना चाहता है


इतनी जल्दी है शिखर छूने की उसको


कुछ भी पढ़ना कुछ भी लिखना चाहता है


नाचती है रात दिन आंखों में दौलत


सालों वो महफ़िल में टिकना चाहता है



समस्या, संस्कृति, संस्कार,गंभीर चिंतन,निर्माण,पुनर्निर्माण और तात्कालिक प्रसंगों के साथ-साथ नवरंग जी के ग़ज़ल संग्रह में प्रेम मोहब्बत की बानगी भी सहज नजर आते है---


चले आओ सुरों में गीत बनकर


लुभाऊंगा तुम्हें संगीत बनकर


करूंगा रात दिन पूजा तुम्हारी


रहूंगा उम्र भर मैं प्रीत बनकर


 समय रहते बसा लो धड़कनों में


जुदा होने न पाऊं रीत बनकर



उनकी बात निराली है


वह पूजा की थाली है


जब से उनके पांव पड़े


आंगन में हरियाली है


महक रहा है मन उपवन


फूलों वाली डाली है



जब तुम लेती हो अंगड़ाई


बजने लगती है शहनाई


मादकता में भर जाती है


आलिंगन करने पुरवाई


मंडराने लगते हैं भौरे


मौसम करता है अगवाई



मनुष्यों को मजहबी रंग में नही बल्कि मानवता के रंग में रंगकर भाई चारे की भावना रखनी चाहिये, इसी भाव में अपनी अन्तर्रात्मा के शब्दों को लेखनी में ढालते हुए नवरंग जी कहते हैं--


परिंदों को मैं हर दिन प्यार से पानी पिलाता हूं


जहां होती है पहुनाई मैं उस सुबे में आता जाता हूं


मनाता हूँ दिवाली ईद वैशाखी और क्रिसमस भी


सभी देवालयों के सामने मैं सिर झुकाता हूं


कहीं नवरंग होकर रह ना जाए एक ही दर का


उजाला दे जो हर चौखट पर वह दीपक जलाता हूं*्



                अनुभव के आकाश में तारों की तरह टिमटिमाते नवरंग जी के एक एक शब्द कही सुनी बातों को नही बल्कि, जी गयी जिंदगी की हकीकत को बयां कर रहे है। जीवन या जमाने का कोई भी पहलू अछूता नही है, पाठक पढ़कर सभी रंगों में रंग सकता है। बहु प्रचलित बहरों में गुथे, राग रंग का अद्भुत संग्रह है, गाँव के हो गए गजल संग्रह, जिसके शब्दों में शक्ति है- निर्माण की, अधंकार को चीरने की, गलत को रोकने टोकने की, बैर वैमनस्य दूर करने की, प्रेम भाव भरने की, सही राह प्रशस्त करने की। यही नवरंग साहब की ख़ासियत है। गांव के हो गए गजल संग्रह में, नवरंग जी की क़लम आत्मरंजन के लिए नही बल्कि सत्य, सामाजिक समरसता और प्रेम भाव स्थापित करने के लिए चली है। एक शब्द में कहूँ तो "गाँव के हो गए" ग़ज़ल संग्रह एक पुस्तक नही, आईना है।


विविध कलेवर के 208 गजलों को शब्द दे पाना या उसके एक एक शेर के बारे में कह पाना मुश्किल है, इसके लिये पाठक को स्वयं शब्दों के समुंदर में डूबना होगा। अतः आप सब जरूर पढ़ें, नवरंग जी की लाजवाब कृति--- गांव के हो गए।



जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)


मो.नं.99814 41795,



Friday, 27 February 2026

लाली फूल सेंम्हर के

 लाली फूल सेंम्हर के

.....................................

आगे बसंत;कुहके कोयली,

परसा,आमा मन भाय हे|

सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,

बइठे बर बलाय हे.............||


कॉटा   पेड़  भर   लटके   हे|

खाल्हे एकोठन नइ टपके हे||

हॉंसत  हे  के  रोवत  हे,

लाली  फूल  जँऊहर  घपटे हे ||

झर्राके  पाना फूल  ल,

पेड़ तरी सेज बनाय हे...........||

सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,

बइठे   बर   बलाय हे..............||


लाली फूले हे तभो कोनो नइ भावत हे|

फगुवा   पूर्वाइया  म  उहू  ह गावत  हे|

कोन अब खाके वोला मुंहु रचावत हे|

मनखे के मया ले सेंम्हर दुरिहावत हे|

बाढ़े हे डंगडंग ले,

छंइहाँ बर डारा-खांधा लमाय हे||

सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,

बइठे     बर   बलाय हे............||


तीर तखार म मनखे दिखे ल काहत हे|

एकेक ठन कॉंटा तनले झिंके ल काहत हे|

बसंत  म मंहु  मुचमुचाथो  फूल के,

कवि मन ल अपनो बारे में लिखे ल काहत हे|

एके घरी हाँसय एके घरी रोवय,

पाना गिराके फूले फूल म लदाय हे||

सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,

बइठे बर  बलाय हे..............||


            जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                   बाल्को(कोरबा)

काबर लालेच म खेलथस???

 

काबर लालेच म खेलथस???


अऊ तो रंग बहुत हे,

काबर लालेच म काबर खेलथस?

हॉसत खेलत जिनगी म,

काबर बारूद मेलथस?


पीके पानी फरी,

जुडा़ अपन नरी,

फेर काबर लहू पियत हस?

मनखे अस ता, मन म समा,

रक्सा कस का जियत हस?


हरिंयर रंग हरागे हे,

ललहूं होगे हे माटी।

थोरकन तो दया धरम देखा,

का पथरा के हे तोर छाती?

भरके बंदूक म  गोली,

निरदई कस ठेलथस......

अऊ तो रंग ............

.............खेलथस  ???


बंदूक गईंज चलायेस,

अब भाईचारा भँजा के देख !

मारे हस जेखर गोंसईंया,बेटा ल,

ओखरो घर जाके देख,!.

मनखे होके मनखे ल ,                                                                                                                                                                     खावत हस नोंच नोंच !

फिलगे हे अचरा आंसू म,

अब ताे दाई के आंसू पोंछ !

छेदा छेदा के बम बारूद म,

दाई के छाती चानी हाेगे हे !

तरिया ढोंड़गा नरवा के पानी,

ललहुं  बानी होगे हे  !

कोन देखाथे ऑखी तोला,

बता!! का बात ल पेलथस?

अऊ तो रंग................

.....................खेलथस ??


अलहन ऊपर अलहन होत हे।

जंगल तीर के गांव रोज रोत हे।

कल्हरत हे कुंदरा,

 आँसू ढारत हे महतारी।

कब जिवरा ले डर भागही,

 कब टरही गोला बारी।।

खून खराबा बने नोहे,

आखिर दरद तो तहूँ झेलथस।

अऊ तो रंग.....................

..........................खेलथस?


जंगल के जीव जीवलेवा हे,

फेर तोर जइसे नही,!

कहां लुकाबे बनवासी बन,

जब श्री राम आ जही!

छीत मया के रंग,

अऊ खेल रंग गुलाल ले,!

नाच पारा -पारा बाजे नंगाडा़!

निकल जंगल के जाल ले!

खेल खेल म का खेले तैं,

मनखे के जीव लेलेय तैं,

अति के अंत हब ले होही,

बात मोर मान ले!

लड़ना हे त देश बर लड़,

छाती फूलाके शान ले!

फूल-फूलवारी मितान बना,

आखिर काखर बात ल एल्हथस??

अऊ तो रंग.....................

.............................खेलथस????


जीतेन्र्द वर्मा

खैरझिटी(राजनांदगांव)

Monday, 23 February 2026

कुंडलियां-रिचार्ज के नाम मा लूट

 कुंडलियां-रिचार्ज के नाम मा लूट


सरकारी आदेश हे, बिसा एक ठन फोन।

बिक जा भले रिचार्ज बर, सुध लेवव अब कोन।।

सुध लेवव अब कोन, मिले हें नेता अफसर।

महँगा फोन रिचार्ज, रुवावत रहिथे अक्सर।।

फोन जाय के छोड़, आय के तक लाचारी।

नम्बर सब मा जोड़, हुकुम हावै सरकारी।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


जियो नाम रख मारथे, कहँव दुःख ला काय।

लूटमार के खेल हे, सेवा बनगे बाय।।

Sunday, 22 February 2026

हरिगीतिका छंद-परसा

 हरिगीतिका छंद-परसा


*परसा कहै अब मोर कर भौरा झुले तितली झुले।*

*तड़पे हवौं मैं साल भर तब लाल फुलवा हे फुले।*


*जब माँघ फागुन आय तब सबके अधर छाये रथौं।*

*बाकी समय बन बाग मा चुपचाप मिटकाये रथौं।*


*सजबे सँवरबे जब इहाँ तब लोग मन बढ़िया कथे।*

*मनखे कहँव या जीव कोनो सब मगन खुद मा रथे।*


*कवि के कलम मा छाय रहिथौं एक बेरा साल मा।*

*देथौं झरा सब फूल ला नाचत नँगाड़ा ताल मा।*


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Thursday, 12 February 2026

गीत-पतझड़

 गीत-पतझड़


आथे पतझड़ दे जाथे संदेश रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक।।


बनना हे बढ़िया ता, तज दे विकार ला।

अपन बूता खुद कर, झन देख चार ला।

आवत जावत रहिथे, सुख दुख के बेरा।

समय मा चलबे ता, कटथे घन घेरा।।

विधि विधना ला, माथा टेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक-----


राम अउ माया, संग मा नइ मिले।

सदा दिन बिरवा मा, फुलवा नइ खिले।

परसा सेम्हर, पात झर्रा मुस्काथे।

फागुन महीना, पुरवा संग गाथे।

पूरा पानी ला झन कभू छेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक-----


नाहे धोये मा नइ, अन्तस् धोवाये।

मन ला उजराये ते, ज्ञानी कहाये।

मन हावै निर्मल ता, जिनगी हे चोखा।

करबे देखावा ता, खुद खाबे धोखा।

देथे प्रकृति संदेशा नेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक----


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐


छबि छंद


छाये बहार, चहुँओर यार।

आहे बसंत, सुख हे अनंत।


गावै बयार, नद ताल धार।

फइले उजास,भागे हतास।


सरसो तियार,बाँटे पिंयार।

नाचे पलास,कर ले तलास।


कइथे कनेर,उठ छोड़ ढेर।

बोइर बुलाय,आमा झुलाय।


जिवरा ललाय,अमली जलाय।

मुँह ला फुलाय,लइका रिसाय।


बन बाग मात,दिन मान रात।

होके मतंग,छीचे ग रंग।।


माँदर बजाय,होली जलाय।

सबला सुहाय,शुभ मास आय।


बाजे धमाल,होवय बवाल।

गा फाग गीत,ले बाँट प्रीत।


रचगे कपाल,हे गाल लाल।

फगुवा लुभाय,कनिहा झुलाय।


हे मीठ तान,मधुरस समान।

जब जब सुनाय,आलस चुनाय।


खैरझिटिया

💐💐💐💐💐💐💐💐💐


गोपी छंद- बसंत ऋतु


बसंती गीत पवन गाये।

बाग घर बन बड़ मन भाये।

कोयली आमा मा कुँहके।

फूल के रस तितली चुँहके।


करे भिनभिन भौरा करिया।

कलेचुप हे नदिया तरिया।।

घाम अरझे  अमरइया मा।

भरे गाना पुरवइया मा।।


पपीहा शोर मचावत हे।

कोयली गीत सुनावत हे।

मगन मन मैना हा गावै।

परेवा पड़की मन भावै।।


फरे हे बोइर लटलट ले।

आम हे मउरे मटमट ले।

गिराये बर पीपर पाना।

फूल परसा मारे ताना।।


फुले धनिया सादा सादा।

टमाटर लाल दिखे जादा।

लाल भाजी पालक मेथी।

घुमा देवय सबके चेथी।


मसुर अरहर मुसमुस हाँसे।

बाग बन खेत जिया फाँसे।

चना गेहूँ अरसी सरसो।

याद आवै बरसो बरसो।


सरग कस लागत हे डोली।

कहे तीतुर गुरतुर बोली।

फूल लाली हे सेम्हर के।

बलावै बिरवा डूमर के।।


बबा सँग नाचत हे नाती।

खुशी के आये हे पाती।

नँगाड़ा झाँझ मँजीरा धर।

फाग ले जावै पीरा हर।।


सुनावै हो हल्ला भारी।

मगन मन झूमै नर नारी।

प्रकृति सज धज के हे ठाढ़े।

मया मनखे मा हे बाढ़े।।


मटक के रेंगें मुटियारी।

पार खोपा पाटी भारी।

नयन मा काजर ला आँजे।

मया ममता खरही गाँजे।।


राग फगुवा के रस घोरे।

चले सखि मन बँइहा जोरे।

दबाये बाखा मा गगरी।

नहाये खोरे बर सगरी।


पंच मन बइठे बर खाल्हे।

मगन गावै कर्मा साल्हे।

ढुलावय मिलजुल के पासा।

धरे अन्तस् मा सुख आसा।।


हदर के खावत हे टूरा।

चाँट अँगरी थारी पूरा।।

चुरे हे सेमी अउ गोभी।

पेट तन जावै बन लोभी।


टमाटर चटनी नइ बाँचे।

मटर गाजर मूली नाँचे।

पपीता पिंवरा पिंवरा हे।

ललावत सबके जिवरा हे।।


हाट हटरी मड़ई मेला।

जिंहा होवय पेलिक पेला।

ढेलुवा सरकस अउ खाजी।

मजा लेवय दादी आजी।।


जनावत नइहे जड़काला।

प्रकृति लागत हावै लाला।

खुशी सुख मन भर बाँटत हे।

मया के डोरी  आँटत हे।


सबे ऋतुवन के ये राजा।

बजावै आ सुख के बाजा।

खुशी हबरे चोरो कोती।

बरे  नित दया मया जोती।


खैरझिटिया

कुवाँ के आंसू

 कुवाँ के आंसू


कुवाँ के घिर्री म,

अब बाल्टी नइ झूले|

पार मा ऑवर-भॉवर,

भँसकटिया नइ फूले |


टेंड़ा पाटी टूट के सरगे हे|

कोला-बारी परिया परगे हे |

तरी ले ऊप्पर तक,

मेकरा के जाला बनगे हे|

गोड़ेला,पुचपुची,सल्हई के,

चारो मुड़ा झाला बनगे हे|


जागे हे बोईर-बंम्भरी,

कुवाँ के पार म |

खोजे म बिरले मिलथे,

कुवाँ खेत-खार म |


मनखे ल नल अउ बोरिंग मिलगे|

कुवाँ ल भीतरे-भीतर पाताल लिलगे|

कनकी कोदई धोवत नइ दिखे दादी नानी|

अब लगर नहाये नही कोनो राजा रानी |


नवा जमाना ह करे हे,

ओखर हिरदे के चानी|

कुवाँ के ऑसू ए,

 थोर बहुत भराय पानी|


                जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                         बाल्को(कोरबा)

सुरता:- रेडियो के वो सोनहा बेरा


 सुरता:- रेडियो के वो सोनहा बेरा


                                सुरता आथे वो बेरा के, जब गाँव के घर,गली,खोर,कोठार, कोला, ब्यारा, बारी  रेडियो के गूँज मा गुंजायमान रहय। तन संग मन घलो रेडियो के गीत संगीत मा बिधुन  होके नाँचे। रेडियो के उहू सोनहा बेरा ला देखे हन जब, घर मा रेडियो नइ राहय ता संगी संगवारी या पारा परोसी घर के चौरा मा बइठ के संझा, बिहना अउ मंझनिया के कतकोन कार्यक्रम के आनंद लेवन। रेडियो ऐसे मनोरंजन के साधन रिहिस जे भले एक घर बजे फेर सुनात भर ले पारा परोसी सबके मनोरंजन करे। एक जमाना मा घरों घर रेडियो घर के कोठ मा अरवाय रहय। आकाशवाणी अउ आंचलिक स्टेशन ले हिंदी, अंग्रेजी अउ छत्तीसगढ़ी मा कतकोन कार्यक्रम आय। हिंदी छत्तीसगढ़ी गीत संगीत, खेती किसानी/ज्ञान विज्ञान/ परब तिहार, संस्कृति-संस्कार के गोठ, रोजगार के अवसर,खेल, समाचार, युवा/ नारी/ लइका अउ सियान मन के कार्यक्रम, नाटक,कहानी,कविता, रूपक,भाव,भजन,खेल कमेंट्री, ------- का का नइ सुनन रेडियों मा। ऐसे नही कि ये सब अब रेडियो मा नइ आय। आजो बरोबर अइसन कतको कार्यक्रम रेडियो मा आथे फेर नवा जमाना के नवा शोरगुल मा दबगे हे। नवा जमाना के नवा नवा ढेंचरा जुन्ना दौर के सोनहा सुरता ऊपर कुंडली मार के बइठ गय हे। रेडियो सुनत सुनत घर के बुता काम अउ बेरा कब बुलके पता नइ लगत रिहिस। सुरता आथे कुनकुन कुनकुन जाड़ के बेरा मा बजत रेडियो अउ बबा के फाँदे दौरी/बेलन। धान कोदो कब मिंजा जाय पता तको नइ चले। जाड़ घरी  कोठार बियारा मा काम कमई के बेरा मा, कमइयां मन बर रेडियो ताकती बरोबर काम करे। घर बनइया मिस्त्री, दर्जी, कुम्हार, लोहार, हजामत बनइया होय या एक जघा बइठ के सिधोय वाले अउ कतकोन काम, रेडियो सबके तीर रहय। पहली रेडियो सेल ले चले,ताहन बिजली ले अउ अब तो मोबाइल मा ही aap के माध्यम ले कतको चैनल संघरा मिल जावत हे, बस छुए करे भर के देरी हे, तभो मनखे मन के रुझान जादा नइ दिखे। चाहे लोकगीत संगीत होय या फिल्मी गीत संगीत/ गजल/ सुगम संगीत-------खांटी रेडियो सुनइया मन ला मुँहअखरा गीत, गीतकार, फिल्म, संगीतकार आदि के नाँव सुरता रहय। आजो जेन रेडियो के वो सोनहा बेरा ला जिये होही, वोखर जेहन मा रेड़ियो के मनभावन रिंगटोन अउ जुन्ना गीत संगीत अंतस जे कोनो कोंटा मा समाय होही। जेन स्टेशन के कार्यक्रम ला सुनना हे, वो स्टेशन के नम्बर मिलाय के अलगे आनन्द रहय। 

                     मनोरंजन, ज्ञान विज्ञान के संगे संग रेडियो घर बइठे राज भर मा संगवारी बना देवय। सुन के अटपटा लगत हे न, फेर ये सच हे। रेडियो मा लगभग सबे कार्यक्रम मा स्रोता मन के चिट्टी पाती आय। कतको नियमित स्रोता मन बरोबर चिट्टी भेजे, उंखर नाम गांव रेडियो के उद्घोषक संग अन्य स्रोता मन ला तको रटा जावत रिहिस।  कोनो गांव मा घुमत घामत जाय बर मिल जाय ता, नाम बताके पूछे मा वो स्रोता मिल घलो जात रिहिस। रेडियो  मोरो कतको झन संगवारी बनाइस, चाहे नवागढ़ मा होय, बालोद मा होय या बरदा लवन मा--- ------। कई बेर तो इही रेडियो संगवारी मन के सेती रद्दा बाट मा आय कोई अड़चन  सहज टर घलो जाय। महुँ रेडियो मा बरोबर चिट्टी लिखँव, उद्घोषक के मुख ले अपन नाँव सुनत अन्तस् अघा जावत रिहिस। उद्घोषक संग सबे स्रोता मन के मन ला आपस मा जोड़ के रखे रेडियो हा। स्रोता मन के सुझाव,शोर खबर, फरमाइस अउ  कतको कार्यक्रम रेडियो के चिट्ठी पाती कार्यक्रम मा आय, जे बड़ मनभावन लगे।

                       रेडियो के चढ़े दीवानगी राजभर मा चारो कोती दिखे। घर- दुवार, गली-खोर संग चाहे होटल ढाबा होय या खेत खार, नदी-ताल या फेर ठेला-मेला। कोई खीसा मा छोटे रेडियो धरके चले ता कोई  बड़े रेडियो ला छोड़े घलो नही। रेडियो सुनत मन मा आय कि रेडियो के वक्ता/कवि/कलाकार/ गायक आदि मन कतिक भागमानी होही जेन ला सरी जमाना शान ले सुनथे। मोर ननपन आकाशवाणी रायपुर के संग बीते हे। रामचरित मानस के दोहा- चौपाई, चौपाल, बालवाटिका, युगवाणी, घर आंगन, मोर भुइँया, गाँव गुड़ी, ग्राम सभा, फोन इन फरमाइस------ अउ कतको कार्यक्रम के रिंग टोन आजो अन्तस् मा गुंजत रथे। रेडियो मा सुने  छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी गीत मन कभू नइ भुलाये, न वो गीत के गीतकार, संगीतकार अउ गायक मन के नाम। मनोरंजन के जब कमती साधन रिहिस ता आकाशवाणी, दूरदर्शन, खेल मदारी, सर्कस----- आदि कतकोन चीज पूरा तन अउ मन ला रच के रंजित करे, आनन्दित करे। फेर जइसे जइसे मनोरंजन के साधन बढ़त गिस, मनोरंजन मन ल छोड़ सिर्फ नयन तक सिमट गिस। नवा जमाना के नवा चोचला मा अरझ रेडियो ले कइसे दुरिहाएंव मोला खुदे पता नइ चलिस?

                          मैं रेडियो मा आय के कभू सोचे घलो नइ रेहेंव, फेर जब तीन चार साल पहली आकाशवाणी बिलासपुर मा मोर कविता रिकार्डिंग होइस तब खुशी के ठिकाना नइ रिहिस। आज  सात आठ पँइत आकाशवाणी बिलासपुर अउ रायपुर  मा कविता/गीत/कहानी पढ़त गावत होगे। नियमित स्रोता के रूप मा खुद ला, आज नइ पाके आत्मग्लानि होथे। मोर ये हाल हे, ता आने ला का कहँव? तभो विश्वास हे जब दर्शन के चीज ले दिल भर जही ता एक घांव फेर श्रवण के वो सुनहरा दौर जरूर आही। भले नवा रूप मा ही सही। जइसे भाजी कोदई, काँदा कूसा, खोंधरा-झोपड़ी,पंगत, धोती कुर्ता कस कतको जुन्ना चीज नवा रूप मा मनखें मन के बीच आवत हे। अपन रंग रूप बदल, धीरे धीरे सबे बने चीज एक घांव अउ लहुटही, आखिर धरती गोल जे हे।

                          विश्व रेडियो दिवस के आप जमो ला सादर बधाई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Saturday, 24 January 2026

सोसल मीडिया अउ साहित्य लेखन-जीतेन्द्र वर्मा

 सोसल मीडिया अउ साहित्य लेखन-जीतेन्द्र वर्मा


       आज माँदी भात के कोनो पुछारी नइहे, मनखे बफे सिस्टम कोती भागत हे। जिहाँ के साज-सज्जा अउ आनी बानी के मेवा मिष्ठान, खान पान के भारी चरचा घलो चलथे। भले मनखे कहि देथे, कि पंगत म बैठ के खवई म ही आदमी मनके मन ह अघाथे, फेर आखिर म उहू बफे कोती खींचा जथे। मनखे के मन ला कोन देखे हे, आज तन के पहिरे कपड़ा मन के मैल ल तोप देथे। आज कोट अउ सूटबूट के जमाना हे, ओखरे पुछारी घलो हे ,चिरहा फटहा(उज्जर मन) ल कोन पूछत हे। अइसने बफे सिस्टम आय साहित्य अउ साहित्यकार बर सोसल मीडिया। भले अंतस झन अघाय पर पेट तो भरत हे, भले खर्चा होवत हे, पर चर्चा घलो तो होवत हे। कलम कॉपी माँदी बरोबर मिटकाय पड़े हे। 


         सोसल मीडिया के आय ले अउ छाय ले ही पता लगिस कि फलाना घलो कवि, लेखक ए। जुन्ना जमाना के कतको लेखक जे पाठ, पुस्तक, मंच अउ प्रपंच ले दुरिहा सिरिफ साहित्य सेवा करिस, ओला आज कतकोन मन नइ जाने। अउ उँखर लिखे एको पन्ना घलो नइ मिले। फेर ये नवा जमाना म सोसल मीडिया के फइले जाला जमे जमाना ल छिन भर म जनवा देवत हे कि फलाना घलो साहित्यकार ए, अउ ए ओखर रचना। सोसल मीडिया ,साहित्य कार के जरूरत ल चुटकी बजावत पूरा कर देवत हे, कोनो विषय , वस्तु के जानकारी झट ले दे देवत हे, जेखर ले साहित्यकार मन ल कुछु भी चीज लिखे अउ पढ़े  म कोनो दिक्कत नइ होवत हे। पहली  प्रकृति के सुकुमार कवि पंत के रचना ल पढ़ना रहय त पुस्तक घर या फेर पुस्तक खरीद के पढ़े बर लगे, फेर आज तो पंत लिखत देरी हे, ताहन पंत जी के जम्मो गीत कविता आँखी के आघू म दिख जथे। 


             सोसल मीडिया ल बउरना घलो सहज हे, *न कॉपी न पेन-लिख जेन लिखना हे तेन।* शुरू शुरू म थोरिक लिखे पढ़े म अटपटा लगथे ताहन बाद म आदत बनिस, ताहन छूटे घलो नही। सोसल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ साहित्यकार मन भर बर नही,सब बर उपयोगी हे। गूगल देवता बड़ ज्ञानी हे, उँखर कृपा सब उपर बरसत रइथे, बसरते माँग अउ उपयोग के माध्यम सही होय। आज साहित्यकार मन अपन रचना ल कोनो भी कर भेज सकत हे, अपन रचना ल कोनो ल भी देखाके सुधार कर सकत हे। पेपर  अउ पुस्तक म छपाय के काम घलो ये माध्यम ले सहज, सरल अउ जल्दी हो जावत हे। आय जाय के झंझट घलो नइहे। सोसल मीडिया म कोनो भी चीज जतेक जल्दी चढ़थे ,ओतके जल्दी उतरथे घलो, येखर कारण हे मनखे मनके बाहरी लगाव, अन्तस् ल आनंद देय म सोसल मीडिया आजो असफल हे। कोरोनच काल म देख ले रंग रंग के मनखे जोड़े के उदिम आइस, आखिर म सब ठंडा होगे। चाहे कविता बर मंच होय या फेर मेल मिलाप, चिट्ठी पाती अउ बातचीत के मीडिया समूह। पहली कोनो भी सम्मान पत्र के भारी मान अउ माँग रहय फेर ये कोरोना काल के दौरान अइसे लगिस कि सम्मान पत्र फोकटे आय। कोनो भी चीज के अति अंत के कारण बनथे, इही होवत घलो हे सोसल मीडिया म। सोसल मीडिया म सबे मनखे पात्र भर नही बल्कि सुपात्र हे, तभे तो कुछु होय ताहन ,जान दे तारीफ। *वाह, गजब, उम्दा, बेहतरीन जइसे कतको शब्द म सोसल मीडिया के तकिया कलाम बन गेहे।* सब ल अपन बड़ाई भाथे, आलोचना आज कोनो ल नइ रास आवत हे। मनखे घलो दुरिहा म रहिगे कखरो का कमी निकाले, तेखर ले अच्छा वाह, आह कर देवत हे। सात समुंद पार बधाई जावत हे, हैपी बर्थ डे, हैपी न्यू इयर,  हैपी फादर्स डे,हैपी फलाना डे। फेर उही हैपी फादर्स डे या मदर डे लिखइया मन ददा दाई ल मिल के बधाई , पायलागि नइ कर पावत हे, सिर्फ सोसल मीडिया म दाई, ददा, बाई, भाई, संगी साथी के मया दिखथे, फेर असल म दुरिहाय हे। अइसे घलो नइहे कि सबेच मन इही ढर्रा म चलत हे, कई मन असल म घलो अपनाय हे।


       सोसल मीडिया हाथी के खाय के दाँत नइ होके दिखाय के दाँत होगे हे। जम्मो छोटे बड़े मनखे येमा बरोबर रमे हे। सोसल मीडिया साहित्यकार मन बर वरदान साबित होइस। लिख दे, गा दे अउ फेसबुक वाट्सअप म चिपका दे। नाम, दाम ल घलो सोसल मीडिया तय कर देवत हे। सोसल मीडिया म जतका लिखे जावत हे, ओतका पढ़े नइ जावत हे, ते साहित्य जगत बर बने नइहे। ज्ञान ही जुबान बनथे, बिन ज्ञान के बोलना या लिखना जादा  प्रभावी नइ रहे। सोसल मीडिया के उपयोग ल साहित्यकार मन नइ करत हे, बल्कि सोसल मीडिया के उपयोग साहित्यकार मन खुद ल साबित करे बर करत हे, खुद ल देखाय बर करत हे। कुछु भी पठो के वाहवाही पाय के चाह बाढ़ गेहे। कुछु मन तो कॉपी पेस्ट म घलो मगन हे, बस पठोये विषय वस्तु ल इती उती बगराये म लगे हे, वो भी बिन पढ़े। कॉपी पेस्ट म सही रचनाकार के नाम ल घलो कई झन मेटा देवत हे। सोसल मीडिया सहज, सरल, कम लागत अउ त्वरित काम करइया प्लेटफार्म आय, जे साहित्य, समाज, ज्ञान ,विज्ञान के साथ साथ  दुर्लभ जइसे शब्द ल भी हटा देहे। येखर भरपूर सकारात्मक  उपयोग करना चाही। छंद के छ परिवार सोसल मीडिया के बदौलत 300 ले जादा, प्रदेश भर के साधक मन ल संघेरके 50, 60 ले जादा प्रकार के छंद आजो सिखावत हे। 2016 ले  छंदपरिवार सरलग  छत्तीसगढ़ी साहित्य के मानक रूप म  काम  करत हे। इसने लोकाक्षर, गद्य खजाना,आरुग चौरा, हमर गँवई गाँव अउ कई ठन समूह घलो हे जे येखर सकारात्मक उपयोग करत हे। सोसल मीडिया दिखावा के साधन मात्र झन बने।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा

अमीर ए ना--

 अमीर ए ना--


इज्जत गँवाके वो इज्जत वाला हे, अमीर ए ना।

कोन का कहे सबके मुँह मा ताला हे, अमीर ए ना।


बने करइया मन बन बन भटकत रहिथे रात दिन।

पाये आसन काम जेखर काला हे, अमीर ए ना।।


भगत के पथरा मा पात पानी घलो नइ चढ़त हे।

ओखर देवाला मा भगवान बाला हे, अमीर ए ना।


रोज चढ़थे रोज उतरथे कई किसम के नकाब।

उँहचे मरहम, उँहचे बरछी भाला हे, अमीर ए ना।


पानी मिला पी जथे खून,मनखे होय के गुण हे शून।

गिनाये बर धन दोगानी महल माला हे, अमीर ए ना।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

देस बर जीबो , देस बर मरबों

 देस   बर   जीबो , देस  बर  मरबों

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चल माटी के काया ल,हीरा करबों।

देस   बर  जीबो, देस   बर  मरबों।

सिंगार करबों,सोन चिरँइया के।

गुन ल गाबोंन,भारत मइया  के।

सुवारथ के  सुरता ले, दुरिहाके।

धुर्रा चुपर के माथा म,भुँइया के।

घपटे अँधियारी भगाय बर,भभका धरबों।

देस    बर      जीबो, देस    बर     मरबों।


उँच    -  नीच    ल, पाटबोन।

रखवार बन देस ल,राखबोन।

हवा   म      मया ,  घोरबोन।

हिरदे ल हिरदे  ले, जोड़बोन।

चल  दुख - पीरा  ल, मिल  के  हरबों।

देस   बर   जीबों,   देस    बर  मरबों।


मोला गरब - गुमान हे,

ए   भुँइया   ल  पाके।

खड़े   रहूं   मेड़ो   म ,

जबर छाती फइलाके।

फोड़ दुहूँ वो आँखी ल,

जे मोर माटी बर गड़ही।

लड़हूँ  -  मरहूँ  देस बर ,

तभे काया के करजा उतरही।

तँउरबों बुड़ती समुंद म,उग्ति पहाड़

चढ़बों।

चल   देस    बर   जीबो,   देस   बर  

मरबों।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को (कोरबा) 

09981441795

गणतंत्रता दिवस की ढेरों बधाइयाँ

Thursday, 22 January 2026

चल बइठबों बसंत म,पीपर तरी।

 बसंत

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चल बइठबों बसंत म,पीपर तरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी  -  घरी।


मोहे   मन   मोर   मउरे,मउर आमा के।

मधूबन कस लागे,मोला ठउर आमा के।

कोयली   कुहके  ,कूह - कूह   डार  म।

रंग-रंग के फूले हे,परसा-मउहा खार म।

बोइर-बर-बंम्भरी बर,बरदान बने बसंत।

सबो   रितुवन  म , महान  बने   बसंत।

मुड़ नवाये डोले पाना,तरी-तरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी  - घरी।


डोलत हे  जिवरा देख,सरसो  फूल  पिंवरा।

फूल - फर  धरे नाचे ,  राहेर, मसूर, तिवरा।

घमघम  ले   फूले  हे,  अरसी       मसरंगी।

हंरियर गंहूँ-चना बीच,बजाय धनिया सरँगी।

सुहाये  खेत -खार , तरिया - नंदिया कछार।

नाचे  सइगोन-सरई  डार, तेंदु-चिरौंजी-चार।

सुघरई बरनत पिरागे,नरी-नरी।

पूर्वा   गाये   गाना , घरी -घरी।


गोभी-सेमी-बंगाला,निकलत हे बारी म।

रोजेच साग चूरत हे, सबो  के हाँड़ी म।

छेंके  रद्दा रेंगइया ल, हवा अउ बंरोड़ा।

धरे नंगाडा पारा म , फगुवा डारे डोरा।

गाँव लहुटे सहर,अब दुरिहात हे बसंत।

जुन्ना पाना-पतउवा ल,झर्रात हे बसंत।

नवा - नवा  प्रकृति  ल,बनात हे बसंत।

खुदे  रोके;मनखे   बर, गात  हे बसंत।

कर्मा-ददरिया-सुवा,तरी-हरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी-घरी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795

गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)

 गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।

बिन अमुवा का करे कोयली, कांता हा बिन कंत।।


बिन फुलवा के हावय सुन्ना, मोर जिया के बाग।

आसा के तितली ना भौरा, ना सुवना के राग।।

हे बहार नइ पतझड़ हे बस, अउ हे दुःख अनंत।

आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।


सनन सनन बोलय पुरवइया, तन मन लेवय जीत।

आय पिया हा हाँसत गावत, धर फागुन के गीत।।

मरत हवौं मैं माँघ मास मा, पठो संदेश तुरंत।

आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।


देख दिखावा के दुनिया हा, बैरी होगे मोर।

छीन डरिस सुख चैन पिया के, काट मया के डोर।

पुरवा पानी पियत बने ना, आगे बेरा अंत।

आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


अब तो बस अंत नजर आथे, कहाँ अब बसंत नजर आथे।।

माँ सरस्वती पूजा अउ बसंत पंचमी के सादर बधाई

 माँ सरस्वती पूजा अउ बसंत पंचमी के सादर बधाई


वर दे माँ शारदे (सरसी छन्द)


दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।

गुण गियान यश धन बल बाढ़ै,बाढ़ै झन अभिमान।


तोर कृपा नित होवत राहय, होय कलम अउ धार।

बने बात ला पढ़ लिख के मैं, बढ़ा सकौं संस्कार।

मरहम बने कलम हा मोरे, बने कभू झन बान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जेन बुराई ला लिख देवँव, ते हो जावय दूर।

नाम निशान रहे झन दुख के, सुख छाये भरपूर।

आशा अउ विस्वास जगावँव, छेड़ँव गुरतुर तान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


मोर लेखनी मया बढ़ावै, पीरा के गल रेत।

झगड़ा झंझट अधम करइया, पढ़के होय सचेत।

कलम चले निर्माण करे बर, लाये नवा बिहान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


अपन लेखनी के दम मा मैं, जोड़ सकौं संसार।

इरखा द्वेष दरद दुरिहाके, टार सकौं अँधियार।

जिया लमाके पढ़ै सबो झन, सुनै लगाके कान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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सुभगति छंद-शारद मां


दे ज्ञान माँ।वरदान माँ।

भव तारदे।माँ शारदे।


आनन्द दे।सुर छंद दे।

गुण ज्ञान दे।सम्मान दे।


सुख गीत दे।सत मीत दे।

सुरतान दे।अरमान दे।


दुख क्लेश ला।लत द्वेश ला।

दुरिहा भगा।सतगुण जगा।।


जोती जला।दे गुण कला।

माथा नवा।माँगौ दवा।


चढ़ हंस मा।सुभ अंस मा।

आ द्वार मा।भुज चार मा।


दुरिहा बला।अवगुण जला।

बिगड़ी बना।सतगुण जना।


वीणा सुना।मैं हँव उना।

पैंया परौं।अरजी करौं।


सद रीत दे।अउ जीत दे।

सत वार दे।माँ शारदे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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दोहा गीत- माँ शारदे


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।

तोर शरण मा आय हौं, आरो लेबे मोर।।


तैं जननी सुर साज के, तिही ज्ञान आधार।

तोर कृपा के सध जथे, भव बाधा संसार।।

रखबे मोला बाँध के, अँचरा के माँ कोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


नइ चाही माँ धन रतन, नइ चाही रँग रूप।

मन भीतर अज्ञान के, रहय न एको कूप।

वीणा के झंकार मा, गुँजै गली घर खोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


झरत रहय माँ बोल मा, सबदिन सुर संगीत।

प्रेम देख मैं हार जँव, अहंकार लौं जीत।

दै सुकून नित सांझ हा, आस जगावै भोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


जय माँ शारदे, बसन्त पंचमी की सादर बधाइयाँ


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दोहा


पिंयर पिंयर सरसो फुले,देखत मन हर्षाय।

सनन सनन पुरवा चले,सरग पार नइ पाय।


खैरझिटिया

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रितु बसंत(रोला छंद)


गावय  गीत बसंत,हवा मा नाचे डारा।

फगुवा राग सुनाय,मगन हे पारा पारा।

करे  पपीहा  शोर,कोयली  कुहकी पारे।

रितु बसंत जब आय,मया के दीया बारे।


बखरी  बारी   ओढ़,खड़े  हे  लुगरा  हरियर।

नँदिया नरवा नीर,दिखत हे फरियर फरियर।

बिहना जाड़ जनाय,बियापे  मँझनी बेरा।

अमली बोइर  आम,तीर लइकन के डेरा।


रंग  रंग  के साग,कढ़ाई  मा ममहाये।

दार भात हे तात,बने उपरहा खवाये।

धनिया  मिरी पताल,नून बासी मिल जाये।

खावय अँगरी चाँट,जिया जाँ घलो अघाये।


हाँस हाँस के खेल,लोग लइका मन खेले।

मटर  चिरौंजी  चार,टोर  के मनभर झेले।

आमा  अमली  डार, बाँध  के  झूला  झूलय।

किसम किसम के फूल,बाग बारी मा फूलय।


धनिया चना मसूर,देख के मन भर जावय।

खन खन करे रहेर,हवा सँग नाचय गावय।

हवे  उतेरा  खार, लाखड़ी  सरसो अरसी।

घाम घरी बर देख,बने कुम्हरा घर करसी।


मुसुर मुसुर मुस्काय,लाल परसा हा फुलके।

सेम्हर हाथ हलाय,मगन हो मन भर झुलके।

पीयँर  पीयँर   पात,झरे  पुरवा जब आये।

मगन जिया हो जाय,गीत पंछी जब गाये।


माँघ पंचमी होय,शारदा माँ के पूजा।

कहाँ पार पा पाय,महीना कोई दूजा।

ढोल नँगाड़ा झाँझ,आज ले बाजन लागे।

आगे  मास बसन्त,सबे कोती सुख छागे।


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छ्ग)


        💐💐💐💐

उही आम आदमी ए।

 उही आम आदमी ए।


करजा लेके मूड़ नवाय हे, उही आम आदमी ए।

थारी चाँट खाना खाय हे, उही आम आदमी ए।।


ना बन सकिस इती के, ना बन सकिस उती के।

बड़े छोट बीच बोजाय हे, उही आम आदमी ए।।


छोट मोट नवकरी धर, नित नवके चलत हे।

सबके नजर मा आय हे, उही आम आदमी ए।


नियम कानून मानथे, मानथे मान मर्यादा।

बात बात मा घबराय हे,उही आम आदमी ए।


देश वेश रीत नीत, सब हावय इंखरेच थेथा।

धन कमाय हे ना गँवाय हे,उही आम आदमी ए।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कविता ला।

 विश्व कविता दिवस के सादर बधाई


विश्व कविता दिवस म


अन्तस् मा आगी होथे, ता कविता नइ लिखाय।

 मन कहूँ बागी होथे, ता कविता नइ लिखाय।

चाल चरित दागी होथे, ता कविता नइ लिखाय।

काया पाप के भागी होथे, ता कविता नइ लिखाय।

बोचकहा कहूँ पागी, ता कविता नइ लिखाय।


ता कब लिखाथे-

संग मा संगी मीत होथे, ता कविता लिखाथे।

जिनगी मा जय जीत होथे,ता कविता लिखाथे।

मन मा मया प्रीत होथे, ता कविता लिखाथे।

जीये के बने रीत नीत होथे,ता कविता लिखाथे।

अन्तस् मा जब गीत होथे, ता कविता लिखाथे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया


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कविता ला।


तुरते ताही कागज मा झन छपन दे कविता ला।

अंतस के आगी मा थोरिक तपन दे कविता ला।


सागर मंथन कस मन ला मथ,निकाल अमरित।

कउड़ी के दाम कभू,  झन नपन दे कविता ला।


बइठ गेहे मन मार के, थक हार के यदि कोई।

भरे उन मा जोश जज्बा ता, अपन दे कविता ला।


कवि करम मा तोर मोर के, चिट्को जघा नइहे।

पर हित खातिर सबदिन, खपन दे कविता ला।


बने गिनहा के फैसला पढ़इया मन करहीं खैरझिटिया।

ओन्हा चेन्द्रा कस चिरा चिरा के, कपन दे कविता ला।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

नियत बचाके रख रे मनखे- तातंक छन्द

 नियत बचाके रख रे मनखे- तातंक छन्द


नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।

लूट मचा झन बनगे लोभी, सिरा जही जिनगानी हा।


कब्जा झन पर्वत नदिया बन, झन खा पेड़उ पाती ला।

खनिज लवण जल झन निकाल बड़, छेद धरा के छाती ला।।

सता प्रकृति ला अब झन जादा, के दिन रही जवानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


चरै तोर बइला विकास के, सुख के धनहा डोली ला।

तोरे बइला तुहिंला पटके, गुनय सुनय ना बोली ला।।

हवै भोंगरा छत अउ छानी, आगी लगे फुटानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


माटी मा गारा मिलगे हे, महुरा पुरवा पानी मा।

साँस लेय बर जुगत जमाथस, अब का हे जिनगानी मा।

काली बर बस काल बचे हे, सरगे तोर सियानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


पेड़ लगावत फोटू ढिलथस, कभू बाँचतस नारा तैं।

सात जनम के ख्वाब देखथस, बइठे रटहा डारा तैं।

चाँद सितारा के सुध लेथस, तड़पय धरती रानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

पिकनिक-कुंडलियाँ

 पिकनिक-कुंडलियाँ


झाड़ी बन नदिया मता, पिकनिक मनुष मनाँय।

मछरी कुकरी बोकरा, आनी बानी खाँय।।

आनी बानी खाँय, मनुष मन जंगल जाके।

नाचे कूदे खूब, सगा संगी जुरियाके।।

हो हल्ला बड़ होय, उड़ावै धुँगिया गाड़ी।

बानर भालू रोय, रोय नदिया बन झाड़ी।


जंगल मा चारों मुड़ा, होवत हवय गोहार।

प्लास्टिक सँग मा काँच के, कचरा हे भरमार।

कचरा हे भरमार, सिसी पतरी दोना के।

मनखें मन बगराय, बीच जंगल मा जाके।

करैं रोज वनभोज, लगे नइ शनि रवि मंगल।

खा पी बड़ इतरायँ, पहुँच मनखें मन जंगल।।


पग मनखें माढ़िस तिहाँ, होवत गिस ऊजाड़।

लाहो लेवत हें गजब, मनखें मन हा ठाड़।।

मनखें मन हा ठाड़, कुदत हें बन मा जाके।

देख मनुष मतवार, सपटगे बाघ डराके।।

संगी पेड़ पहाड़, कहैं मनखें मन बन ठग।

उजड़त गिस बन बाग, पड़िस जब जब मनखें पग।


पिकनिक जाए के गजब, चुलुक चढ़े हे आज।

नदी पहाड़ मतात हें, आवत नइहें लाज।।

आवत नइहें लाज, मनुष मन ला एको कन।

डीजे हवें बजात, हाट बनगे हे कानन।।

नदी पहाड़ समुंद, सबे होवत हावय खिक।

घाम लगे ना जाड़, मनावैं मनखें पिकनिक।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

पाके पाके बिही

 जाम बिही तक खाय बर, सोचें पड़थे आज।

जर बुखार जुड़ हो जथे, बोलत आथे लाज।

खैरझिटिया

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पाके पाके बिही


पाके पाके बिही।

सोचत होहू दिही।

गय फोकट के जमाना,

कोनो पैसा मा लिही??

पाके पाके बिही-----1


चाँट चउमिन खाहू।

त चाँट के जाहू।।

फल फुलवारी खाही,

तिही हा जिही।।

पाके पाके बिही------2


पइधथे बेंदरा।

ता पर जथे चेंद्रा।

मनखे पइधही,

ता कोन बने किही?

पाके पाके बिही------3


लटलट ले फरे देख।

पारा परोसी जरे देख।।

दर्जन भर एके घांव,

झडक देथों मिही।

पाके पाके बिही--------4


कतको नइ खा सके।

कतको नइ पा सके।।

नवा जुग लील दिस,

बखरी बगीचा डिही।

पाके पाके बिही--------5


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

सर्दी दिसम्बर के-लावणी छंद

 सर्दी दिसम्बर के-लावणी छंद


हाड़ा गोंडा काँप जात हे, सर्दी देख दिसम्बर के।।

धरती के हालत खस्ता हे, खस्ता हालत अम्बर के।।


किनकिन किनकिन जाड़ करत हे, कुड़कुड़ाय हे चोला हा।

सुरुज नरायण बिजरावत हे, नइ भावै घर कोला हा।।

धुंध कोहरा मा का करही, चश्मा कोनो नम्बर के।

हाड़ा गोंडा काँप जात हे, सर्दी देख दिसम्बर के।।


बइला भँइसा कुकरी बकरी, काल सबे बर आगे हे।

बघवा भलवा हाथी तक के, ताकत जमे हरागे हे।।

कथरी भीतर मनुष दुबकगे, नोहे क्षण आडम्बर के।

हाड़ा गोंडा काँप जात हे, सर्दी देख दिसम्बर के।।


शीत गिरत हे टपटप टपटप, पेड़ पात अउ छानी ले।

गरम चीज बर फिरैं ललावत, बैर करैं सब पानी ले।।

बबा संग मा कई जवान तक,  नाहे हवँय नवम्बर के।

हाड़ा गोंडा काँप जात हे, सर्दी देख दिसम्बर के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

खून पछीना-लावणी छंद

 खून पछीना-लावणी छंद


खून पछीना पानी होगे, कदर कहाँ कोनो करथें।

कई खपा जाँगर मर जावँय, कई हदर दोंदर भरथें।।


धनी बली बैपारी नेता, राज करैं चारो कोती।

यशजश बाढ़ें इँखरे मनके, फुले फले मूंगा मोती।।

पापी तन ला पाक मान के, इँखरे पग सबझन परथें।

खून पछीना पानी होगे, कदर कहाँ कोनो करथें।।


देखावा के हवै जमाना, जउन दिखे तउने बिकथें।

कोट कछेरी संग देवता, भाग घलो इँखरें लिखथें।।

सत सुमंत अउ भला कला के, खेती ला सबझन चरथें।।

खून पछीना पानी होगे, कदर कहाँ कोनो करथें।


मिले पछीना गारा मा हे, वो जिनगी कारा मा हे।

खून देवइया खुर्चत दिखथें, मान गउन नारा मा हे।।

भाग बनइया जे कहिलाये, भूख प्यास तउने मरथें।।

खून पछीना पानी होगे, कदर कहाँ कोनो करथें।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

बाल्को,कोरबा(छग)

जंगल झाड़ी के विनास-लावणी छंद

 जंगल झाड़ी के विनास-लावणी छंद


पर्वत के पर्वत कुचरागे, छोट शिला सुर सूरत ए।

कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।


खेल करै नेता अधिकारी, बेचे जंगल झाड़ी ला।

उद्योगी के जेब भरे बर, रोके जीवन गाड़ी ला।।

बाट निहारे सड़क पूल हा, काटे रूख मुहूरत ए।

कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।


माटी महतारी के छाती, सबे जघा खोदावत हे।

धन्ना मनके नजर गड़े हे, खेत खार बोहावत हे।।

लगथे आजे उजड़ जही बन, अइसन काय जरूरत ए।

कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।


विकसित भारत के सपना ला, इसने कहूँ सँजोना हे।

हवा नीर तक ला ले पीबों, ता जिनगी भर रोना हे।।

आघू पीढ़ी ला जे खावय, ते मानव नइ धूरत ए।

कते पेड़ ए बली देय बर, कोन पेड़ माँ मूरत ए।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

नोहर होगे उन्हारी- सार छंद

 नोहर होगे उन्हारी- सार छंद


भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पहली जम्मों गांव गांव मा, माते राहय खेती।

सरसो नाँचे तिवरा हाँसे, जेती देखन तेती।।

करे मसूर ह मुचमुच फुलके, बड़ निकले तरकारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पुरवा गाये राग फगुनवा, चना गहूँ लहराये।

मेड़ कुंदरा कागभगोड़ा, अड़बड़ मन ला भाये।

चना चोरइया गाय बेंदरा, खाय मार अउ गारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


कोन सिधोवव खेत किसानी, मनखे मन पगलागे।

खेत बेच के खाय खवाये, शहर गाँव मा आगे।।

सड़क झडक दिस खेत खार ला, बनगे महल अटारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

नोहर होगे उन्हारी- सार छंद

 नोहर होगे उन्हारी- सार छंद


भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पहली जम्मों गांव गांव मा, माते राहय खेती।

सरसो नाँचे तिवरा हाँसे, जेती देखन तेती।।

करे मसूर ह मुचमुच फुलके, बड़ निकले तरकारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


पुरवा गाये राग फगुनवा, चना गहूँ लहराये।

मेड़ कुंदरा कागभगोड़ा, अड़बड़ मन ला भाये।

चना चोरइया गाय बेंदरा, खाय मार अउ गारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


कोन सिधोवव खेत किसानी, मनखे मन पगलागे।

खेत बेच के खाय खवाये, शहर गाँव मा आगे।।

सड़क झडक दिस खेत खार ला, बनगे महल अटारी।

भर्री भाँठा खार भँठागे, घटके कती उन्हारी।

चना गहूँ सरसो अरसी के, चक हे ना रखवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

बुढ़वा बने जवान(सरसी छंद)

 बुढ़वा बने जवान(सरसी छंद)


नकली चुंदी दाँत लगाके, बुढ़वा बने जवान।

ना जवान के जोश दिखत हे, ना सियान के ज्ञान।।


नवा जमाना सब कुछ बाँटे, बिसा फेक के नोट।

झुर्री झाँई तक दब जावै, दबे दाग जर चोट।।

रंग रंग के दवा दवाई, बदलत हवै जहान।।

नकली चुंदी दाँत लगाके, बुढ़वा बने जवान।।


देखावा के हवै जमाना, सबझन देख झपाँय।

गुण गियान ला कोन पुछत हे, धन वाले अँटियाँय।।

रंग रूप भर चमचम चमकै, मुख ले बरसे बान।

नकली चुंदी दाँत लगाके, बुढ़वा बने जवान।


कनिहा नवे डोकरी नइहे, लउठे धरे सियान।

बेचत पागा लादे लागा, कल ले हो अंजान।।

ना नीयत ना नेकी हावै, ना कोठी ना धान।

नकली चुंदी दाँत लगाके, बुढ़वा बने जवान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

छेरछेरा पुन्नी के मूलमंत्र

 छेरछेरा पुन्नी के मूलमंत्र


                          कृषि हमर राज के जीविका के साधन मात्र नोहे, बल्कि संस्कृति आय, काबर कि खेती किसानी के हिसाब ले हमर परब संस्कृति अउ जिनगी दूनो चलथे। उही कड़ी के एक परब आय, छेराछेरा। जे पूस पुन्नी के दिन मनाय जाथे। ये तिहार ला दान धरम के तिहार केहे जाथे। वइसे तो ये तिहार मानये के पाछू कतको अकन किवदंती जुड़े हे, फेर ठोसहा बात तो इही आय कि, ये बेरा मा खेत के धान(खरीफ फसल) लुवा मिंजा के किसान के कोठी मा धरा जावत रिहिस, उही खुशी मा एक दिन अन्न दान होय लगिस, जेला छेरछेरा के रूप मा पूरा छत्तीसगढ़ मनाथें। हमर छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज हरे, येती छेराछेरा परब ला, घोटुल मा रहिके सबे विधा मा पारंगत होय, युवक युवती मनके स्वागत सत्कार के रूप मा मनाये जाथें, अउ दान धरम करे जाथें। पौराणिक काल मा इही दिन,भगवान शिव के पार्वती के अँगना मा भिक्षा माँगे के वर्णन मिलथे। सुनब मा आथे कि भगवान शिव अपन विवाह के पहली माता पार्वती तिर नट के रूप धरके उंखर परीक्षा लेय बर गे रिहिस, अउ तब ले लोगन मा उही तिथि विशेष मा दान धरम करत आवँत हें। 

                     ये दिन ले जुड़े एक पौराणिक कथा अउ सुनब मा मिलथे, कथे कि एक समय धरती लोक मा भयंकर अंकाल ले मनखे मन दाना दाना बर तरसत रिहिन, तब आदि भवानी माँ, शाकाम्भरी देवी के रूप मा अन्न धन के बरसा करिन। वो तिथि पूस पुन्नी के पबरित बेरा पड़े रिहिस। उही पावन सुरता मा, माता शाकाम्भरी देवी ला माथ नवावत, आज तक ये दिन दान देय के पुण्य कारज चलत हे। भगवान वामन अउ राजा बली के प्रसंग घलो कहूँ मेर सुनब मा आथे।

                रतनपुर राज के कवि बाबूरेवाराम के पांडुलिपि मा घलो ये दिन के एक कथा मिलथे, जेखर अनुसार राजा कल्याणसाय हा, युद्धनीति अउ राजनीति मा पारंगत होय खातिर मुगल सम्राट जहाँगीर के राज दरबार मा आठ साल रेहे रिहिस, अउ इती ओखर रानी फुलकैना हा अकेल्ला रद्दा जोहत रिहिस। अउ जब राजा लहुट के आइस ता ओखर खुशी के ठिकाना नइ रिहिस, रानी फुलकैना मारे खुशी मा अपन राज भंडार ला सब बर खोल दिस, अउ अन्न धन के खूब दान करें लगिस, अउ सौभाग्य ले वो तिथि रिहिस, पूस पुन्नी के। कथे तब ले ये दिन दान धरम के  परम्परा चलत हे।

                  कोनो भी तिथि विशेष मा कइयों ठन घटना सँघरा जुड़ सकथे, जइसे दू अक्टूबर गाँधी जी के जनम दिन आय ता शास्त्री जी घलो इही दिन अवतरे रिहिन, दूनो के आलावा अउ कतको झन के जनम दिन घलो होही। वइसने पूस पुन्नी के अलग अलग कथा, किस्सा, घटना ला खन्डित नइ करे जा सके। फेर सबले बड़का बात ये तिथि ला, दान पूण्य के दिन के रूप मा स्वीकारे गेहे। अउ दान धरम कोनो भी माध्यम ले होय, वन्दनीय हे। छेराछेरा तिहार मा घलो वइसने दान धरम करत,अपन अँगना मा आय कोनो भी मनखे ला खाली हाथ नइ लहुटाय जाय, जउन भी बन जाये देय के पावन रिवाज चलत हे, अउ आघु चलते रहय। ये परब मा देय लेय के सुघ्घर परम्परा हे, छोटे बड़े सबे चाहे धन मा होय चाहे उम्मर मा आपस मा एक होके ये परब मा सरीख दिखथें। लइका सियान के टोली गाजा बाजा के संग सज सँवर के हाँसत गावत पूरा गांव मा घूम घूम अन्न धन माँगथे, अउ सब ओतके विनम्र भाव ले देथें घलो। छेरछेरा तिहार के मूल मा उँच नीच, जाति धरम, रंग रूप, छोटे बड़े, छुवा छूत,अपन पराया अउ अहम वहम जइसे घातक बीमारी ला दुरिहाके दया मया अउ सत सुम्मत बगराना हे। फेर आज आधुनिकता के दौर मा अइसन पबरित परब के दायरा सिमित होवत जावत हे। बड़का मन कोनो अपन दम्भ ला नइ छोड़ पावत हे, मंगइया या फेर गरीब तपका ही माँगत हे, अउ देवइया मा घलो रंगा ढंगा नइहे। *एक मुठा धान चाँउर या फेर रुपिया दू रुपिया कोनो के पेट ला नइ भर सके, फेर देवई लेवई के बीच जेन मया पनपथे, वो अन्तस् ला खुशी मा सराबोर कर देथे। एक दूसर के डेरउठी मा जाना, मिलना मिलाना अउ मया दया पाना इही तो बड़का धन आय। छेरछेरा मा मिले एक मुठा चाँउर दार के दिन पुरही, फेर मिले दया मया, मान गउन सदा पुरते रइथे।* इही सब तो आय छरछेरा के मूलमंत्र। कखरो भी अँगना मा कोनो भी जा सकथे, कोनो दुवा भेद नइ होय। फेर आज अइसन पावन परम्परा देखावा अउ स्वार्थ के भेंट चढ़त दिखत हे, शहर ते शहर गांव मा घलो अइसन हाल दिखत हे। ये तिहार मा ज्यादातर लइका मन झोरा बोरा धरे, गाँव भर घूम अन्न धन माँगथे, सबे घर के एक मुठा अन्न धन अउ मया पाके, उंखर अन्तस् मा मानवता के भाव उपजथे, उन ला लगथे, कि सब हम ला मान गउन देथे, छोटे बड़े,धरम जाति, ऊँच नीच, गरीब रईस सब कस कुछु नइ होय, अइसनो सन्देशा घलो तो हे, ये परब मा। छोट लइका मनके मन कोमल होथे, दुत्कार अउ भेदभाव देखही सुनही ता निराश हताश तो होबे करही।

                 छेरछेरा अइसन पबरित परब आय जे गांव के गांव ला जोड़थे, वो भी सब ला अपन अपन अँगना दुवार ले, दया मया देवत लेवत अन्तस् ले, दान धरम ले या एक शब्द मा कहन ता मनखे मनखे ले। ये खास दिन मा जइसे माता पार्वती अँगना मा नट बन आये शिव जी ला सर्वस्व न्योछावर कर दिन, राजा बली भगवान वामन ला सब कुछ दे दिस,माँ शाकाम्भरी भूख प्यास मा तड़पत धरतीवासी ला अन्न धन ले परिपूर्ण कर दिस, रानी फुलकैना अपन परजा मन ला अन्न धन दिस, अउ किसान मन अपन उपज के खुशी ला  थोर थोर सब ला बाँटथे, वइसने सबे ला विनयी भाव ले अपन शक्तिनुसार दान धरम करना चाही। लाँघन, दीन हीन के पीरा हरना चाही, अहंकार दम्भ द्वेष, ऊँच नीच ला दुरिहागे सबे ला अपने कस मानत मान देना चाही, मया देना चाही।

*दान धरम अउ मया पिरीत के तिहार ए छेरछेरा।*

*मनखे के मानवता देखाय के आधार ए छेरछेरा।*


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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छेरछेरा(सार छंद)


कूद  कूद के कुहकी पारे,नाचे   झूमे  गाये।

चारो कोती छेरिक छेरा,सुघ्घर गीत सुनाये।


पाख अँजोरी  पूस महीना,आवय छेरिक छेरा।

दान पुन्न के खातिर अड़बड़,पबरित हे ये बेरा।


कइसे  चालू  होइस तेखर,किस्सा  एक  सुनावौं।

हमर राज के ये तिहार के,रहि रहि गुण ला गावौं।


युद्धनीति अउ राजनीति बर, जहाँगीर  के  द्वारे।

राजा जी कल्याण साय हा, कोशल छोड़ पधारे।


आठ साल बिन राजा के जी,काटे दिन फुलकैना।

हैहय    वंशी    शूर  वीर   के ,रद्दा  जोहय   नैना।


सबो  चीज  मा हो पारंगत,लहुटे  जब  राजा हा।

कोसल पुर मा उत्सव होवय,बाजे बड़ बाजा हा।


राजा अउ रानी फुलकैना,अब्बड़ खुशी मनाये।

राज रतनपुर  हा मनखे मा,मेला असन भराये।


सोना चाँदी रुपिया पइसा,बाँटे रानी राजा।

रहे  पूस  पुन्नी  के  बेरा,खुले रहे दरवाजा।


कोनो  पाये रुपिया पइसा,कोनो  सोना  चाँदी।

राजा के घर खावन लागे,सब मनखे मन माँदी।


राजा रानी करिन घोषणा,दान इही दिन करबों।

पूस  महीना  के  ये  बेरा, सबके  झोली भरबों।


ते  दिन  ले ये परब चलत हे, दान दक्षिणा होवै।

ऊँच नीच के भेद भुलाके,मया पिरित सब बोवै।


राज पाठ हा बदलत गिस नित,तभो होय ये जोरा।

कोसलपुर   माटी  कहलाये, दुलरू  धान  कटोरा।


मिँजई कुटई होय धान के,कोठी हर भर जावै।

अन्न  देव के घर आये ले, सबके मन  हरसावै।


अन्न दान तब करे सबोझन,आवय जब ये बेरा।

गूँजे  सब्बे  गली  खोर मा,सुघ्घर  छेरिक छेरा।


वेद पुराण  ह घलो बताथे,इही समय शिव भोला।

पारवती कर भिक्षा माँगिस,अपन बदल के चोला।


ते दिन ले मनखे मन सजधज,नट बन भिक्षा माँगे।

ऊँच  नीच के भेद मिटाके ,मया पिरित  ला  टाँगे।


टुकनी  बोहे  नोनी  घूमय,बाबू मन  धर झोला।

देय लेय मा ये दिन सबके,पबरित होवय चोला।


करे  सुवा  अउ  डंडा  नाचा, घेरा गोल  बनाये।

झाँझ मँजीरा ढोलक बाजे,ठक ठक डंडा भाये।


दान धरम ये दिन मा करलौ,जघा सरग मा पा लौ।

हरे  बछर  भरके  तिहार  ये,छेरिक  छेरा  गा  लौ।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


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छेरछेरा

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धान धराये हे,कोठी म।

दान-पून  के,ओखी म।

पूस    पुन्नी    के   बेरा,

हे गाँव-गाँव म,छेरछेरा।


छोट - रोंठ  सब  जुरे  हे।

मया दया गजब घुरे   हे।

सबो के अंगना  - दुवारी।

छेरछेरा मांगे ओरी-पारी।

नोनी   मन   सुवा   नाचे,

बाबू   मन  डंडा    नाचे।

मेटे    ऊँच  -  नीच    ल,

दया  -  मया   ल   बांचे।

नाचत   हे  मगन   होके,

बनाके     गोल     घेरा।

पूस    पुन्नी     के   बेरा,

हे गाँव-गाँव  म,छेरछेरा।


सइमो- सइमो करत  हे,

गाँव   के   गली   खोर।

डंडा- ढोलक-मंजीरा म,

थिरकत    हवे     गोड़।

पारत              कुहकी,

घूमे      गाँव         भर।

छेरछेरा   के   राग    म,

झूमे    गाँव          भर।

कोनो  केहे  मुनगा  टोर,

त   केहे ,  धान  हेरहेरा।

पूस    पुन्नी    के    बेरा,

हे गाँव-गाँव म, छेरछेरा।


भरत   हे    झोरा  - बोरा,

ठोमहा - ठोमहा  धान म।

अड़बड़   पून   भरे   हवे,

छेरछेरा    के    दान   म।

चुक ले अंगना लिपाय हे।

मड़ई  -  मेला   भराय हे।

हूम - धूप - नरियर धरके,

देबी - देवता ल,मनाय हे।

रोटी - पिठा  म  ममहाय,

सबझन      के       डेरा।

पूस    पुन्नी     के    बेरा,

हे  गाँव-गाँव  म,छेरछेरा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


छेरछेरा परब की आप सबला बहुत बहुत बधाई

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 छेरिकछेरा


दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।

जतके देहू ततके बढ़ही, धन दौलत शुभ बेरा।।


पूस पाख मा पुन्नी के दिन, बगरै नवा अँजोरी।

परब छेरछेरा हा आँटै, मया पिरित के डोरी।।

लइका लोग सियान सबे मिल, नाचै गाना गायें।।

धिनधिन धिनधिन ढोलक बाजे, डंडा ताल सुनायें।

थपड़ी कुहकी झांझ मँजीरा, सुनत टरै दुख घेरा।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।।


दया मया के सागर लहरै, नाचै जीवन नैया।

गोंदा गमकै घर अँगना मा, गाय गीत पुर्वैया।।

करे जाड़ जोरा जाये के, मांघ नेवता पाये।

बर पीपर हा पात झराये, आमा हा मउराये।।

सेमी गोभी भाजी निकले, झूलै मुनगा केरा।।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।


मीत मया मन भीतर घोरत, दान देव बन दाता।

भरे अन्न धन मा कोठी ला, सबदिन धरती माता।।

रांध कलेवा खाव बाँट के, रिता रहे झन थारी।

झारव इरसा द्वेष बैर ला, टारव मिल अँधियारी।।

सइमो सइमो करै खोर हा, सइमो सइमो डेरा।

दान अन्न धन के सब करलव, सुनके छेरिकछेरा।।

खैरझिटिया

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 छेरछेरा अउ डंडा नाच


                     डंडा नाच हमर छत्तीसगढ़ के प्रमुख नाच मा शामिल हे। जेला अधिकतर  पूस पुन्नी याने छेरछेरा के समय मा नाचे जाथे। ये नाच मा मुख्यतः धँवई या तेंदू के छोट छोट डंडा के प्रयोग होथे, काबर कि एखर लकड़ी मजबूत अउ बढ़िया आवाज करथे। डंडा के आवाज के ताल मा ही नचइया मन गोल घेरा मा घूम घूम एक दूसर के डंडा ला एक निश्चित लय ताल मा बजाथें, अउ कमर मुड़ी ला हला हला के झुमथें। कुहकी पारना घलो डण्डा नाच के विशेषता आय। आजकल डंडा के संग ढोलक,झांझ अउ मन्जीरा तको ये नाच मा देखे बर मिलथे। ये नाच के एक विशेष लय ताल युक्त गीत होथे। डंडा नाच ला मुख्य रूप ले लड़का मन द्वारा किये जाथे। ये नाच मा लगातार घूम घूम के नाचे अउ डंडा टकरावत गीत ला दोहराए बर घलो लगथे। जब किसान मन के खेत के धान घर के कोठी मा धरा जथे ता दान पुण्य के ओखी मा मनाए जाथे छेरछेरा के तिहार, अउ इही बेरा घर घर जाके डंडा नाचत लइका सियान मन अन्न के दान पाथें। हमर छत्तीसगढ़ मा होरी के समय घलो डंडा नाचे जाथे, जेला डंडारी नाच कहिथे, फेर दुनो नाच अलग अलग बेरा व अलग अलग हावभाव के नाच आय। डंडारी विशेषकर पहाड़ी क्षेत्र मा होली के बेरा नाचे जाथे। मैदानी भाग मा डंडा नाच अउ पहाड़ी भाग मा इही सैला नृत्य कहे जाथे। जनश्रुति के अनुसार आदिवासी मन आदि देवाधिदेव महादेव ला मनाए बर येला नाचथे ता मैदानी भाग मा भगवान श्रीकृष्ण के रास नृत्य के रूप मा नाचे गाये जाथे। आदिवासी मन येला अपन पारम्परिक नृत्य मानथे। सुनब मा यहु आथे कि एखर शुरूवार राम रावण युद्ध के बाद राम विजय के समय आदिवासी  मन राम जी के स्वागत मा नाचिन, ता कहूँ कहिथे के एखर शुरुवात कृष्ण के रास लीला के समय होइस। ये नाच मा राम कॄष्ण के गीत के संग संग  शुरुवात मा भगवान गणेश, मां सरस्वती अउ गुरु वन्दना करे जाथे। पंडित मुकुटधर पांडेय जी हा ये नृत्य ला छत्तीसगढ़ के "रास नृत्य" घलो कहे हे। कतको झन मन एला छत्तीसगढ़ के डांडिया घलो कहिथे।

                      डंडा नाच मा समयानुसार साज सज्जा मा बदलाव होवत दिखथें। पहली धोती कुर्ता, कलगी, पागा,मोरपंख, कौड़ी, घुंघरू नचइया मनके सँवागा रहय, जे पारम्परिक रूप ले अभो दिखथे, फेर आजकल सुविधानुसार नचइया मन अपन अपन सँवागा के व्यवस्था करथें। ढोलक,झांझ मंजीरा संग मांदर, हारमोनियम,बासुरी  व अन्य कतको वाद्य यंत्र आज डंडा नाच के शोभा बढ़ावत दिखथे। नाचा पार्टी या फेर  हमर संस्कृति संस्कार ला देखाय के बारी आथे ता ये नाच ला कभू भी कलाकार मन मंच के माध्यम ले लोगन बीच परोसथे। नाच के बीच परइया कुहकी ला कइसे लिख के बतावँव? उह उह एक लय मा अउ एक विशेष बेरा मा नचइया मन एक साथ चिल्लाथें। देखत सुनत ये नाच बड़ मनभावन लगथे। आजकल डंडा नाच मा कतको प्रकार के करतब तको कलाकार मन करत दिखथें। आजकल बांस के डंडा घलो चलन मा आगे हे। डंडा नाचे बर सम संख्या मा नर्तक होथे, जिंखर दुनो हाथ मा  एक एक डंडा होथे। गोल घेरा मा डंडा ला दाएं बाए नाचत साथी मनके डंडा ला ठोंकत ये नृत्य ला करे जाथे।

                    वइसे तो डंडा नाच मा बड़ अकन गीत गाये जाथे, सबके वर्णन करना सम्भव नइहे, तभो कुछ पारम्परिक गीत ला लमाये के प्रयास करत हँव। सुमरनी ले ये नृत्य चालू होथे। गणेश वंदना, सरस्वती वंदना, रामकृष्ण अउ माता पिता गुरु के वन्दना घलो ये नृत्य मा सुने बर मिलथे।। सुमरनी गीत के एक बानगी,---

'पहिली डंडा ठोकबो रे भाई, काकर लेबो नाम रे ज़ोर,

गावे गउंटिया ठाकुर देवता, जेकर लेबो नाम रे ज़ोर।

आगे सुमिरो गुरु आपन ला, दूजे सुमिरों राम रे ज़ोर,

माता-पिता अब आपन सुमिरों गुरु के सुमिरों नाम रे ज़ोर।'


कुछ अउ गीत, ज्यादातर गीत के शुरुवात "तरीहरी नाना रे नाना रे भाई" काहत चालू होथे, जेखर बीच मा कहानी, कथा अउ बारी बखरी, खेती-खार संग परब तिहार के वर्णन रहिथे।


1, "एकझन राजा के सौ झन पुत्र,

    उनला मँगाइस हे मुठा मुठा माटी।"


2,  ओरिन ओरिन मुनगा लगाएंव।

     वो मुनगा फरे रहे लोर रे केंवरा, 

      तैं डँगनी मा मुनगा टोर।


3,   मन रंगी सुआ नैना लगाके उड़ भागे।

      उड़ि उड़ि सुवना, घुटवा पे बइठे।

      घुटवा के रस ला ले भागे, मन रंगी


4,  मैं बन जा रे लमडोर,

     नेकी मैं बन जा।


5,   हाय डारा लोर गे हे न।


6, तहूँ जाबे महूँ जाहुँ, राजिम मेला


ये सब पारम्परिक गीत के आलावा आजकल नवा नवा गीत भी देखे सुने बर मिलथे।

                  डंडा नचइया मन दुनो हाथ मा डंडा लेके, गोल किंजरत अलग अलग प्रकार के डंडा नाचथे। डंडा नाच के कतको प्रकार हे, एखर बारे मा हमर पुरखा कवि डॉ प्यारेलाल गुप्त जी मन अपन पुस्तक "प्राचीन छत्तीसगढ़"मा घलो विस्तार ले लिखें हें। गुप्त जी अनुसार दुधइया नृत्य, तीन डंडिया, पनिहारिन सेर, कोटरी झलक, भाग दौड़, चरखा भांज आदि कतको रूप प्रचलित हे। एखर आलावा सियान मन आधा झूल, टेटका झूल,पीठ जुड़ी, समधी भेंट, घुचरेखी आदि प्रकार के डंडा नाच के बारे मा घलो बताथे। ये सब नाच ल नाचे के अलग अलग तरीका हे, कहे के मतलब सबके अलग अलग परिभाषा हे,नाच शैली हे। 

जइसे.........

*तीन डँड़या- तीन झन संग डंडा टकराना

*आधा झूल-एक झन आदमी दुनों डंडा एक आदमी ले टकराथें।

*टेटका झूल- एक आदमी अपन आजू बाजू के आदमी ले डंडा टकराथे।

*पीठजुड़ी-पीठ जोड़के दांया बांया डंडा टकराना

*सम्बंधी भेंट-दांया बांया बारी बारी से डंडा मारना

*घुचरेखी-ऊपर अउ घुंच के नीचे डंडा मारना


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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होगे छेरछेरा


ये बात हरे हमरे तुम्हरो बीच के।

एक मुठा दिएन फेर फोटू खींच के।।


बात बानी मा होगेन सब मनखे एक।

अइसने मा का फुटही भांडी ऊँच नीच के।।


परब तिहार नता रिस्ता सब मा देखावा।

पुरखा मन मानिस दया मया सींच के।।


कइसे अउ भराही मानवता के तरिया।

मार डरेन मछरी सहीं चुक्ता छींच के।।


माया बर मया छोड़ बाजार मा।

खड़े हवँन सब आज आँख मीच के।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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चित्रांकन-दिनेश चौहान जी

नवा साल

 नवा साल


हमर बर नवा का,अउ का जुन्ना रे नवा साल।

सबर दिन रथे, काठा कोठी उन्ना रे नवा साल।1


कोंटा मा परे हें, काली के संसो मा बबा ददा। 

मंद पीके नाचत हें, मोंटू मुन्ना रे नवा साल।।2


सियान मन जिनगी बिताइन, अपन मुठा बांध के,

आज चाबत हे मनखे मन ला, चुन्ना रे नवा साल।।3


नवा जमाना मा होवत हे, अड़बड़ नवा नवा उदिम,

संस्कृति संस्कार मा लगत हे, घुन्ना नवा साल।।4


होटल ढाबा मरत ले, भीड़ भाड़ दिखत हे,

ठिहा ठौर दिखत हे निचट, सुन्ना रे नवा साल।।5


आज के मनखें काली का करही, का पता?

देखावा मा झूलत हें सब, झुन्ना रे नवा साल।।6


ना नरियर अगरबत्ती, ना खीर ना पूड़ी भाये उनला,

बोकरा खाके नाचत हें, ताता तुन्ना रे नवा साल।7


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सकट चतुर्थी

 सकट चतुर्थी

       


              भारतीय संस्कृति मा चंदा, सुरुज के संग ग्रह नक्षत्र के पूजा पाठ बारो महीना चलते रथे। वइसने एक पूजा या व्रत होथे, सकट तिहार। ये तिहार के दिन चौथ के चंदा मा भगवान गणेश ला विराजे मानके। ओखर दर्शन करके दाई, बेटी, बहिनी मन, अपन निर्जला ब्रत ला तोड़थें, अउ अपन लइका लोग के सुख समृद्धि के कामना करथें। ये सन्दर्भ मा एक कथा आथे कि, भगवान शिव हा, पार्वती द्वारा मइल ले बनाय गणेश जी के मुड़ी ला काट देथे, जेखर ले पार्वती बहुत दुखी हो जथे, अउ जब गणेश जी ला जिंदा करे बर कथे, ता ओखर मुड़ मा हाथी के मूड़ लगाथे। पावर्ती देख के खुश होथे, फेर जब अपन लइका के पहली वाले कटे मुड़ी ला देखथे ता विलाप करे लगथे। पार्वती ला विलाप करत देख, ओखर प्रण, व्रत अउ इच्छा अनुसार वो मुड़ी ला चन्द्रमा मा, शिव जी हा शुशोभित कर देथें, अउ उही दिन ले सकट तिहार के चलागन माने जाथे। माता पार्वती अपन लइका गणेश के पुर्नजीवन अउ कटे मुड़ी के संसो बर निर्जला व्रत रहिके, भगवान शिव ला अपन बात मनवाथे। तपोबल ले प्रभावित भगवान शिव, चन्द्रमा मा मुड़ ला स्थापित करे के बाद, ये आषीश देथें कि सकट के दिन जउन भी महतारी मन, चाँद ल देखत पूजा पाठ करहीं, उंखर लइका लोग के सब संकट दुरिहा जही। उपास धास के ये सिलसिला आदि समय ले अभो सरलग चलत आवत हे।    

                 

                     छत्तीसगढ़ मा ज्यादातर ये उपास ला लोधी अउ कुर्मी समाज के बेटी माई मन रहिथे। पहली कस आजो ये तिहार मा, बेटी माई मन, अपन मइके मा जुरियाके सबो सँवागा सजाके रतिहा चंदा ला नमन करत अपन निर्जला व्रत ला तोड़थें अउ लइका लोग घर परिवार के सुख समृद्धि के कामना करथें। ये दिन माटी के खिलौना, जेमा डोंगा, बाँटी,भौरा के साथ साथ पापड़, तिली लाड़ू, कोमहड़ा पाग, पूड़ी, खीर, अइरसा आदि पकवान बनाये जाथे, अउ भगवान चन्द्र गणेश ला भोग लगाय जाथे। भगवान  चंद्र गणेश ला कच्चा दूध, फूल, पान, नरियर ,अगरबती, हूम धूम आदि चढ़ाए जाथे। ये परब ला सकट चतुर्थी घलो कथे। कुछ मन चौथ के चाँद के जघा तीज के चाँद ला घलो भगवान चन्द्र गणेश मानके सकट उपास रथे।  ददा भाई मन ये तिहार के पहली अपन बेटी बहिनी ला घर ले आथे। बेटी माई मन मइके मा ये उपास ला रथें। व्रत तिहार कोनो भी होय सबके मूल मा सुख समृद्धि के कामना जुड़े हें, वइसनेच मया मेल, सुख- समृद्धि के परब आय सकट चौथ।।

          

                         उपास धास कभू भी देखावा नइ होय, ओखर मूल मा सुखसमृद्धि के कामना ही रथे, फेर आज सोसल मीडिया के युग मा लगातार नवा नवा फिजूल चोचला चिंतनीय हे। कथे भगवान भाव के भूखा ए, तभे तो सकट उपास मा  महंगा मेवा मिष्ठान के जगह महतारी मन तिल गुड़ के भोग लगाके भगवान चंद्र गणेश ला मनाथें, अउ देख देखावा ले दुरिहा रथें। सकट उपास मा, कुछ जगह सकट माता के घलो जिक्र होथे। सकट माता मां दुर्गा के ही रूप आय, जेला चौथ माता भी कहिथे। राजस्थान मा चौथ माता के कई मंदिर भी मिलथे। वइसे छत्तीसगढ़ मा सकट के दिन चंद्र दर्शन के ही चलागन हे। चंदा मा भगवान गणेश के प्रतिमूर्ती मानके पूजा पाठ करथें। उपास ले भक्ति भाव के संग तन के स्वस्थता घलो बने रथे। ते पाय के ये सब तिहार बार के बहाना उपास जेखर से भी बन सकथे, रहना चाही। उपास सुख समृद्धि के साथ जुड़ाव के काम घलो करथे। ये सब उपास मइके, ससुराल के संग पारा, परोसी मा प्रेम बढ़ाथे। जय भगवान चंद्र गणेश,जय सकट माता।


सकट तिहार-कुंडलियाँ


मइके मा जुरियाय हें, दीदी बहिनी आज।

सकट तिहार मनात हें, थारी दिया सजात।

थारी दिया सजात, हवैं बेटी माई मन।

लाड़ू पापड़ खीर, बनावत हें दाई मन।।

माँगे मया दुलार, गजानन ले व्रत रइके।

हाँसत खेलत रोज, रहै ससुरार अउ मइके।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे

 तभो नेता मन के कद बाढ़े हे


पानी बिजली के हाल बेहाल हे।

डहर बाट मा खुदे नरवा ताल हे।।

नियम धियम गुंडा मन बनात हें,

न ढंग के स्कूल न अस्पताल हे।

विकास घोषणा पत्र मा माढ़े हे।

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे।।


कपड़ा ओनहा बस सादा हे।

मन भीतर भराय खादा हे।।

कुर्सी ला पोटारे रथे सबदिन,

एको ठन पुरोये नइ वादा हे।।

जनता बर शनि साते साढ़े हे।

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे।।


फूल माला के दीवाना ये मन।

जाने बस नित खाना ये मन।।

अपन जेब मा धरके रखें सदा,

कोर्ट कछेरी अउ थाना ये मन।

तभो जयकार करइया ठाढ़े हे।

तभे नेता मन के कद बाढ़े हे।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

छन्द मा छत्तीसगढ़ी संचालक-जीतेंद्र वर्मा”खैरझिटिया”

 राजभाषा आयोग के 9वाँ प्रांतीय सम्मेलन मा,,संचालक के तौर मा मोर विचार अउ बातबानी....


विषय:-छन्द मा छत्तीसगढ़ी

संचालक-जीतेंद्र वर्मा”खैरझिटिया”


जोहार।

मैं बाल्को, कोरबा ले जीतेन्द्र कुमार वर्मा “खैरझिटिया”। 


“छंद मा छत्तीसगढ़ी” ये विषय ल लेके आज हमन राजभाषा आयोग के 9वाँ प्रांतीय सम्मेलन के 9 वाँ सत्र मा उपस्थित होय हन, 9- 9 के जबर संयोग घलो मिलत हे...

                       छन्द के पहली छत्तीसगढ़ी के बात करथन। छत्तीसगढ़ी...... काय ए? सिर्फ भाषा या बोली? नही छत्तीसगढ़ी हमर मान ए, अभिमान, पहिचान ए। जइसे कोनो ल बंगाली बोलत सुनथन ता जान डरथन कि  वो बंगाल के ए, कोनो ला मराठी बोलत सुनथन ता जान डरथन कि वो महाराष्ट्र के ए, वइसने छत्तीसगढ़ी बोली छत्तीसगढ़ के पहिचान ला बताथे।भाषा या बोली सिर्फ मनखे के नही बल्कि देश, राज अउ अंचल के पहिचान होथे। ता का हमला अपन पहिचान ल भुलाना चाही? नही न…. कोनो लइका के चहेरा मुहरा आचार विचार अउ चाल चलन ल देखत कतको मन बता देथे कि वो फलाना के लइका ए। काबर कि ओ लइका म ओखर ददा दाई के पहिचान दिखथें। वइसने छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली आय, जे हम ला पहिचान देथे। रंग रूप, खानपान, पहिनावा ओढ़ना, पार परम्परा अउ संस्कृति संस्कार के संगे संग भाँखा बोली घलो पहिचान के एक आभिन्न भाग आय।  यदि हमन अपन बोली भाँखा ले भागबो त हमर पहिचान घलो नँदा जही। कोनो लइका ला ओखर ददा दाई के अलावा दूसर के लइका कहिलाय मा गरब नइ होय, अउ न वो लइका बने काहय, ता छत्तीसगढ़ी बोले अउ  छत्तीसगढिया काहय मा काके शरम? छत्तीसगढ़ी हमर माई बोली ए। जइसे महतारी के सेवा जतन ओखर बेटा ल ही करना पड़थे, वइसने हम सब छत्तीसगढिया मन ऊपर माई बोली छत्तीसगढ़ी के बढ़वार के भार हवै। कोनो भी भाँखा होय ओखर उत्तपत्ति बड़ श्रमसाध्य बूता होथे। आज अपन एक बात जमाना मा मनवा के देखव पता चल जही, कि कतका महीनत हे कोनो नवा शब्द गढ़ना अउ मनवाना। अइसन मा हमर पुरखा मनके महीनत बिरथा झन होय, अउ हमर माई बोली जन्मो जनम ये धरा धाम मा मिश्री घोरत रहे। भाँखा भाव के संवाहक होथे, छोटे बड़े कभू नइ होय। अइसन मा कोनो भी भाँखा ला छोटे बड़े कहना हमर नादानी होही। भाँखा ला जिंदा रखथे ओखर बोलइया, लिखइया, पढ़इया अउ समझइया मन। अउ आज बढ़वार के बूता हमर साहित्कार संगी मन बड़ सुघ्घर ढंग ले करत हे। मंच मा छत्तीसगढ़ी मा छंद के बारे मा बताये बर हमर संगी सुखदेव सिंह अहिलेश्वर(जिला कबीरधाम ले), मनीराम साहू मितान(सिमगा ले), बलराम चन्द्राकर(भिलाई ले), चोवाराम वर्मा बादल(जिला बलौदाबाजार ले), आशा देशमुख(कोरबा ले) ले हमर बीच उपस्थित हें। अउ ये सत्र के अध्यक्षता करत हें, छंद के छ के संस्थापक छंदविद अरुण कुमार निगम जी(रायपुर)। आप जम्मों के सादर स्वागत हे, एक बार जोरतार ताली—।


संगवारी हो…

                      वइसे तो छंद के कई परिनिष्ठित परिभाषा हे। फेर छंद कहे ले छत्तीसगढ़ी मा छंदे बंधे के भाव बोध होथे, अउ छंद वइसनेच आय घलो। जेन मात्रा के साथ साथ यति, गति अउ एक विशेष नियम मा बंधाय रथे। वैसे बंधाय मा ही रीतिनीति संरक्षित होथे। बंधाय छंदाय मा ही बइला ले खेत जोताथे। भर्री ला मेड़ बनाके बांधे ले ही खेत बनथे, नदी ला बांधे ले सिचाई अउ बिजली उत्पन्न होथे। कहे के मतलब नियम धियम मा बंधे ले ही काम धाम निपटथे, ता हमन काबर ऐती तेती के सोचथन?

छत्तीसगढ़ के पावन धरती धन्य हे जिहां दुनिया के पहली छंद आदिकवि महर्षि बाल्मिकी के मुख ले कौंच पक्षी के जोड़ा ला लहूलुहान देख निकलिस। हमर तुरतुरिया मा आजो बाल्मिकी जी के आश्रम विद्यमान हे। छत्तीसगढ़ के माटी धन्य हे कि रामगढ़ के पहली मा कवि कालिदास मेघदूत अउ अपन अन्य छंदबद्ध ग्रंथ के सृजन करिन।  छत्तीसगढ़ के माटी ले ही दुनिया ला छंदशास्त्र के दुर्लभ ग्रंथ छंद प्रभाकर, छंद सारावली अउ काव्य प्रभाकर जगन्नाथ प्रसाद भानु जी के कर कलम ले मिलिस। अउ जगन्नाथ प्रसाद भानु जी के जनम भुइँया ये बिलासपुर घलो धन्य हे जिहां ये पावन यज्ञ सजे हे। अनेक ऋषिमुनि के संगे संग धनी धरम दास, आमीन माता, संत गुरुघासी जी मन के छंदबद्ध बानी छत्तीसगढ़ मा आदिकाल गूंजत हे। हमर वाचिक परम्परा के भजन कीर्तन अउ गीत कविता आजों मंदरस कस मीठाते।  अइसन मा भला छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य ‘छंद’ ले कइसे विमुख हो सकथे। छत्तीसगढ़ी काव्य मा छंद पहली घलो लिखे जावत रिहिस अउ आजो लिखे जावत हे। अउ छन्द के ये धरा मा पहली घलो वर्चस्व रिहिस, आजो हे अउ अवइया बेरा मा घलो रही। 

                 छत्तीसगढ़ी काव्य मा छंद यात्रा वाचिक परम्परा के रूप मा बड़ जुन्ना समय ले चलत आवत हे। लिखित साहित्य के बात करथन ता छत्तीसगढ़ मा राज करइया राजा मनके दरबारी कवि मन के कुछ छत्तीसगढ़ी काव्य मा दिखथें, फेर उपलब्धता नगण्य स्थिति मा हे। कबीर दास जी के चेला धनी धरम दास जी के काव्य ही लिखित रूप मा सामने आथे। जेमा दोहा, सरसी, सार छंद के आलावा साखी शबद अउ पद हवै। उंखर धर्मपत्नि आमीन माता के पद के जिक्र घलो छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य मा मिलथे। संत गुरुघासी दास जी के गुरुवाणी मा घलो छंद के पुट दिखथे। विशुद्ध छत्तीसगढ़ी छंदबद्ध काव्य काहन ता पं. सुंदरलाल शर्मा जी द्वारा रचित खंडकाव्य दानलीला ही सामने आथे, जेमा दोहा, सार, तोतक, लावणी, चौपाई आदि छंद स्पष्ट दिखथे। दानलीला के आलावा सुंदरलाल शर्मा जी के अउ छंदबद्ध कविता घलो मिलथे।अन्य छंद लिखइया जुन्ना कवि मा शुकलाल प्रसाद पांडेय, मुकुधरपाण्डेय, बंसीधर पांडेय, नारायण लाल परमार, कुंजबिहारी चौबे, द्वारिकाप्रसाद तिवारी विप्र, कोदूराम दलित, नरसिंह दास, दानेश्वर शर्मा, श्यामलाल चतुर्वेदी जी के साथ साथ लक्ष्मण मस्तुरिया, लाला जगदलपुरी, बुधराम यादव, रामह्र्दय तिवारी, अरुण निगम, शंकुन्तला शर्मा, रमेश कुमार चौहान, चोवाराम वर्मा बादल  अउ बहुत अकन युवा कवि मन आज छंदबद्ध सृजन करत हें। वर्तमान समय तक लगभग 70, 80 विशुद्ध छंदबद्ध पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा मा छप चुके हे, जे हम सब बर गर्व के बात ए। छत्तीसगढ़ी भाषा मा छंद न सिर्फ लिखे छपे जावत हे, बल्कि चारों मुड़ा सोसल मीडिया मा छाए दिखथे। कवि सम्मेलन के मंच होय या रेडियो, टीवी या अन्य निजी चैनल सब कोती छंदबद्ध रचना दिखथे।

        

                हमर छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य घलो बड़ सजोर हे। हमर लोकगीत लोकगाथा, लोक नाट्य मन के एक विशेष लय तान हे, ते पाय के ओमा छंद के उपस्थिति ला नकारे नइ जा सके। भले मात्रा थोर बहुत ऊँचनीच हे, फेर लय वइसनेच होथे। मात्रा के ऊँचनीच के कारण वाचीक परम्परा हो सकथे, काबर कि ये सब जुन्ना समय ले बोलचाल माध्यम मा ही आज तक आय हे। अइसन छंद लोकछन्द कहिलाथे। भरथरी, पंडवाणी, ढोलामारू गाथा, अहिमन रानी गाथा, केवला रानी गाथा, फुलबासन गाथा, पचरा देवी गीत, फाग गीत, सोहर गीत, बिहाव पठवनी गीत,चंदैनी गीत, देवार गीत, गौरागौरी गीत, गोरखबानी, आल्हा आदि लोक गीत मन अपन विशेष धुन, लय अउ ताल के कारण छत्तीसगढ़ के लोक छंद के रूप मा स्थापित हे। 

              

                जेन चीज नियम धियम मा चलथे ओखर शास्त्र होथे। ते पाय के छंद के घलो शास्त्र हे। छंद अउ छंद शास्त्र के सम्बंध भाषा अउ व्याकरण के समान होथे। छंद ला साधे ले वो भाषा के व्याकरण पुष्ट होथे, काबर कि छंद व्याकरण के अभिन्न अंग आय। हिंदी के व्याकरण मा सब छंद पढ़थन। छत्तीसगढ़ी के घलो नवा व्याकरण पुस्तक बिलासपुर ले डॉ विनोद कुमार वर्मा अउ डॉ विनय पाठक जी के सम्पादन मा निकले हे, जेमा छंद के हिंदी के व्याकरण पुस्तक ले भी ज्यादा उदाहरण अउ जानकारी हे। छंद के प्रस्तुति या लेखन के भाषा अलग अलग हो सकथे फेर नियम धियम एके रथे। छंदबद्ध कविता कालजयी होथे, काबर कि वोमा सहज गेयता होथे, सुस्पष्टता होथे, श्रव्यता होथे, प्रभावी होथे, श्रमसाध्य होथे। छंदशास्त्र मा अतका अकन छंद के विधान हे, कि ओखर गिनती करना मुश्किल हे। डॉ एस एन दास गुप्त के अनुसार “समस्त विश्व का साहित्य किसी न किसी छंद से निबद्ध है।” कई कवि मा नवा छंद बनाए के बात करथें, जे केवल भ्रम आय। जइसे अपन घर के कोठा, बारी, कोठार जाय के रद्दा ला सड़क नइ कहि सकन वइसने बात नवा छंद मा लागू होथे। जइसे सड़क बनाए बर अच्छा जघा, बने नाप तोल, बने डामर गिट्टी अउ सड़क विभाग के बने जानकार मनखें मन के जरूरत पड़थे, वइसने नवा छंद के निर्माण  घलो भाषा शास्त्री मन विशेष माप तोल के तर्क अउ शास्त्र सम्मत करथें। विशेष नापतौल मा बने सड़क मा सब चलथें, अउ नियम मा चलथें (जइसे डेरी हाथ कोती जाना, निश्चित स्पीड मा गाड़ी चलाना आदि आदि)। सड़क मा मनमानी बिल्कुल भी नइ चले, वइसने होथे शास्त्र जिहां नियम धियम मा चले बर पड़थे। तभे तो महत्ता बढ़ जाथे। जे महत्व गीत मा शास्त्रीय गीत के हे, नृत्य मा शास्त्रीय नृत्य के हे, वइसने महत्ता शास्त्रीय छंद के हे। ते पाय के छन्द आदिकाल ले आज तक जीवित हे अउ जन जन के मुख मा रचे बसे हे। छंद के दू अर्थ होथे,आच्छादन अउ आह्लादन। आच्छादन माने रस, भाव अउ वर्ण्य विषय ला आच्छादित करना, जबकि आह्लादन मतलब मानव मन के मनोरंजन करना। कोनों भी काव्य होय जग अउ जन रंजन बर होथे, आत्म रंजन के कोई स्थान नइहे। छंद शास्त्र ले वैदिक अउ लौकिक रूप मा पढ़े देखे सुने बर मिलथे, वो वास्तव मा अद्भुत हे।  संस्कृत ला छोड़ के बात करन ता छन्द ज्यादातर क्षेत्रीय भाषा मा ही शोभायमान हे। चाहे अवधी होय, ब्रज होय, कोशली होय, मैथिली होय, बघेली होय या फेर छत्तीसगढ़ी,ये सब भाषा मा मलिक मोहम्मद जायसी, तुलसी, सुर, रहीम, कबीर, केशव, घाघ, भिखारीदास, घनानंद जइसे कतको विद्वान कवि मन कलम चलाये हें। आज खड़ी बोली मा घलो छन्द लिखे जावत हे। छत्तीसगढ़ी जेन पूर्वी हिंदी के एक भाषा आय अपन छंदबद्ध काव्य साहित्य ले लगातार पोठ होवत हे। मात्रिक अउ वर्णिक दुनो प्रकार जे छन्द सरलग छत्तीसगढ़ी मा लिखे जावत हे। वो दिन दूर नइहें जब छत्तीसगढ़ी भाषा के छंदबद्ध साहित्य घलो ब्रज, अवधी अउ मैथली कस अपन विशिष्ट स्थान बनाही। एखर बर जुन्ना समय मा लिखित काव्य साहित्य के अध्ययन, विश्लेषण अउ नवा सृजन जरूरी हे। साहित्य अउ कला भाषा के सबके बड़े रखवार होथे। तुलसी दास जी रामचरित लिखत बेरा कभू नइ सोचिस होही कि, फलां छत्तीसगढ़ी शब्द आगे, फलां बघेली होगे या फलां शब्द मैथली होगे, जबकि उन मन अवधी के कवि रहिन। ता हमन काबर सोचथन कि सबे चीन छत्तीसगढ़ी मा होय। हाँ फेर जोन भी भाषा के शब्द लेन वो वाक्य ला सरल,सहज अउ प्रवाहमय बनाय। “भले लिखाय कम। फेर वो लिखाय मा रहे दम। जुन्ना समय मा कोन कहाँ का पढ़िस कोन जानथे, फेर का लिखिस सब जानथन। ता अपन भाषा मा लिखव रमके अउ जमके। छन्द लिखे बर महिनत तो चाही ही चाही, काबर कि मात्रा के सवाल रथे। ता फल घलो तो पोठ मिलथे। तुलसी दास जी राम चरित मानस के रचना मात्रा गिन गिन के तो नइ करे होही? नही ते पहा जातिस, वइसे दू साल ग्यारह महीना ले आगर दिन कमती नोहे, तभो लय पकड़ा जाय ले कोनो भी छन्द जल्दी लिखाथे। ता छन्द बर विधान के साथ साथ लय के जानकारी होना घलो जरूरी हे।

 कुछ प्रचलित गीत कविता उदाहरण स्वरूप  सादर रखत हँव-


1,तातंक छंद- 

बुंदेले हरबोलों के मुँह, हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो, झाँसी वाली रानी थी।


2, चौपाई छंद-

जिसने सूरज चाँद बनाया। जिसने तारों को चमकाया।।

जिसने फूलों को महकाया। जिसने चिड़ियों को चहकाया।।


उठो लाल अब आंखे खोलो। पानी लाई हूं मुंह धोलो।।


3, सार छंद-

यह कदंब का पेड़ अगर माँ, होता यमुना तीरे।

मैं भी उस पर बैठ कन्हैया, बनता धीरे-धीरे।।


मां खादी की चादर दे दे, मैैैं गांधी बन जाऊं।

छन्नर छन्नर पैरी बाजे, खन्नर खन्नर चूरी।

हाँसत कूदत मटकत रेंगे, बेलबेलही टूरी।।(दलित जी)


4, लावणी छंद-

फूल तुम्हे भेजा हूं खत में, फूल नही मेरा दिल है।(फिल्मी गीत)


5, आल्हा छंद-

जिहां भिलाई कोरबा ठाढ़े, पथरा सिरमिट भरे खदान।

तांबा पीतल टीन कांच के, इहि माटी मा थाती खान।।(लक्ष्मण मस्तुरिया)


6, सरसी छंद-

राउत दोहा-अरसी फुले घमाघम भैया, मुनगा फुले सफेद।

बालकपन मा केंवरा बदे, जवानिकपन मा भेंट।।


7, जयकारी छंद-

हुए बहुत दिन बुढ़िया एक। चलती थी लाठी को टेक।

उसके पास बहुत था माल। जाना था उसको ससुराल।


अइसने कई प्रचलित छंदात्मक हिंदी, छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी गीत कविता हे, जेखर लय ला धरके छंद सहज लिखे जा सकत हे।


               छत्तीसगढ़ी के व्याकरण घलो बड़ जुन्ना हे, अउ लगातार व्याकरण के कोठी भरत जावत हे। छत्तीसगढ़ी आज सिर्फ बोली नही, बल्कि भाषा के रूप ले चुके हे। छत्तीसगढ़ी के लिपि हिंदी कस देवनानगरी ही हे। जे हिंदी, भोजपुरी, बघेली अउ अवधी भाषा ला घलो कुछ न कुछ समझ आ जथे। यदि कोई छत्तीसगढ़ी ले भागथे, दुरिहाथे ता वो मनखें समझ के घलो नासमझ बने के ढोंग करथे। छत्तीसगढ़ी मा कुकुर ला तू कहिबे ता पाछू लग जथे। बिलई ला मुनुमुनु कहिबे ता आ जथे। गाय गरुवा हई आ, ओहो तोतो ला समझथे, कुकरी कुकरा ला कुरु कुरु कहिके ता समझके तीर मा आ जथे,  ता हमन तो मनखें आन, थोर बहुत समय लगही बोले समझे मा अउ छत्तीसगढ़ी कोनो आन भाषा घलो नोहे महतारी भाषा ए, ता एला सिर्फ बोलना, लिखना,पढ़ना अउ समझना भर नइहे, बल्कि उचित स्थान अउ सम्मान दीवाये बर लगही। तभे ये माटी मा जनम धरेन तेखर कर्जा उतरही। आज छत्तीसगढ़ के कतको मनखें अभी नवा फिलिम धुरंधर आय हे तेखर एक अइसन गीत जेन समझ नइ आय वोमा नाचत झूमत गावत हे, अइसनेच बाहुबली के समय घलो होय रिहिस। मनखें मन कालके के काल्पनिक भाषा ले बोलत दिखे। ता संगवारी हो हमर छत्तीसगढ़ी तो आदि समय ले चलत मनभावन अउ गुरतुर भाँखा ए, एला बोले, लिखे, पढ़े मा कोताही काबर। हिंदी साहित्य के इतिहास ले लोक  भाषा अवधी ल नइ निकाले जा सके, काबर कि अवधी मा तुलसी, जायसी,कुतबन जैसे कतको आदिकालीन अउ भक्तिकालिन कवि मन दुर्लभ अउ कालजयी साहित्य गढ़ें हे।  रसखान, सुर, मीरा जैसे अउ कई कवि कवियित्री मन के कारण ब्रज घलो जन्मों जनम हिंदी साहित्य के हिस्सा रही। केशव, घनानन्द जैसे कवि मन के कारण मैथली ल नइ बिसारे जा सके। जबकि ये सब लोक भाषा आय। अइसन मा छत्तीसगढ़ी बर काबर सोचेल लगत हे? एखर एके कारण हे आज भी छत्तीसगढ़ी मा कायजयी अउ जादा से जादा छंदबद्ध सृजन के जरूरत हे, ता भला सृजन कोन करही? हमी मन न। ता आवन छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर सब  मिलके छंद,गीत,कविता,कहानी आदि सबे विधा मा सृजन करीं, अउ छत्तीसगढ़ी ला घलो हिंदी साहित्य में संघेरी। जय छत्तीसगढ़। जय जय छत्तीसगढ़ी


धन्यवाद

प्रस्तुति:-जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”

बाल्को, कोरबा(छग)